Tuesday , 13 October 2026
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बढ़ते विज्ञान और तकनीक के बीच घटता धैर्य

­सही ही कहा गया है कि गंतव्य से अधिक महत्वपूर्ण यात्रा होती है, क्योंकि कई बार यात्राएं हमारा परिचय उन स्थितियों से करवाती हैं जो जीवन के विभिन्न रंगों से मिलवाती हैं, कई बातें सिखाती है और कई बातों पर सोचने पर मजबूर कर जीवन को एक नयी दिशा प्रदान करती हैं। व्यक्ति के जीवन की सार्थकता सिर्फ उस बिंदु तक पहुँच जाने में नहीं है, जहाँ उसका स्वप्न पूर्ण हो जाता है, अपितु उन अनगिनत पगचिह्नों में निहित है, जो उसे उस गंतव्य तक ले जाते हैं। गंतव्य हमें उपलब्धि देता है, किंतु यात्रा हमें अनुभव, दृष्टि और आत्मबोध प्रदान करती है। किसी पर्वत की चोटी पर खड़े होकर प्राप्त होने वाला गौरव क्षणिक हो सकता है, परंतु उस चोटी तक पहुँचने के लिए पार की गई पगडंडियाँ, झेले गए उतार-चढ़ाव, थकान, असफलताएँ और पुनः उठ खड़े होने का साहस मनुष्य के व्यक्तित्व में स्थायी रूप से अंकित हो जाते हैं। जीवन भी ऐसी ही एक अनवरत यात्रा है, जिसमें प्रत्येक पड़ाव हमें कुछ सिखाता है और प्रत्येक ठोकर हमारे भीतर किसी नए विवेक का जन्म करती है।

बीते कल तड़के मामूली जांच के लिए अस्पताल जाना पड़ा। घर से निकलते हुए मन में यही विचार आया कि हमारे समय ने यात्रा ही नहीं, संचार को भी कितना सहज और त्वरित बना दिया है। कैब चाहिए तो मोबाइल पर ऐप डाउनलोड करो और फिर कुछ ही मिनटों में गाड़ी आपके घर के नीचे, किसी को सूचना देनी हो तो एक मैसेज, किसी से बात करनी हो तो एक क्षण में कॉल, मानो विज्ञान और तकनीक ने जीवन की जटिलताओं को सरल कर दिया हो। कैब बुक की और कुछ ही देर में गाड़ी घर के बाहर थी, शनिवार का दिन था इसलिए सड़क पर भीड़ अपेक्षाकृत कम थी। खिड़की के पास बैठकर रास्ते भर बाहर देखती रही कि कैसे शहर धीरे-धीरे जाग रहा था, सड़क शांत थीं और महसूस हुआ कि तकनीक ने सचमुच हमारे जीवन से कितनी भागदौड़ कम कर दी है। लेकिन इसी सहजता के भीतर आधुनिक जीवन का एक विरोधाभास भी छिपा दिखाई देता है। संचार के साधन जितने तेज हुए हैं, हमारी प्रतीक्षा करने की क्षमता शायद उतनी ही कम हो गई है। लोगों को हर बात का उत्तर तुरंत चाहिए, उनका हर काम बिना विलंब के पूरा होना चाहिए और जरा-सी रुकावट भी उन्हें बेचैन कर देती है। यह जल्दबाजी तथा धूमिल होता धैर्य सिर्फ हमारी दिनचर्या तक सीमित नहीं रहा, धीरे-धीरे हमारे व्यवहार में भी उतर आया है। छोटी-सी असहमति पर हम संवाद करने के बजाय उलझ पड़ते हैं, कुछ क्षण की प्रतीक्षा हमें खलने लगती है और अपने से भिन्न व्यक्ति को समझने से पहले ही उससे बहस करने, उसे गलत सिद्ध करने अथवा उससे लड़ने को तत्पर हो जाते हैं। अस्पताल पहुंचते ही दिखाई पड़ा कि जितनी खाली रास्ते की सड़क थी उतनी ही अस्पताल के मुख्य द्वार पर भीड़। उस भीड़ को देखकर आभास हुआ कि जिन्हें लगता है कि संसार में उससे दुखी कोई नहीं है लेकिन जब आप अपने घर की चार दीवारी से बाहर निकलते तब ज्ञात होता है कि संसार में सिर्फ सुख का ही एक पहलू नहीं है, अपितु एक पहलू कष्ट और दुख का भी है। जहां एक ओर उस भीड़ में ऐसे कई लोग थे जो अपरिचितों से भी इस प्रकार अपना सुख दुख साझा कर रहे थे जैसे वर्षों से एक दूसरे को जानते हों, वहीं दूसरी ओर ऐसे भी लोग थे जो छोटी-छोटी बातों पर इस प्रकार झगड़ने पर उतारू थे मानो उनके भीतर की ज्वाला को सिर्फ एक चिंगारी की आवश्यकता हो। एक बात जो घर से निकलने के साथ अस्पताल तक सामान्य थी, वह था छोटी छोटी बातों पर लोगों का बहस करना, क्रोध करना। अस्पताल जैसी जगह पर जहां लोगों के हृदय में एक दूसरे के प संवेदना तथा करुणा होनी चाहिए वहीं मैंने देखा कि पर्ची बनवाने तथा चिकित्सक को दिखाने के लिए पंक्ति में खाड़े लोग सिर्फ इसलिए बहस कर रहे थे और लड़ रहे थे कि वह कतार में दो कदम आगे खड़ा हो सकें। जहां मैं बैठकर प्रतीक्षा कर रही थी वहीं दायीं ओर कुछ दूरी पर लगभग 9-10 माह का एक बच्चा रो रहा था और उसे शांत कराने, उसकी बात सुनने या उसे गोद में लेने के बजाय उसकी माँ ने उसके हाथ में मोबाइल थमा दिया गया। कुछ क्षण पहले जिस डिजिटल सुविधा ने यात्रा को सहज बनाया था, वही सुविधा अब मनुष्य के व्यवहार में अधैर्य का एक विचित्र रूप भी दिखा रही थी। बात प्रतीक्षा की हो या धैर्य की, कुछ मिनटों की अवधि भी जैसे असह्य हो गई है। हमारी उँगलियाँ स्क्रीन पर कुछ क्षण ठहरने को तैयार नहीं, तो जीवन के कठिन पड़ावों में हमारा मन कैसे शांत रहेगा?

