(अंबेडकर जयंती पर विशेष)
“पैरों में जूता भले ही ना हो लेकिन पास में किताब अवश्य होनी चाहिए।”
स्तालिन ने एक बार कहा था, “भाषा एक माध्यम है, औजार है जिसके जरिए एक-दूसरे का विचार विनिमय होता है। वहीं डॉ. अंबेडकर ने इससे एक कदम आगे बढ़कर कहा था. “अगर आपके पास भाषा है तो आपके पास सांस्कृतिक विरासत भी होती है, जिसका अपना अतीत और भविष्य होता है।” चूंकि भाषा से ही राष्ट्रीयता की भावना का विकास होता है. इसलिए उन्होंने बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही थी। उनके विचार में आज वक्त का सबसे बड़ा तकाजा यह है कि जनता जनार्दन के मन में एक साझी राष्ट्रीयता की भावना पैदा की जाए। मुझे अच्छा नहीं लगता, जैसा कि कुछ लोग कहते हैं कि हम हिंदू या मुसलमान पहले है, भारतीय बाद में हैं। यह भावना बिल्कुल नहीं चलेगी कि पहले वे हिंदू, मुसलमान या सिंधी आदि हैं और बाद में भारतीय। मैं चाहता हूं कि समस्त लोग पहले भी भारतीय हों और बाद में भी भारतीय हों तथा भारतीय के सिवाय कुछ भी नहीं हो।
यह बात डॉ. अंबेडकर ने प्रांतों के क्षेत्र के पुनर्वितरण के संदर्भ में कही थी। जिसका हवाला हमें बांबे लेजिस्लेटिव असेंबली डिबेट्स (खंड 3) 4 अप्रैल, 1938 के माध्यम से मिलता है। असल में उस समय बंबई प्रेसिडेंसी का क्षेत्रफल लगभग 1,223.541 वर्ग मील था। इसे चार भाषाई खंडों में बांटने का सिलसिला शुरू हो गया था। वे खंड या क्षेत्र इस तरह थे महाराष्ट्र. गुजरात, कर्नाटक और सिंध। इन खंडों के लोग लगभग एक सौ दस वर्षों से बबई प्रेसिडेसों के अंग रहे और एक ही प्रशासन के अधीन एक-दूसरे से जुड़े रहे। बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर के विचार में ‘एक भाषा एक प्रांत’ का सिद्धांत इतना बड़ा था कि इसे व्यावहारिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता था।
प्रांतों के क्षेत्र के पुनर्वितरण के बारे में हिंदुओं और मुसलमानों का एक प्रतिनिधि मंडल भारतमंत्री (वायस-राय) मोन्टेग्यू से 1920 के आसपास मिला था।
राष्ट्रभाषा हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के इतिहास और उनसे महापुरुषों के संबंधों का जब हम अध्ययन करते हैं तो हम पाते हैं कि लगभग सभी महापुरुषों का हिंदी से न केवल भावनात्मक लगाव था बल्कि उसकी अस्मिता और पहचान के बारे में ऐसे राष्ट्र पुरुष हमेशा जागरूक रहते थे।
गांधीजी ने 1905 में भाषा और जनता के साथ उसके स्वभाव की बात कही थी। 1905 में बंगाल का विभाजन हुआ। इस तरह भाषाई आधार पर जातीय एकीकरण की समस्या प्रमुख राजनैतिक समस्या के रूप में सारे भारत के सामने आई। गांधीजी ने गुजरात के लोगों को अपनी भाषा और इतिहास पर गर्व करना सिखाया। इसी तरह वह दूसरे लोगों को भी अपनी भाषा और जातीयता पर अभिमान करना सिखाते थे। भारत की सबसे बड़ी भाषाई जाति हिंदी प्रदेश में रहती है ऐसा रामविलास शर्मा अपने आलेखों में उल्लेख करते रहे हैं। गांधीजी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना चाहते थे। वे अधिकांश प्रांतों में एक ही भाषा बोली जाए, ऐसी आशा करते थे जबकि आंबेडकर प्रांतीय भाषाओं को फलने-फूलने के साथ हिंदी को राष्ट्र की भाषा के रूप में देखते थे।
