गौरी तिवारी
मानव सभ्यता का निरंतर विकास हुआ है, भले ही उसकी गति धीमी हो किंतु निरंतर विकासशील रही है। लेकिन इसी विकास की चकाचौंध में भागते लोग एक स्वार्थी और हिंसक शेर के समान बन गए हैं। जहां शेर जंगल का राजा होता है और एक राजा का कर्तव्य होता है अपनी प्रजा की रक्षा करना लेकिन यहां शेर रूपी शहर अपनी प्रजा की रक्षा नहीं अपितु शोषण कर रहा है। आजकल यह देखा जा सकता है कि किस प्रकार शहर, शेरों का जंगल बन चुके हैं और यहां शेर जंगल के राजा के साथ-साथ शिकारी भी है। वह शक्ति, आक्रामकता और सर्वाइवल ऑफ द फिट्टेस्ट का प्रतीक है। शहर आज वह कंक्रीट जंगल बन चुका है, जहाँ कॉर्पोरेट टाइकून, बिलियनेयर और राजनीतिक-आर्थिक अभिजात वर्ग जैसे कुछ शेर मुनाफे के लिए लाखों-करोड़ों आम लोगों का शिकार करते हैं।
यहां सामूहिक भलाई की आड़ में व्यक्तिगत लालच की बात की जाती है। आज के समय में पूंजी का संकेंद्रण है, जो शक्ति का संकेंद्रण पैदा करता है। शहर इस प्रक्रिया का केंद्र इसलिए बनते हैं क्योंकि शहरों में रियल एस्टेट, स्टॉक मार्केट, बैंकिंग, उद्योग और उपभोक्ता बाजार केंद्रित होते हैं। परिणामस्वरूप, शहर शोषण और असमानता का प्रतीक बन जाते हैं। हम देख सकते हैं कि गांव का एक गरीब किसान साल भर कितनी मेहनत करके फसल तैयार करता है लेकिन उसे उस फसल और सब्जियों का उतना मूल्य भी नहीं मिलता जितनी उसकी लागत लगती है, एक कुंटल का भाव मात्र 1000 रुपए दिया जाता है लेकिन वही सब्जियां और अनाज जब शहर में बेचे जाते हैं तो बिचौलिए उसके दस गुने दाम पर बेचते हैं और जो आलू गांव का गरीब किसान 2 रूपये किलो पे बेचता है उसे शहर में 20 रुपए किलो की कीमत पर बेचा जाता है। उस गरीब किसान के पास फसल उगाने हेतु लिए गए क़र्ज़ को चुकाने तक के पैसे नहीं बचते और जो किसान कई कुंटल सब्जियां और अनाज उगा रहा है उसका परिवार भूखे सोता है। गरीबी और कर्ज चुकाने की चिंता में कई किसान आत्महत्या तक करने पर मजबूर हो जाते हैं।
आज के आधुनिक युग में शहर पूंजी के संचय का सबसे बड़ा मैदान है। लेकिन यदि गौर किया जाए तो यह सामने आता है कि इस संपत्ति का संचय दूसरों की बेदखली द्वारा किया गया है। जहां एक ओर बिलियनेयरों की संपत्ति में इतनी तेजी से वृद्धि हो रही है वहीं दूसरी ओर विश्व के अरबों गरीब लोग हैं जिनकी कुल संपत्ति भी इन बिलेनियरों की संपत्ति की बराबरी नहीं कर सकती। यही असमानता की एक अदृश्य रेखा है जिसकी मुख्य भूमिका शहर निभाते हैं। मुंबई, दिल्ली-ऐनसीआर, बेंगलुरु जैसे भारतीय महानगरों में एक तरफ अंबानी का एंटीलिया या गेट्स जैसे बिलियनेयरों की संपत्ति है, तो दूसरी तरफ लाखों लोग स्लम में रहते हैं। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, भारत के प्रमुख शहरों में लगभग आधी शहरी आबादी स्लम में रहती है। मुंबई, दिल्ली और कोलकाता जैसे शहरों के स्लमों में पानी, स्वच्छता, स्वास्थ्य सुविधाएँ बेहद अपर्याप्त हैं यहां लोगों को पानी भी पर्याप्त मात्रा में नहीं मिलता जिसके कारण वहां रह रहे लोगों को कई बीमारियां हो जाती हैं जिनके इलाज बिना उनकी मृत्यु हो जाती है।