स्थिति तो यह हो गई है कि एक छोटा सा वाक्य कहने पर उसके जवाब में दूसरा शब्द पहले से अधिक तीखा होकर लौटता है। फिर तीसरा, चौथा और देखते-देखते संवाद का स्थान विवाद ले लेता है। मामूली सी छोटी छोटी बातों पर लोग बड़ी प्रतिक्रिया देने लगे हैं। नतीजतन कभी एक टिप्पणी, एक असहमति, बड़े द्वेष का कारण बन जाती है। जैसा मैंने पहले भी बताया, हमारे समय की विडंबना यही है कि संचार के साधन बढ़े हैं, लेकिन संवाद का धैर्य घटा है। डिजिटल युग ने हर व्यक्ति को अभिव्यक्ति का मंच दिया है। जिस गति से विचार अब क्षण भर में हजारों लोगों तक पहुँच सकते हैं, उसी गति से प्रतिक्रियाएँ भी फैलती हैं। असहमति कई बार तर्क का अवसर बनने के बजाय आक्रोश का कारण बन जाती है। धीरे-धीरे विचार और व्यक्ति के बीच का अंतर मिटने लगता है। हम किसी विचार का विरोध करते-करते उसके समर्थक को ही विरोध का लक्ष्य बना लेते हैं। यहीं से ‘हम’ और ‘वे’ की मानसिकता जन्म लेती है और सामाजिक ध्रुवीकरण अपनी जड़ें गहरी करने लगता है। यह ध्रुवीकरण केवल राजनीतिक मतभेदों तक सीमित नहीं। जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, विचारधारा, पीढ़ी और जीवन-दृष्टि, हर स्तर पर मनुष्य अपने-अपने घेरे बना सकता है। समस्या भिन्नता में नहीं, भिन्नता को शत्रुता में बदल देने में है। जब किसी व्यक्ति को उसके विचार से पहले उसकी पहचान के आधार पर देखा जाने लगे, तब संवाद की संभावना सिकुड़ने लगती है। ऐसे समय में कबीर का दोहा आज भी प्रासंगिकता लिए है।
“आवत गारी एक है, उलटत होय अनेक।
कह कबीर नहिं एक गारी, उलटत होय अनेक॥”

‘गारी’ यहाँ केवल अपशब्द नहीं, कटुता की उस पहली चिंगारी का प्रतीक है, जो प्रतिक्रिया पाकर बढ़ती जाती है। एक कटु वाक्य का उत्तर दूसरे कटु वाक्य से दिया जाता है और देखते ही देखते मूल विषय पीछे छूट जाता है। बचता है केवल अहंकार, आरोप और प्रत्यारोप। आज के डिजिटल संसार में यह प्रक्रिया और तीव्र हो गई है। स्क्रीन हमें उत्तर देने की सुविधा देती है, ठहरने की बाध्यता नहीं। हम पढ़ने से पहले प्रतिक्रिया देते हैं, समझने से पहले निर्णय सुनाते हैं और कई बार तर्क का उत्तर तर्क से नहीं, व्यक्ति पर टिप्पणी करके देते हैं। कबीर इसी क्रम को तोड़ने का आग्रह करते हैं। दूसरे की कटुता को अपने भीतर उतारकर लौटाना हमारी विवशता नहीं है। लेकिन सामाजिक ध्रुवीकरण केवल दूसरे की भाषा से नहीं बनता; वह हमारी अपनी दृष्टि से भी बनता है। इसी बिंदु पर कबीर का दूसरा दोहा हमारे सामने आता है—
“बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥”