मार्च 1918 में गांधीजी ने कहा “आज भी हिंदी से स्पर्धा करने वाली कोई दूसरी भाषा नहीं है। हिंदी-उर्दू का झगड़ा छोड़ने से राष्ट्रीय भाषा का सवाल सरल हो जाता जाए। इस है। अंग्रेजी भाषा का मोह दूर करने के लिए इतना अधिक परिश्रम करना पड़ेगा कि हमें लाजिम है कि हम हिंदी-उर्दू का झगड़ा न उठाएं। लिपि की तकरार भी हमें नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा, एक तो जहां हिंदी मातृभाषा है, वहां उसका विकास करें। दूसरे, जहां हिंदी नहीं बोल्नी जाती, वहां उसका प्रचार करें। तीसरे, देवनागरी लिपि का प्रचार किया दृष्टि से बांग्ला भाषा के अच्छे से अच्छे ग्रंथ देवनागरी लिपि में और हिंदी में शब्दाथों सहित प्रकाशित किए जाएं। यह हिंदी सीखने का आसान से आसान रास्ता है। इस कार्य को यदि मारवाड़ी, गुजराती और अन्य धनिक वर्ग तथा साक्षर वर्ग के लोग अपने हाथ में ले लें तो थोड़े समय में बहुत सुंदर कार्य हो सकता है।
देखा गया है कि हिंदी भाषा की रक्षा करने में हिंदी प्रदेश के जन साधारण ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जिन्हें लोग भैया कहते हैं, मेहनत-मजदूरी करने वे मुंबई, अहमदाबाद या कोलकाता जाते हैं, ऐसे अपढ़ मजदूर जब सेठ, साहूकारों तथ मालिकों के साथ अन्य से हिंदी में बातें करते हैं तो उनकी सहज भाषा न केवल अलग-अलग प्रदेशों की भाषा संस्कृति में घुल-मिल जाती है बल्कि उस घुली-मिली भाषा में जीवन का रस आने लगता है। गांधीजी ने इस पर विस्तार से लिखा है।
गांधीजी इस तरफ भी संकेत करते हैं कि हिंदी प्रदेश के बुद्धिजीवियों में अंग्रेजी की जड़ मजबूती से जमी हुई थी। उनमें अंग्रेजी-प्रेम अधिक था, हिंदी-प्रेम बहुत कम। जबकि बांग्लाभाषियों ने हिंदी के प्रचार-प्रसार में विशेष सहयोग किया। उन्होंने हिंदी में पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन कर एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया जिससे अन्य गैर हिंदी भाषियों को भी प्रेरणा मिली। यह सब इसलिए हुआ क्योंकि उन दिनों देशभर में हिंदुस्तानी आंदोलन चल रहा था। आवागमन के साधन का विकास हो गया था। देशप्रेमी और क्रांतिकारी एक प्रदेश से इन राज्यों में आ-जा रहे थे। उनके बीच भाषा के आधार पर कोई मतभेद न था। वे स्वयं बातचीत के लिए सहज और सरल भाषा चाहते थे जिससे राष्ट्रीय तथा सामाजिक गतिविधियों में भाग ले सके।
उत्तर-पूर्व राज्यों में
हिंदी के प्रचार कार्य को गति देने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान महात्मा गांधी का ही माना जाता है। गांधीजी के प्रयत्नों से हिंदी के प्रसार कार्य का विधिवत् प्रारंभ यद्यपि सन् 1918 ई. में हुआ तथापि असम में इसका प्रारंभ बाबा राघवदास ने किया।
असम में सन् 1934 ई के पूर्व ही भुवन चंद्र गरी ने स्वप्ररेणा से हिंदी प्रचार का कार्य आरंभकिया था। स्वदेश-प्रेम स्वदेशी शिक्षा और स्वावलंबन ही उनके आदर्श थे। इस प्रकार असम में पहली बार हिंदी प्रचार कार्य का अध्यापन की विधिवत् शुरुआत हुई। परिणाम-स्वरूप शिवसागर में हिंदी प्रचार का ऐसा वातावरण बना था कि केवल स्कूलों में छात्र-छात्राएं ही नहीं, बल्कि बड़े-बड़े शोधार्थी और विद्वान भी आया करते थे। वर्धा समिति का परीक्षा केंद्र भी असम में पहली बार यहीं स्थापित हुआ था। आरंभ में केंद्र के व्यवस्थापक विद्यालय के प्रधानाध्यापक इंद्रेश्वर सुतिया थे। बाद में यह दायित्व स्वयं भुवन चंद्र ने संभाल लिया था। हिंदी प्रचार की अखिल भारतीय योजना के अनुसार जब सन् 1934 ई. में बाबा राघवदास असम में पहली बार आए तो उन्होंने भी वहां अपना निवास बनाया था।
गांधी की प्रेरणा से 1934 में अपने परमहंसानंत आश्रम बरहज (उत्तर प्रदेश) से हिंदी के प्रचार कार्य हेतु बाबा राघवदास ने असम की यात्रा की।