इस चेन को इस प्रकार से समझा जा सकता है:
शहर का अदृश्य जाल→ निजी मुनाफा → भूमि और संसाधनों का निजीकरण → गरीबों का विस्थापन → स्लम विस्तार।
बिल्डर और कॉर्पोरेट शेर इन शहरों में जमीन हड़पते हैं, हाई-राइज बनाते हैं और गरीबों को किनारे कर देते हैं। इन लोगों द्वारा भारत के लोगों के लिए ऐसे प्रोजेक्ट्स बनाए गए जिसके नाम पर लाखों किसानों और मजदूरों को विस्थापित किया। जिसका परिणाम यह हुआ कि शहरी गरीबी बनी रही, जबकि अमीरों की संपत्ति आसमान छू गई।
आई.टी. हब बेंगलुरु या गुरुग्राम में लाखों युवा “कॉर्पोरेट स्लेव्स” बनकर बर्नआउट और डिप्रेशन झेलते हैं। इसके साथ ही एक ऐसी मुक्त बाजार प्रणाली भी बहुत प्रसिद्ध हो रही है जिसमें पारंपरिक पूर्णकालिक नौकरियों के बजाय अल्पकालिक या फ्रीलांस अनुबंधों पर काम किया जाता है जैसे ऊबर, जोमैटो, स्विगी जैसी कंपनियों ने लाखों युवाओं को अस्थिर रोजगार में धकेल दिया। इनमें जो लोग डिलीवरी डिलीवरी देने आते हैं वे सीधे रूप से इन कंपनियों के मालिकों यानी शेरों के शिकार बन जाते है क्योंकि इन्हें इनकी नौकरी के लिए कोई सुरक्षा और कोई लाभ नहीं मिलता। इनका शोषण किया जाता है।
शहरों में मॉल, लक्जरी ब्रांड और सोशल मीडिया “खरीदो और खुश रहो” का नारा देते हैं, लेकिन वास्तव में यह मानसिक तनाव बढ़ाता है। अक्सर अखबारों में खबर छपती है कि शहरी क्षेत्रों में डिप्रेशन और चिंता की दर ग्रामीण क्षेत्रों से दोगुनी है। प्रतिस्पर्धा इतनी तीव्र है कि इंसान इंसान का शत्रु बन जाता है – हर कोई सिर्फ अपने बारे में सोचता है, स्वार्थ के कारण वह स्वः तक सिमट कर रह गया है। यह ठीक उसी प्रकार है, जिस प्रकार शेर के जंगल में कमजोर का कोई स्थान नहीं। शहरों में निजी अस्पताल मुनाफा कमाते हैं, जबकि सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था ध्वस्त है। कोविड महामारी के समय शहरों (विशेषकर झुग्गियों) में गरीबों की मौत दर ज्यादा थी, क्योंकि शहरी पूंजीवाद ने स्वास्थ्य सेवाओं को लाभ का साधन बना रखा था।शहरों का यह आक्रमण एक पर्यावरणीय विनाश का स्वरूप भी ले सकता है क्योंकि शहरों में प्रदूषण, ट्रैफिक, जल संकट, ग्लोबल वार्मिंग ये भी अपने चरम पर हैं। बिल्डरों ने अपने मुनाफे के लिए हरे क्षेत्रों को कंक्रीट में बदलना शुरू कर दिया है बिना यह सोचे कि उसका कितना दुष्परिणाम हो सकता है क्योंकि उनके लिए मुनाफा पहले, पर्यावरण बाद में है।आधुनिकता और विकास की इस दौड़ में शहर अपने मुनाफे के लिए गरीब किसान और गांवों का शोषण करता जा रहा है जिसके कारण एक तबका अमीर बनता जाएगा और एक तबका उतना ही गरीब। हमें यह समझना होगा कि जब तक हम स्वः से हटकर सर्वोदय भावना नहीं जगाएंगे तब तक शहर शोषणकर्ता और गांव शोषित वर्ग ही बनके रह जाएंगे।