यह दोहा आधुनिक मनुष्य की उस आदत पर सबसे गहरी चोट करता है, जिसमें वह हर समस्या का कारण बाहर खोजता है। हमें दूसरे का पूर्वाग्रह दिखाई देता है, अपनी धारणाएँ नहीं; दूसरे का अहंकार दिखाई देता है, अपनी जिद नहीं; दूसरे का क्रोध दिखाई देता है, अपनी कठोरता नहीं। हमारे पास दूसरों को देखने के साधन अनंत हैं, सोशल मीडिया पर हम लोगों के विचार, व्यवहार और प्रतिक्रियाओं को लगातार देखते हैं। लेकिन इस बाहरी दृष्टि के बीच आत्मनिरीक्षण का अवसर कम होता जा रहा है। हम यह पूछने में अधिक रुचि रखते हैं कि “दूसरा गलत क्यों है?”, जबकि कबीर हमें यह पूछने के लिए रोकते हैं कि “मेरी दृष्टि में ऐसा क्या है, जो मुझे दूसरे को केवल गलत देखने पर विवश कर रहा है?”

पंद्रहवीं शताब्दी के कबीर के सामने न इंटरनेट था, न सोशल मीडिया और न त्वरित संचार की यह दुनिया। फिर भी उन्होंने मनुष्य के भीतर के उस आग्रह को पहचान लिया था, जो उसे अपने मत को अंतिम सत्य मानने और दूसरे को खारिज करने की ओर ले जाता है। उनके समय में सामाजिक और धार्मिक विभाजन थे; आज उनके रूप और माध्यम बदल गए हैं। समय बदला है, मनुष्य की कई प्रवृत्तियाँ नहीं। कबीर हमें मतभेद समाप्त करने का संदेश नहीं देते। वे जानते हैं कि भिन्नता जीवन का स्वाभाविक सत्य है। उनका आग्रह इससे अधिक मानवीय है: मत अलग हो सकते हैं, मनुष्य नहीं।

आधुनिक समाज की शक्ति इस बात में नहीं कि उसमें सभी एक जैसा सोचें, बल्कि इस बात में है कि अलग सोचने वाले लोग भी संवाद कर सकें। असहमति लोकतांत्रिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है; उसे वैमनस्य में बदल देना सामाजिक जीवन की क्षति है। किसी विचार का विरोध किया जा सकता है, पर उसके कारण व्यक्ति की मनुष्यता को नकारना आवश्यक नहीं, यह दोनों दोहे इसी विवेक की ओर ले जाते हैं। पहला कहता है, कटुता की श्रृंखला को वहीं रोक दो जहाँ वह तुम तक पहुँची है। दूसरा कहता है, दूसरों में दोष खोजने से पहले अपनी दृष्टि को परखो।

इन दोनों को साथ पढ़ने पर कबीर की वाणी केवल व्यक्तिगत आचरण का पाठ नहीं रह जाती; वह हमारे सामाजिक जीवन के लिए भी एक गहरी चुनौती बन जाती है। क्योंकि समाज की बड़ी दरारें हमेशा बड़े संघर्षों से नहीं बनतीं। वे उन छोटे-छोटे क्षणों से भी बनती हैं, जब हम किसी दूसरे को सुनने से इनकार करते हैं, उसकी पहचान को उसके विचार का विकल्प बना देते हैं या उसकी एक गलती को पूरे समूह का सत्य मान लेते हैं। आज आवश्यकता यह नहीं कि हम सभी एक मत हो जाएँ। आवश्यकता यह है कि मतभेद के बीच मनुष्यता बची रहे।

शायद यही कबीर की सबसे बड़ी समकालीनता है। उन्होंने हमें एकरूपता नहीं, आत्मबोध दिया, मौन नहीं, विवेकपूर्ण वाणी दी, और दूसरों को बदलने से पहले स्वयं को देखने की दृष्टि दी। आज जब एक शब्द अनेक शब्दों में बदलकर सामाजिक दूरी बढ़ा सकता है, तब कबीर हमें उस एक क्षण की कीमत समझाते हैं, जिसमें मनुष्य प्रतिक्रिया देने से पहले ठहरता है। क्योंकि सामाजिक शांति हमेशा बड़े सिद्धांतों से शुरू नहीं होती, कभी-कभी वह बस इतनी-सी बात से शुरू होती है कि किसी ने कटु शब्द कहा और हमने उसे आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया।

गौरी तिवारी

1 Comment

  • ज्योतिषाचार्य अरुण कुमार मिश्र "प्रेरक-वक्ता" says:

    दिव्य प्रस्तुती

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