सन् 1938 ई. के अंतिम भाग में वर्धा समिति ने असम में प्रचार कार्य की देख-रेख और उसे गति प्रदान करने के लिए ‘दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा’ के कार्यकर्ता यमुना प्रसाद श्रीवास्तव को संचालक बनाकर यहां भेजा। उन्हीं के साथ बाबा राघवदास ने एक बार पुनः असम की यात्रा की एवं प्रचार कार्य को व्यवस्थित करने की दृष्टि से हो सन् 1938 ई. के 3 नवंबर को गुवाहाटी में ‘असम हिंदी प्रचार समिति’ की स्थापना की गई। इस समिति के प्रतिष्ठाता अध्यक्ष थे लोकप्रिय गोपीनाथ वरदलै। उन्हीं की अध्यक्षता में 1 दिसंबर, 1938 ई. को इस समिति की पहली बैठक कॉटन कॉलेज, गुवाहाटी में हुई थी, जिसमें बाबा राघवदास और यमुना प्रसाद श्रीवास्तव के अतिरिक्त रमेश चंद्र, बी. के. भंडारी, नीलमणि फुकन, आर. डी. शाही, देवकांत बरुवा जैसे व्यक्ति भी उपस्थित थे।
समिति की दूसरी बैठक में काका कालेलकर के प्रस्तावानुसार’ असम हिंदी प्रचार समिति’ का नाम परिवर्तित कर ‘असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ रखा गया। ‘असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ प्रारंभिक वर्षों में वर्षा की समिति द्वारा नियंत्रित थी, पर सन् 1942 ई में इसे पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त हुई। लोकप्रिय गांधीनाथ बरदले ने महात्मा गांधी के आदशों को स्वीकार करते हुए घोषणा की. ‘असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति गांधीजी के आदर्शों पर चलने वाली संस्था है।’ स्वयं महात्मा गांधी ने भी सन् 1945 ई. में असम की यात्रा की। राज्य सरकार ने समिति के वार्षिक अनुवर्तक के वित्तीय अनुदान में वर्ष की किसी भी भाषा तथा साहित्य से गांधीजी को कितनी गहरी दिलचस्पी थी, याह इस बात से जाना जा सकता है कि गुजराती साहित्य परिषद् के अधिवेशन में भाग लेने के लिए उन्होंने रवींद्रनाथ ठाकुर को आमंत्रित किया। उस समय गांधीजी ने लिखा था, “उनका आगमन छोटी-मोटी बात नहीं कही जा सकती। यह राजनैतिक पुरुष नहीं, महाकवि हैं। उनकी जोड़ का कोई और व्यक्ति हिंदुस्तान में तो नहीं ही है।… वे जैसे कवि है वैसे ही तत्वज्ञानी और आस्थावान व्यक्ति हैं। ये भाषाओं के तत्वों को भी अच्छी तरह से जानते हैं।”
कलकत्ते के राष्ट्रीय पुस्तकालय की सीढ़ियां पार करते ही प्रवेश द्वार पर स्थापित प्रिंस द्वारिकानाथ की मूर्ति इस संस्था को दिए गए उनके योगदान की स्वीकृति है। भारत में आधुनिक शिक्षा के पहले केंद्र हिंदू कालेज की स्थापना में भी उनका भरपूर योगदान था जिसका नाम बाद में प्रेसीडेसी कालेज कर दिया गया था। सन् 1874 में एशिया के इतिहास, कता साहित्य व पुरातत्त्व की गवेषणा के लिए सर विलियम जोन्स ने जिस एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल की स्थापना की थी, द्वारिकानाथ टैगोर उसके प्रथम भारतीय अध्यक्ष थे। आर्कियोलॉजिकल सर्व आफै इंडिया कलकत्ते का प्रसिद्ध इंडियन म्युजियम जैसी अनेक प्रमुख वैज्ञानिक संस्थाओं का श्रेय इस सोसाइटी को है।
अगस्त 1846 को इंग्लैंड में ही उनका निधन हुआ। उनके ज्येष्ठ पुत्र व रवींद्रनाथ के पिता देवेंद्रनाथ टैगोर भी उन्हों की तरह निराले व्यक्ति थे। रवींद्रनाथ टैगोर अपने पिता और मां शारदा देवी को चौदहवों संतान थे। अपने बाबा और पिता की ही भांति रवींद्रनाथ टैगोर का व्यक्तित्व भी असाधारण व अद्वितीय था। किशोरावस्था में ही उनके अंदर साहित्यिक क्षमता का विकास प्रारंभ हो गया था।
