अतिआधुनिकता के नाम पर समाज स्थापित मूल्यों से हटकर बेहिचक कुछ भी कर लेने को राजी है। विकास की अंधी दौड़ ने अधिकांश लोगों को सर्वे भवंतु सुखिन की जगह स्वार्थ से भर दिया है। आगे निकलने की होड़ में मोहब्बत कम नफरत अधिक है। पलक झपकते सब कुछ हासिल कर लेने की खोखली ललक के चलते लोगों के हृदय में एक दूसरे के प्रति अब नाममात्र की भी संवेदना शेष नहीं है। बीते कल यानी 15 सितंबर को सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के जन्मदिन पर उनको पढ़ते समय मेरी दृष्टि उनकी एक कविता पर पड़ी और देखा कि कितनी बखूबी से वह मानवता के इस प्रश्न को अपनी कविता ‘देश कागज़ पर बना नक्शा नहीं होता’ में पूछते हैं –
“यदि तुम्हारे घर के
एक कमरे में आग लगी हो
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में सो सकते हो?
यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में
लाशें सड़ रहीं हों
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो?
यदि हाँ
तो मुझे तुम से
कुछ नहीं कहना है।”
15 सितंबर 1927 को उत्तर प्रदेश के बस्ती ज़िले में जन्मे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना आधुनिक हिंदी कविता के उन रचनाकारों में हैं, जिन्होंने कविता को जीवन के सबसे सामान्य और सबसे जटिल प्रश्नों से जोड़ा। वे ऐसे समय में लिख रहे थे जब स्वतंत्रता के बाद का भारत अपने नए सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक प्रश्नों से जूझ रहा था। साहित्य में भी केवल सौंदर्य और भावुकता पर्याप्त नहीं रह गई थी, साहित्यकार के सामने यह प्रश्न था कि बदलते समाज में मनुष्य की स्थिति क्या है और कविता उसके पक्ष में किस प्रकार खड़ी हो सकती है। वे कविता लेखन के क्षेत्र में 1950 में आए और एक अत्यंत संवेदनशील कवि साबित हुए। कम समय में उन्होंने अपने समय के लोगों में जो ख़ास जगह दर्ज कराई, उससे वे हिंदी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर बन गए। 1959 में अज्ञेय के संपादन में प्रकाशित ‘तीसरा सप्तक’ के कवि के रूप में भी पहचाने गए। वे आधुनिक हिंदी कविता के ऐसे रचनाकार हैं, जिनकी कविता अपने समय की धूल, धूप, बेचैनी और मनुष्य की पीड़ा से होकर गुजरती है। उन्होंने कविता को केवल सौंदर्य की वस्तु नहीं माना, बल्कि उसे जीवन के उन प्रश्नों से जोड़ा जिनसे मनुष्य प्रतिदिन जूझता है। उनकी रचनाओं में प्रेम है, प्रकृति है, करुणा है, व्यंग्य है, आक्रोश है और सबसे बढ़कर एक ऐसी मानवीय संवेदना है जो अपने समय की चुप्पियों को सुनने का आग्रह करती है।
किसी देश की पहचान केवल उसकी सीमाओं से नहीं होती। मानचित्र पर खिंची रेखाएँ किसी भूभाग की भौगोलिक सीमा निर्धारित कर सकती हैं, किंतु उस भूभाग में धड़कते जीवन, वहाँ की स्मृतियों, संघर्षों, सपनों और संवेदनाओं को परिभाषित नहीं कर सकतीं। देश केवल पर्वतों, नदियों, मैदानों और सीमाओं का विस्तार नहीं, बल्कि उन सबके बीच जीवन जीते मनुष्यों का साझा संसार है। इसी गहरी मानवीय चेतना को सर्वेश्वर दयाल