धर्म और स्त्री

वर्षा सिंह

 

धर्म का इस्तेमाल स्त्री के खिलाफ एक हथियार की तरह हुआ। धर्म में स्त्री को एक सामान्य मनुष्य की तरह नहीं बरता गया बल्कि उसके इर्दगिर्द बंधनों के बेड़े खींचे गए। जन्म के साथ ही धर्म के नाम पर स्त्री के लिए ऐसे कायदे तय किए गए कि उसकी सामान्य-स्वाभाविक प्रगति बाधित हुई। यहां तक कि स्त्री भी खुद को धर्म की जकड़न से आजाद नहीं कर पायी।

धर्मग्रंथों में वर्णित कहानियों में स्त्रियों को सेवा, आज्ञाकारी, स्वामी भक्त दिखाया गया है। जैसे पार्वती सदैव शिव की ओर मुस्कुराती हुई देखती है और कहती है जैसी इच्छा प्रभु। या क्षीर सागर में आराम कर रहे विष्णु के पैर दबाती लक्ष्मी। राजाओं की कहानियों में, ज्यादातर उनके फैसलों का समर्थन करती रानी।

किंवदतियों पर आधारित रामायण की प्रमुख किरदार सीता और महाभारत की प्रमुख किरदार द्रौपदी को लीजिए। अत्याचारियों से लड़ती द्रौपदी को कभी स्त्रियों की नायिका के तौर पर नहीं दिखाया गया जबकि समर्पण भाव से लैस सीता का खूब महिमामंडन किया गया। सीता भी मजबूत थी जो लंका से लौटकर राम के शक करने पर उन्हें छोड़कर अलग हो गई। लेकिन इसे सीता की मजबूती के तौर पर नहीं दिखाया गया। इसकी व्याख्या अलग ढंग से की गई। सीता कड़े फैसले लेने वाली स्त्री थी तभी तो राम के वनवास पर उन्होंने भी राजमहल का सुख छोड़ दिया। सीता के इस साहस की व्याख्या नहीं की गई बल्कि उन्हें पति का अनुगामिनी बता दिया गया। धर्म ग्रंथों और उनके पात्रों के जरिये स्त्री पर कई हमले किए गए। तुलसीदास जी की लिखी रामायण की पंक्तियां है- ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी सकल ताड़ना के अधिकारी।

द्रौपदी तो अपने वक्त से कहीं आगे की महिला थी उनके किरदार को तो नए ढंग से पेश किया जाना चाहिए। ऐसी कोशिश पहले की भी गई है बस जनमानस में उस तरह प्रसारित नहीं हो सकी। महाश्वेता देवी ने द्रौपदी की कथा से प्रेरणा लेकर एक छोटी कहानी लिखी थी जिसमें एक आदिवासी महिला अत्याचार का सामना करने के बाद नारी की शक्ति का मिसाल बनती है।

धर्म के नाम पर मिथकों की राजनीति की गई और जिस पर कभी खुलकर बहस हुई ही नहीं। पौराणिक मिथकों के साथ-साथ आधुनिक मिथक तो और भी खतरनाक रचे जा रहे हैं। जिसमें स्त्री को सिर्फ एक नुमाइश की तरह बरता जा रहा है और मुस्कुराती हुई वो नुमाइश बनने को तैयार भी है। इन सब को नए सिरे से देखे-परखे जाने की जरूरत है।

धर्म में कन्या जन्म को निराशा के तौर पर देखा गया। जिसका दबाव आज के आधुनिक युग में भी हम ढो रहे हैं। अस्पताल के बाहर, मंदिरों की सीढ़ियों और कूड़े के ढेर में आज भी नवजात लड़कियां फेंकी जाती हैं। आवारा कुत्तों का निवाला बनती है। इंसानियत से पहले यहां धर्म को शर्मसार होना चाहिए। ये उसी की शह पर है। समाज में ऐसी कितनी घटनाएं चुपचाप घटित हो जाती हैं। धर्म और धर्म के पहरेदार बड़ी खामोशी से इन सब से किनारा कर जाते हैं। उदाहरण देखिए साल 2012 में राजस्थान में कन्या भ्रूण हत्या पर अंकुश का सख्ती से पालन किया गया, सोनोग्राफी पर रोक लगायी गई तो सड़क पर लावारिस नवजात बच्चियों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी। जिसने सामाजिक सरथाओं की चिंता बढ़ा दी। 2012 में मात्र दो महीने में राजस्थान में 14 लावारिस नवजात बच्चिया मिलीं। कुछ ऐसा ही हाल पिछले साल मथुरा का था। जहां बांकेबिहारी मंदिर की सौकियों पर नवजात लावारिस बच्चियों को छोड़ने की संख्या बढ़ने लगी। कृष्ण और राधा की नगरी मथुरा में रात के अंधेरे में मंदिरों के बाहर छोड़ी गई नवजात बच्चियों के रोने की आवाज सुबह सुनायी देती, ठीक धर्म के दरवाजे पर।