1915 में गांधी की पहली बार टैगोर से शाति निकेतन में ही भेट हुई थी, जब वे दक्षिण अफ्रीका में अपना संग्राम जीतकर लौटे थे। वे दक्षिण आफ्रीका में अपना स्कूल और फीनिक्स कॉलोनी भंग कर चुके थे तथा एंड्ज के सुझाव पर उन्होंने बच्चों को शांति निकेतन भेज दिया था। वे शांति निकेतन में उन बच्चों से मिलने आए थे तब टैगोर से पहली बार मिले। दोनों ने एक-दूसरे को गहराई तक प्रभावित किया।
गांधीजी ने दलित अफ्रीका में गोखले के स्वागत की जैसी तैयारी की थी. कुछ कुछ वैसी ही तैयारी वह गुजरात में रवींद्रनाथजी के स्वागत की कर रहे थे। उन्होंने गुजरातियों से कहा, “मेरी कामना है कि गुजरात के लोग उन्हें उचित सम्मान दें। हम रास्तों को अलंकृत करें तो उस पर पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव न होकर पूर्व की सभ्यता का प्रभाव होना चाहिए।” फिर रवींद्रनाथ के कला-प्रेम का स्मरण करते हुए गांधीजी ने लिखा, “वे अच्छे कवि होने के साथ ही चित्रकला और संगीत के भी पारखी हैं। इसलिए हम उनके प्रति अपना जो भाव प्रकट करना चाहे, वह शात्तिमय, कलापूर्ण और सब प्रकार के आडंबरों, भावावेश से रहित एवं शुद्ध होना चाहिए।”
अहमदाबाद में जिस तरह उनका स्वागत हुआ उसके लिए गुजरात के लोगों को धन्यवाद देना चाहिए। रवींद्रनाथ ने कलकत्ते को लक्ष्य करके पूंजीवादी सभ्यता की आलोचना की थी। अहमदा चाद भी पूंजीवादी उद्योग-धंधों का बड़ा केंद्र था। गांधीजी ने कहा, “उन्होंने आधुनिक सभ्यता की उपज के रूप में कलकत्ते का जो उल्लेख किया वह उनकी सहज शिष्टता और विजयशीलता का सुंदर नमूना है। गुजरात में गांधीजी तथा उनके अनुयाई न गुजराती में बोले होंगे और न ही रवींद्रनाथजी ने बंगाली में कुछ कहा होगा बल्कि उनके साथ रवींद्रनाथ टैगोर का वार्तालाप हिंदी में ही हुआ होगा।”
1925 में गांधी फिर शांति निकेतन आए थे तथा टैगोर के समक्ष उन्होंने अपना यह मत फिर दोहराया कि स्वराज का पथ चरखा व खादी से ही निकलेगा।
गांधीजी को समकालीन गुजराती साहित्य की प्रगति से संतोष नहीं था। उन्होंने कला की कसौटी पर साहित्य को परखने पर जोर दिया, “यदि में किसी साहित्यकार की रचना से उकता जाता हूं तो इसमें मेरी बुद्धि का दोष नहीं है। दोष उसकी कला का है। शक्तिवान साहित्यकार को अपनी कला की कम से कम इतना विकसित तो करना ही चाहिए कि पाठक उसे पढ़ने में लीन हो जाए।
यह बात इतिहास में बखूबी दर्ज है कि बंग-भंग के समय जब स्वदेशी का जोश उमड़ रहा था, तब बंगाल में बांग्ला के जरिए शिक्षा देने का प्रयत्न किया गया। राष्ट्रीय पाठशाला की स्थापना हुई पर सब बेकार गया। इसका अर्थ यह कि बंगाल के बुद्धिजीवियों पर अंग्रेजों का प्रभाव बहुत ज्यादा था। बंगाल में शिक्षित वर्ग को अंग्रेजी से बड़ा मोह रहा। इसी तरह से बंगाल का नवजागरण भी अंग्रेजी भाषा और साहित्य से प्रभावित था। रवींद्रनाथ टैगोर जैसे महान लेखक उसी की देन हैं। यहां गांधीजी इस बात कर खंडन करते हुए कहते हैं, “यह कहा गया है कि बांग्ला साहित्य ने जो प्रगति की है. उसका कारण बंगालियों का अंग्रेजी भाषा और साहित्य पर अधिकार है लेकिन तथ्य इस तर्क के विरुद्ध है। रवींद्रनाथ टैगोर की चमत्कारिक बांगला अंग्रेजी को त्रऋणी नहीं है। उनके भाषा चमत्कार के पीछे उनका स्वभाषा विषयक अभियान है। ‘गीतांजलि’ पहले बांग्ला भाषा में ही लिखी गई थी। जब गांधीजी हिंदी या हिंदुस्तानी शब्द का प्रयोग भाषा के लिए करते