सक्सेना अपनी प्रसिद्ध कविता ‘देश कागज़ पर बना नक्शा नहीं होता’ में अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करते हैं। उन्होंने कविता को सिर्फ सौंदर्य और भावुकता का माध्यम न मानकर उसे अपने समय की विडंबनाओं और मनुष्य के पक्ष में खड़ी संवेदना का स्वर बनाया। उनकी रचनाओं में एक ओर सामान्य जनजीवन की सहजता है, तो दूसरी ओर व्यवस्था की विसंगतियों को पहचानने वाली तीक्ष्ण दृष्टि। वे देश को किसी अमूर्त अवधारणा के रूप में नहीं देखते; उनके लिए देश उस मनुष्य के जीवन में बसता है, जिसकी रोटी, श्रम, पीड़ा, आशा और सम्मान किसी भी राष्ट्र की वास्तविक पहचान हैं।
‘देश कागज़ पर बना नक्शा नहीं होता’ शीर्षक अपने आप में एक गहरी वैचारिक स्थापना है। नक्शा देश की भौगोलिक संरचना को दिखा सकता है, किंतु देश की आत्मा को नहीं। नक्शे पर बनी सीमाएँ स्थिर दिखाई देती हैं, जबकि देश का वास्तविक जीवन निरंतर गतिशील होता है। वहाँ मनुष्य अपने संबंधों, संघर्षों और सपनों के साथ इतिहास रचता है। उनकी दृष्टि में राष्ट्रप्रेम केवल सीमा, प्रतीक या उद्घोष तक सीमित नहीं है। यदि किसी देश में मनुष्य भूखा है, भयभीत है, उपेक्षित है अथवा उसके श्रम और अस्तित्व का सम्मान नहीं है, तो केवल राष्ट्र की भौगोलिक अखंडता को राष्ट्र की पूर्णता मान लेना अधूरा दृष्टिकोण होगा। कवि का राष्ट्रबोध इसी कारण अत्यंत मानवीय और लोकतांत्रिक दिखाई देता है। उनके यहाँ ‘देश’ किसी सत्ता-केंद्र का पर्याय नहीं, बल्कि जनता के जीवन का व्यापक रूप है। खेतों में श्रम करता किसान, अपने श्रम से जीवन चलाता मजदूर, अभावों के बीच भविष्य का स्वप्न देखता युवा और अपने छोटे-से संसार में जीवन की आशा सँजोए सामान्य मनुष्य, ये सभी मिलकर देश की वास्तविक तस्वीर बनाते हैं। इसीलिए सर्वेश्वर का राष्ट्रबोध ऊपर से थोपा हुआ नहीं, बल्कि नीचे से निर्मित होता है। इस कविता को केवल राष्ट्र की अवधारणा पर लिखी कविता मान लेना उसके अर्थ को सीमित कर देना होगा। इसके भीतर एक और गहरा प्रश्न छिपा है, और वह प्रश्न हमारी संवेदनशीलता से संबंधित है।
दूसरे का दुःख देखकर हमारे भीतर क्या घटित होता है?
क्या किसी अनजान व्यक्ति की पीड़ा हमारे हृदय को कसोटकर रखती है?
क्या किसी निर्बल और असहाय का दुख सिर्फ उसका रह जाता है या रस के साधारणीकरण की भांति वह भी हमसे आ मिलता है?
क्या किसी मजदूर की विवशता सिर्फ उसकी समस्या है?
क्या तपती गर्मी में किसी बच्चे का भूख से व्याकुल क्रंदन एक साधारण बात है?
क्या मूक दर्शक की भांति चुपचाप अन्याय होता देखता रहना चाहिए?
सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की यह कविता इन प्रश्नों से बचती नहीं और न ही उनकी कविता पाठक को सुरक्षित दूरी पर खड़े रहने की अनुमति देती है। वह उसे उसके अपने विवेक के सामने खड़ा कर देती है। यहीं से कविता का मानवीय पक्ष उभरता है। देश केवल ‘हम’ और ‘वे’ में विभाजित लोगों का भूगोल नहीं, बल्कि एक-दूसरे के दुःख को पहचानने वाली सामूहिक चेतना है।
Leave a comment