यहां पुणे के एक अस्पताल की मिसाल दी जा सकती है। धर्म की इसी व्याख्या से उबरने के लिए अस्पताल में बेटी के जन्म पर जश्न मनाने की परंपरा शुरू की गई। पुणे के हडपसर इलाके का मेडिकेयर अस्पताल है ये। अस्पताल के संस्थापक ने इसकी शुरुआत की। कन्या शिशु के जन्म पर अस्पताल का शुल्क भी नहीं लिया जाता। 2007 में ये पहल की गई कि कन्या शिशु को जन्म देने वाली महिलाओं के लिए अस्पताल का शुल्क माफ कर दिया जाए। फिर चाहे शिशु का जन्म सामान्य तरीके से हो या ऑपरेशन द्वारा। बच्चे के जन्म के बाद मां को दी जाने वाली चिकित्सकीय सुविधा भी मुफ्त उपलब्ध कराई जाती है। तब से करीब तीन सौ बच्चियों का जन्म यहां हो चुका है। ये पहल कन्या भूण हत्या रोकने और लैंगिक पूर्वाग्रहों को खत्म करने के लिए किया गया।

धर्म से ही आज भी समाज, शिक्षा, साहित्य में भी स्त्रियों की स्थिति तय हो रही है। इसी की देन है कि एक ही घर और माता-पिता की संतान होने के बावजूद बेटे और बेटी की परवरिश बिलकुल अलग तरह से की जाती है। खाने की थाली से लेकर स्कूल-कॉलेज तक बेटियां अपने ही मां-बाप के भेदभाव की शिकार होती हैं। बात-बात पर बेटियां दिल मसोस कर रह जाती हैं और भाइयों को मिलने वाले लाड-उपहार से अपनी स्थिति की तुलना करती हैं। ज्यादातर इस उम्र तक पहुंचते-पहुंचते ये मान चुकी होती है कि लड़की होने का मतलब कुछ ऐसा ही होता है। उनकी सोच की कोमल-नम जमीन पर गुलाम मानसिकता के बीज बो दिये जाते हैं। धर्म और धर्म की व्याख्या करते लोग उन्हें इतना डरा देते हैं कि इससे इतर सोचने की हिम्मत भी वो नहीं जगा पातीं। यहां अंजू की बात करते हैं जो अपनी चचेरी छोटी बहन को समझाने की कोशिश कर रही थी कि हम लड़कियां हैं, लड़कियों को कहां इतना कुछ मिलता है, भाई लोग बाहर जाते हैं, दुनिया चलाते हैं उनका हिस्सा हर चीज में ज्यादा होता है। छोटी बहन को बड़ी बहन की ये बातें समझ नहीं आईं बल्कि उनकी सोच की लाचारी पर हंसी आई।

शिक्षा के हथियार से लड़कियां इस व्यवस्था से लड़ रही हैं। उनके जीवन में कई स्तरों पर बदलाव भी आए। मां-बाप भी पुरानी सोच से आगे बढ़ रहे हैं लेकिन घर्म में लड़कियों को वो मुक्ताकाश अभी हासिल नहीं हुआ।

धर्म में स्त्री के साथ मनुष्य से ज्यादा वस्तु की तरह व्यवहार किया गया। विवाह पर एक स्त्री को गहनों से लाद या जकड़ दिया जाता है। सिंदूर की व्याख्या कुछ इस तरह कर दी गई कि कोई लड़की न चाहे तो भी इस रंग से खुद को दूर नहीं कर पाती। चुटकी भर नारंगी लाल पाउडर को पति की उम्र से जोड़ दिया गया। चूड़ियां, पायल यहां तक कि पैरों की उंगलियों में भी बेड़ियां जकड़ दी गई। प्रथा के तौर पर कान-नाक छेदना, धर्म के हथकडे से लड़की को इसके लिए बाधित कर दिया गया। पढ़ी लिखी महिलाएं भी इन बेड़ियों से अबतक आजाद नहीं हो सकी हैं। हमारे मोहल्ले में एक आईएएस महिला का उदाहरण कुछ इस तरह दिया जाता था कि देखो आईएएस होते हुए भी वो अपनी सास के सामने सिर पर से पल्लू नहीं हटाती, पति के आगे चूं तक नहीं करती। पति थप्पड़ भी मार दे तो सह लेती है। मुझे लगा कि वो महिला आईएएस बनी ही क्यों। वो महिला आईएएस ज्यादा दया की पात्र थी। महानगरों में मॉल में शॉपिंग करती, क्लबों में बैठी शादीशुदा महिलाओं पर भी नजर उडाइये, सभी चूड़ी, बिछिया से लैस होंगी कि इसी से उनके पतियों की उम्र जुड़ी है। धर्म की व्यवस्था में स्त्री को जगह पुरुष की जरूरत पूरी करने के लिए एक देह की तरह हो है। स्त्री की शारीरिक जरूरतों की धर्म बात तक नहीं करता। एक पुरुष के कई स्त्रियों के साथ शारीरिक संबंध को तो स्वीकृति दे देता है और एक जवान लड़की के गुजर गए पति की चिता पर या तो उसे जला देता है या फिर उसके लिए विधवापा की क्रूर व्यवस्था कर देता है।