हैं, तब उनका आशय भारत की समस्त भाषाओं से नहीं होता, वरन् भारत की एक भाषा से होता है। भारत की सभी भाषाएं हिंदुस्तानी नहीं हैं। हिंदुस्तानी विशेष भाषा है। इसी को गांधीजी राष्ट्रभाषा कहते थे। उन्होंने लिखा भी है. “मेरा यह आग्रह पहले से था कि हमें या तो मातृभाषा में बोलना चाहिए या राष्ट्र भाषा हिंदुस्तानी में। सच कहा जाए तो गांधी, आंबेडकर और रवींद्रनाथ भाषा के प्रति बहुत सजग रहते थे। हालांकि अंग्रेजी से उनका कोई खैर नहीं था। वे अंग्रेजी में भी पढ़ते-लिखते थे, पर देशवासियों को परस्पर संवाद के लिए हिंदी भाषा के महत्व को बताते थे वे जहां भी रहे. वहीं उन्होंने राष्ट्रभाषा के महत्व की बात की। लोगों को अपनी भाषा का महत्व बताया। उन्हें जाग्रत किया।
ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो 14 अगस्त, 1931 को अंबेडकर की अन्य साथियों के साथ बंबई स्थित मणि भवन में गांधीजी से मुलाकात हुई। संभवतः यह उनकी पहली मुलाकात थी। दूसरी मुलाकात अगस्त 1932 को पृथक निर्वाचन मंडल के विषय पर लंदन में आयोजित दूसरे गोलमेज सम्मेलन में हुई। हालाकि इसे मुलाकात कम और मुठभेड़ अधिक कहा जाता है।
28 सितंबर, 1931 को गांधीजी के पुत्र देवदास्य गांधी द्वारा डॉ. अंबेडकर और गांधी के मध्य सरोजिनी नायडू के लंदन के निवास पर मुलाकात हुई क्योंकि सरोजिनी नायडू तथा मालवीय आदि गांधीजी के साथ लंदन गए थे। जो बातें सम्मेलन के स्थान यानी जेम्स महल में नहीं हो सकती थी, उसके लिए शाम को अलग से इसका प्रबंध किया गया था।
19 अक्तूबर, 1932 को सामंतवादी में एक मुकदमे की पैरवी के लिए जाते हुए अंबेडकर ने गांधी से यरवदा में मुलाकात की। इसके बाद अंबेडकर 24 सितंबर, 1932 को पुनः गांधीजी से यरवदा जेल में पूना पैक्ट के बारे में मिले। इसके बावजूद वे गांधीजी द्वारा देश को स्वाधीन कराने के लिए किए जा रहे प्रयास के प्रति श्रद्धा व सराहना का भाव रख थे। ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेमसे मैकडोनाल्ड द्वारा दिए गए ‘कम्यूनल अवार्ड के विरोध में जब गांधीजी ने 20 सितंबर, 1932 को जेल में आमरण अनशन की घोषणा की, तो टैगोर ने उनका अखंडता के लिए अनमोल जीवन की बलि चढ़ाना सर्वथा उचित नहीं है।” वे 24 सितंबर को गांधीजी से मिलने यरवदा जेल के लिए चल पड़े तथा ब्रिटिश सरकार द्वारा गांधीजी की मांग मान लेने के कारण 26 सितंबर को टैगोर को उपस्थिति में ही गांधीजी ने अपना अनशन तोड़ा और अनशन तोड़ने से पूर्व टैगोर ‘गीतांजलि’ का एक भजन बांग्ला में गाया।
संभवतः यह देश की दो महान शख्सियतों की अंतिम मुलाकात थी। जाहिर है इन मुलाकातों में उनके बीच बातचीत का माध्यम हिंदी भाषा ही रहा होगा। देखा जाए तो मराठी भाषी होने के बावजूद अंबेडकर को अंग्रेजी का व्यहारिक ज्ञान था। 15 अगस्त, 1936 को उन्होंने स्वतंत्र मजदुर पार्टी बनाई जिसे वे ‘कामगारों की पार्टी’ कहा करते थे। 17 फरवरी, 1937 को जब बम्बई विधान सभा के चुनाव हुए तो अंबेडकर सहित कनिष्ठ सदन में 14 और उच्ब सदन में 2 सदस्यों का चयन हुआ था। चूंकि बंबई के कारखानों में पूरे देश से मजदूर काम करने आते थे. जिनमें हिंदी भाषी बहुतायत में होते थे, इसलिए उनसे बातचीत होने के कारण वे अच्छी तरह से हिंदी बोलने लगे थे। बहुत कम लोगों को मालूम है कि आरंभिक दिनों में उन्हें संस्कृत पढ़ने नहीं दी गई थी जबकि हिंदू धर्म ग्रंथों को पढ़ना वे जरूरी समझते थे। अतः उन्होंने जर्मनी भाषा के माध्यम से संस्कृत सीखी थी। बाद के दौर में (27 जुलाई, 1942 को श्रममंत्री बनने के अवसर पर) जब वे दिल्ली आए तो उत्तरी भारत के लोगों से उनके संवाद स्थापित हुए। उन्हीं में डॉ. सोहनलाल शास्त्री भी थे, जिनकी मदद से डॉ. अंबेडकर ने न सिर्फ हिंदी बल्कि पुनः संस्कृत का ज्ञान भी प्राप्त किया। 