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प्रभुता की ओट (लघुकथा)

गौरी तिवारी

 

शाम के 7 बजते ही, सूरज भारी मन लिये ऑफिस की मेज से अपना ज़रूरी सामान उठाने लगा जिसमें वह फाइल भी शामिल थी जिसके लिए उसने कई हफ्तों रातभर जागकर कड़ी मेहनत की थी। ऑफिस में ज्यादा बात भी नहीं किया उसने, चुपचाप अपना सामान बटोरकर इस भांति निकला कि मानो यहां कभी लौटकर दुबारा नहीं आयेगा। समय के साथ साथ भाग्य ने भी आज उसका साथ नहीं दिया, रिक्शा न मिलने के कारण उसे ऑफिस से बस स्टैंड पैदल ही जाना पड़ा। वसन्त ऋतु के बावजूद मौसम में एक उदासी थी, निराशा का ऐसा अंधेरा था जो आशा की लौ को हवा के तेज झोंको से बार बार बुझा दे रहा था। तभी सड़क के किनारे-किनारे चलते समय उसके सिर पर एक पेड़ से पीला पत्ता टूटकर गिरता है और सहसा उसके मन में विचारों का सैलाब उठने लगा कि कैसे संसार में सिर्फ एक वर्ग या एक पहलू का प्रभुत्व रहता है, संपन्नता, सुख और ताकत की ओट में दुःख, निराशा, हीनता और निर्बलों की पीड़ा को ढका जाता है। यहां तक कि प्रकृति में भी वृक्ष ने उन पुराने, पीले पड़ चुके पत्तों को बड़ी निष्ठुरता से खुद से अलग कर दिया। एक समय पर जो उसकी शाखाओं से लिपटे हुए थे, अब वही एक-एक कर टूटकर धरती पर गिर रहे थे। वृक्ष ने नये हरे पत्तों की ओट में पुराने पड़ चुके पीले पत्तों की व्यथा और कथा को इस प्रकार ढक दिया मानो उनका कभी कोई अस्तित्व ही न हुआ करता था और न ही वृक्ष पर उनके ही स्थान शेष हो।

अपने मन के उठते सैलाब को थामते हुए तेज कदमों से बस स्टैंड की ओर बढ़ता है। लेकिन वहां पहुंचकर देखता है कि शाम के अंधेरे में भी बस स्टैंड का बोर्ड दूर से ही दिखाई देने लगा, मानो सड़क की कायापलट हो गई हो और अब वह पहले से भी अधिक अच्छी लग रही थी, चारों तरफ रोशनी, सफाई और हरियाली। तभी उसकी नज़र सड़क के किनारे जाती है और वह देखता है कि सड़क के किनारे किनारे करीबन काफी दूर तक तिरपाल से दीवार बनाकर घेरा बनाया गया है। उसकी आँखें उसी तिरपाल पर टिक जाती हैं और उनमें एकाएक भूखे, बेघरों की तस्वीरें छप जाती हैं। सूरज जितना अपने मन की व्यथा को रोकना चाहता है उतनी ही उसे अपने चारों ओर पीड़ा और व्यथा दिखाई देने लगती है। वह एक बार फिर अपना ध्यान भटकाने का प्रयास करता है और बस में चढ़ जाता है।

बस में शाम की कभी न खाली होने वाली भीड़ के बीच वह हवाई जहाज से भी तेज गति में गड्ढों में कूदती हुई बस से अपने घर जाता है। उसके चेहरे की उदासी और थकावट सिर्फ एक दिन की नहीं अपितु वर्षों की लग रही थी, जैसे ही वह घर पहुंचता है उसकी माँ पूछती हैं –
“क्या हुआ बेटा? कैसा बोला तुमने मीटिंग में?”
सूरज बोलते बोलते रुक जाता है, उसके गले से निकलती आवाज़ मानो किसी चीज से टकराकर वापस नीचे चली गई हो। वह चाहता है कि अपनी मां से साझा करे कैसे एक हफ्ते अकेले सारी मेहनत कर प्रेजेंटेशन तैयार करने के बाद भी, सबसे अलग और नवीन सुझाव देने के पश्चात भी उसे उसकी मेहनत के लिए पिछले 3 वर्षों से कभी सराहा नहीं गया। बल्कि उसके साथ वाले और बाद में आए ऐसे कर्मचारियों का प्रमोशन हो गया जिन्होंने आज तक संस्था के हित में कुछ नहीं किया है, अफसरों की जी हुजूरी की है।

वह सभी बातें मन में दबाते हुए अपनी मां से कहता है – “मौका नहीं मिला मां। आज इससे भी बेहतर एक कंपनी के लिए अप्लाई किया है।”

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