धर्म दरअसल पुरुषों का महिलाओं पर नियंत्रण के लिए बनाया गया हथियार बन गया। लक्ष्मी के पति को गुजरे दस साल हो गए। मैंने उनसे पूछ कि धर्म को आप अपने लिए किस तरह देखती है। उनका जवाब था कि हम औरते पति के लिए व्रत करती है, बच्चे के लिए प्रत करती है हमारे लिए कोई बात नहीं करता। महिलाओं के लिए ही सारे नियम तय किये गये। एक व्यक्ति की पत्नी की मौत होती है तो उस हो पर कोई अंकुश नहीं लगता, कोई नियम तय नहीं होते, वो आजाद होता है। लेकिन एक महिला के पति की मौत जाती है तो उस पर इतने नियम लागू कर दिये जाते है कि वो चप्पल न पहने, बाल काट दिये जाते हैं, मांसाहार का सेवन करनेवाली महिला के खाने पीने पर रोक लगा दी जाती है, वो सिर्फ समाज में ही उपेक्षित और दया की पात्र नहीं बनती बल्कि परिवार में भी अलग-थलग कर दी जाती है। लक्ष्मी पूछती है इस धर्म ने मुझे क्या दिया।

धर्म के नाम पर कितने दंगे झेलते आए हैं हम। दगों के दौरान महिलाओं से किस तरह का व्यवहार किया जाता है। गुजरात में हुई अल्पसंख्यक विरोधी हिंसा की जांच की रपट बताती है कि हिंदुत्ववादियों ने मुसलमान महिलाओं को बेइज्जत किया, उन्हें नंगा करके परेड करायी, उनके गुप्तांगों में सलाखें डाली, सामूहिक बलात्कार कर उन्हें जिंदा जला दिया। मुजफ्फरनगर दंगों में भी मुस्लिम महिलाओं से बलात्कार की रिपोर्ट दबा दी गई।

इसे धर्म से ही जोड़ कर देखिए। टाटा मेमोरियल में पाका रिसर्च की गई थी। एक क्लास के बच्चों से एक वैज्ञानिक की तस्वीर बनाने को कहा गया। ज्यादातर ने उलझे बालों वाले व्यक्ति को किसी लेबोरेट्री में टेस्टट्यूब लिए कुछ प्रयोग करते चित्रित किया। उन बच्चों में से किसी ने किसी महिला वैज्ञानिक की तस्वीर नहीं बनायी। रिसर्च में बताया गया कि कैसे स्कूल की किताबों में किसी राधा को सिलाई करते और झाडू लगाते दिखाया जाता है और मोहन को बस्ता लिए स्कूल जाते। वहीं से बच्चों के मन में स्त्री-पुरुष को ऐसी तस्वीर गढ़नी शुरू हो जाती।

उस रिसर्च के कुछ साल बाद अप्रैल 2012 की ही बात है कि देश एक मिसाइल वुमन की बात कर रहा गया। देसी थॉमस और एन. वालारमथी ने अग्नि-5 मिसाइल की सफलता से दुनियाभर में भारत की साख और धमक बड़ा दी। ये हमारी महिला वैज्ञानिकों की उपलब्धि थी। जिनकी बदौलत भारत सुपरपावर बनकर दुनिया के विशिष्ट देशों को श्रेणी में आ खड़ा हुआ। अग्नि परियोजना की निदेशक थी टेसी थॉमस और देश की अकेली महिला वैज्ञानिक जो किसी महत्वपूर्ण वैज्ञानिक परियोजना का नेतृत्व कर रहीं थीं। अग्नि-5 पांच हजार किलोमीटर की मारक क्षमता का मिसाइल है। हमारा धर्म हमें टेसी बॉमस तक नहीं ले जाता बल्कि अबला तेरी यही कहानी आचल में दूध आखों में पानी की बात करता है।

बात जहां से शुरू ही थी कि धर्म का इस्तेमाल स्त्रियों के खिलाफ हथियार की तरह किया गया। स्त्री की आजादी को रोका गया। स्त्री के विकास को रोका गया। धर्म स्त्री के सशक्तिकरण को रोकता है।

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