1940 की फरवरी में गांधीजी कस्तूरबा के साथ टैगोर से मिलने शांति निकेतन आए थे और तब टैगोर ने गांधीजी से ‘विश्वभारती’ को अपनी छत्रछाया में लेने का आग्रह किया था। हमेशा की तरह गांधीजी ने बहुत विनम्रता से कहा था कि “इसे तो प्रभु का संरक्षण मिला है, क्योंकि यह एक निष्ठावान आत्मा की सृष्टि है। जहां तक आर्थिक पक्ष की बात है, गुरुदेव को उसके भविष्य की सभी चिंताओं से मुक्त करना हमारा कर्त्तव्य है।” गांधीजी की टैगोर से यह अंतिम भेट थी। इस भेंट में दिए गए वचन को उन्होंने पूरा किया। उनको मृत्यु के पश्चात् स्वतंत्र भारत की राष्ट्रीय सरकार ने राष्ट्र द्वारा मान्य विश्वविद्यालय के रूप में ‘विश्वभारती’ के संचालन का संपूर्ण आर्थिक दायित्व अपने ऊपर ले लिया। जवाहरलाल नेहरू ने इसका आचार्य पद ग्रहण किया, जो सर्वधा उचित था, क्योंकि उनके व्यक्तित्व में एक प्रकार से इन दोनों महापुरुषों के न्यूनाधिक गुणों का समावेश था। 7 अगस्त, 1941 की दोपहर में टैगोर का देहावसान गया। उनके निधन पर गांधीजी ने लिखा था, “शायद ही कोई ऐसा सार्वजनिक कार्य हो, जिस पर उन्होंने अपने प्रबल व्यक्तित्व की छाप न छोड़ी हो।”
रवींद्रनाथ टैगोर के भीतर बंगाली भाषा और संस्कृति के प्रति बहुत ही अनुराग था। आरंभिक दौर में बंगाली भाषा के अलावा ये अंग्रेजी को ही स्वीकार करते थे। अंग्रेजी भाषा को स्वीकार करने का कारण उनके परिवार का ‘रायल’ होना भी था। हालांकि ये स्वयं अपने दादाचे द्वारिकानाथ टैगोर की अंग्रेजी सरपरस्ती को पसंद नहीं करते थे। बाद के दौर में जब उनकी मुलाकात गाधीजी से चार-बार होती गई तो हिंदी भाषा के प्रति उनके भीतर से अपनत्व जागा। दूसरा कारण ‘विश्वभारती’ का भी था। वह इसलिए कि ‘विश्वभारती’ में अध्ययन के लिए देशभर से विद्यार्थी तथा शोधार्थी आते थे जिनसे वे समय निकालकर मिलते भी थे। इनमें हिंदीभाषी बड़ी संख्या में होते थे। बाद में तो विश्वभारती विश्वविद्यालय में हिंदी विषय में पढ़ाई भी होने की शुरुआत होने लगी।
राजभाषा हिंदी के लिए डॉ. अंबेडकर द्वारा किए गए संवैधानिक प्रावधान
संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के अनुसार संघ की राजभाषा देवनागरी लिपि में लिखित हिंदी है। इसी प्रकार संविधान के अनुच्छेद 343 (2) के अनुसार यह प्रावधान किया गया है कि संविधान के प्रारंभ से 26 जनवरी, 1965 तक सभी राजकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी का यथावत् प्रयोग होता रहेगा। अंग्रेजी भाषा में लंबे समय से काम-काज करने कराने वाले प्रशासकों, कर्मचारियों आदि के नए भाषा माध्यम हिंदी को अपनाने के लिए पर्याप्त समय देना उचित समझा गया। यहां पर भारत के राष्टपति को यह अधिकार के लिए हिंदी भाषा एवं भारतीय अंकों के प्रयोग को प्राधिकृत कर सकेंगे। भी दिया कि वे पंद्रह वर्षों की कालावधि में संघ के किसी राजकीय प्रयोजन संविधान के अनुच्छेद 345 में यह प्रावधान है कि राज्य का विधानमंडल विधि द्वारा एक या एकाधिक प्रादेशिक भाषाओं अथवा हिंदी को सरकारी प्रयोजनों के लिए स्वीकार कर सकेगा। अनुच्छेद 346 में यह साफ-साफ आदेश है कि एक राज्य तथा दूसरे राज्य के बीच तथा किसी राज्य एवं संघ मध्य पत्राचार में संघ की राजभाषा का ही प्रयोग होगा। अनुच्छेद 346 के अनुसार यदि किसी राज्य के अभिज्ञात करना चाहे तो राष्ट्रपति उस भाषा को सरकारी अभिज्ञा देने का अधिकारी है। संविधान के अनुच्छेद 348 में उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों इत्यादि को भाषा का भी प्रावधान है। इस अनुच्छेद के अनुसार जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे तब तक विधेयकी, अधिनियमों, अध्यादेशों एवं आदेशों तथा नियमों-विनियमों के प्राधिकृत पाठ अंग्रेजी में ही होंगे। संविधान के अनुच्छेद 349 में यह व्यवस्था है कि संविधान के शुरू के पोइह वर्षों की कालावधि तक अंग्रेजी के स्थान पर किसी अन्य भाषा का पाठ प्राधिकृत पाठ नहीं माना जाएगा किंतु किसी अन्य भाषा के प्राधिकृत पाठ के लिए राष्ट्रपति भाषा आयोग की संस्तुतियों एवं संसदीय समिति की प्रतिवेदन पर विचार करने के बाद अपनी स्वीकृति दे सकते हैं। संविधान के अनुच्छेद 350 के अनुसार कोई व्यक्ति अपनी शिकायत के समाधान के लिए संघ या सबद्ध राज्य में प्रयुक्त होने वाली किसी भी भाषा में आवेदन कर सकता है। इस व्यवस्था में भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकार पूरी तरह सुरक्षित किए गए हैं।
संविधान का अनुच्छेद 351 अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके अनुसार संघ सरकार का यह कर्तव्य है कि यह हिंदी को एक ऐसी सर्वमान्य राष्ट्रीय भाषा के रूप में विकसित करे जिसका पूरे राष्ट्र में गर्व सहित प्रयोग किया जा सके और वह भारत की मिश्रित संस्कृति के सभी तत्वों को अभिव्यक्त कर सके। इसके लिए हिंदी में अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों को ग्रहण कर उसे समृद्ध किए जाने का भी सुझाव है।
जाहिर है आजादी के बाद देश में न केवल भाषा संबंधी क्षेत्र में विकास हुआ है बल्कि सांस्कृतिक गतिविधियां भी तेजी के साथ बढ़ी हैं। किसी भी देश में राष्ट्रीय भाषा के प्रचार-प्रसार में मुख्यत दो स्थितियां उत्प्रेरक का कार्य करती हैं। पहली व्यवसाय की तलाश और दूसरी साहित्यिक तथा सास्कृतिक संबंधों की लालसा। विश्व के किसी भी छोर पर मानव समाज के बीच यह दो बाते अवश्य ही मिलेगी। वह देश चाहे किसी भी धर्म को मानता रहा हो या किसी भी राजनैतिक विचारधारा से सहमत हो। सच कहा जाए तो संपूर्ण मानवीय संबंधों का आधार यही है।
कुछ भारतीयों ने प्रशासन की भाषा अंग्रेजी को ही बनाए रखा। उनके लिए हिंदी अभी भी गुलामों, अनपढ़ों तथा आम लोगों की भाषा थी। हालांकि भारतीय सिविल सेवा का नाम बदलकर भारतीय प्रशासनिक सेवा हो गया था लेकिन अंग्रेजों मानसिकता धीरे-धीरे ही उनके भीतर से खत्म हुई। वर्ना बड़ी मुश्किल से बीसवीं शताब्दी के अंत होते-होते आई.ए. एस. संघ लोक सेवा आयोग द्वारा संचालित परीक्षा में हिंदी को अनिवार्य कराया जा सका था। वैसे यह कार्य आजादी के पहले दशक के पहले वर्ष में ही हो जाना चाहिए था। मैटकाफ के शब्दों में एक क्राति के बाद दूसरी क्रांति होती है।
भारत में पहले राजनैतिक क्रांति हुई फिर सामाजिक क्रांति और बाद में भाषाई क्रांति। आज के दौर में हम इन दिनों क्रातियों की उपलब्धियों के दौर से गुजर रहे हैं। आज कोई यह महसूस नहीं करता कि हिंदी गवारों की भाषा है। आम आदमी के साथ खास आदमी हिंदी भाषा के माध्यम से समन्वय स्थापित उसकी अपनी कोई अस्मिता नहीं है। सहजता से लोग इसे स्वीकार कर रहे हैं। करना सीख रहे है। भले ही उन्हें एक कदम नीचे उतरकर आना पड़ा हो।
ज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भी हिंदी का दबाव बढ़ा है और अंग्रेजी का कम हुआ है। चलचित्र और दूरदर्शन ने तो हिंदी को संपर्क भाषा बनाने में बहुत मदद की है। और कंप्यूटर के आविष्कार तथा माध्यम ने तो भाषाई क्रांति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। अब कानून की भाषा हिंदी को बनाने में कोई समस्या नहीं है। इसलिए कि हिंदी के प्रति लोगों को रुचि बढ़ती जा रही है। आज संपर्क भाषा के रूप में हिंदी सभी प्रांतों में बोली और समझी जाती है। हिंदी को शब्द संख्या बढ़ी है। राजभाषा के गौरव में भी विकास हुआ है। सबसे बड़ी बात यह हुई कि सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन में समाचार पत्र-पत्रिकाओं ने आम आदमी की भाषा को उभारा है। उसे उसकी पहचान से रू-ब-रू कराया है। आम जन को लगा कि अब उसके दिन लौटने लगे हैं। उसकी मान-मर्यादा, आत्म-सम्मान, उसकी परंपराएं, सामाजिक और सास्कृतिक संरचना में पुनः रचने-बसने लगी हैं। इसीलिए कहीं भी उसे अपनी भाषा में जोरदार ढंग से अभिव्यक्त करने की ताकत मिली है। उसकी आकांक्षाएं एवं सपने अब हाशिए पर नहीं रहे। गांव और कस्बे का संपर्क शहर के लोगों से उसी भाषा में हुआ है। नई शताब्दी में बीती हुई शताब्दी की इसे उपलब्धि ही कहना चाहिए।
देश का परिवेश जहां विविध आयामों में विकसित हुआ है वहीं उसी परिवेश में राजभाषा की सुगंध भी फैली है। दक्षिण की हिंदी संस्थाओं के अतिरिक्त भारत के अन्य हिंदीतर राज्यों में भी हिंदी प्रचार सभाओं की स्थापना हुई है। महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा पुणे, गुजरात विद्यापीठ, राष्ट्रभाषा प्रचार सभा बंबई, मैसूर राष्ट्रभाषा प्रचार परिषद, हिंदी साहित्य सम्मेलन, हिंदी विद्यापीठ देवधर, बंबई हिंदी विद्यापीठ बबई, राष्ट्रभाषा परिषद, जगन्नाथ धर्म आदि हिंदी सस्थाएं हिंदी के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं। कुछ समय पहले तक स्वयं हिंदीभाषी लोग हिंदी को एक जटिल भाषा के रूप में देखते रहे थे। देश में हिंदी के प्रचार-प्रसार से उनके इस तरह के दृष्टिकोण में भी बदलाव आने लगा है। ऐसे विचार या मान्यता का एक सबसे बड़ा कारण यह था कि अंग्रेजी के शब्दों का समाज में अधिक प्रचलन हो गया था। इसीलिए जो शब्द पहले से बोले जाते रहे हों उनके स्थान पर अगर नए शब्द आएंगे तो शुरुआती दिनों में वे अवश्य ही जटिल लगेंगे। आजादी के दूसरे दशक के आरंभ में यानी अगस्त, 1961 में आयोजित मुख्य मंत्रियों के विशेष सम्मेलन में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की प्रेरणा से एक प्रस्ताव पारित हुआ था जिसमें कहा गया था कि भारत की सभी भाषाओं के लिए हिंदी सभी भाषाओं को जोड़ने वाली एक मजबूत कड़ी का काम करेगी।
भारत के उत्तर से दक्षिण तक और पूर्व से पश्चिम तक हजारों मील के विशाल क्षेत्र में धार्मिक, शैक्षिक और राजनैतिक आदि कार्यों तथा कारणों से आना-जाना लगा रहता है, जिसमें उनके बीच संवाद स्थापित करने में हिंदी ही विशेष भूमिका निभाती है क्योंकि उनके लोकजीवन में हिंदी ही रची-बसी है जिसमें जीवन का रस है और एक-दूसरे से बातें करने की ललक भी है। पर भाषाई क्रांति का यह पहला और अंतिम चरण नहीं है। राजभाषा की प्रगति में अगले कई पड़ाव आएंगे। आशा है इतिहास और वर्तमान के तालमेल से हिंदी की प्रगति और आगे जाएगी।
धीरेन्द्र जयहिंद
