हिन्दी की चुनौतियाँ
अनिल तिवारी
आज हिंदी दिवस है। देशभर में राजभाषा हिंदी के नाम पर विभिन्न अनुष्ठान आयोजित हो रहे हैं। सरकारों की ओर से भी हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए बड़े-बड़े इश्तहार दिए गए हैं। दिल्ली से प्रकाशित एक बड़े हिंदी दैनिक में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए लोगों को प्रेरित करते हुए शुभकामना संदेश जारी किया गया है। हर इश्तहार में शुभकामना के लिए प्रयुक्त वर्तनी में अंतर है। केंद्र सरकार के संदेश में शुभकामनाए में ‘ए’ अक्षर पर चंद्र बिंदु लगी है। दिल्ली सरकार के विज्ञापन में ‘ए’ पर अनुस्वार लगा है। अन्य विज्ञापनों में कहीं ‘ये’ तो कहीं ‘यें’ का प्रयोग किया गया है। यानी एक ही शब्द कम से कम चार प्रकार से लिखा गया है। शुभकामनाऍ, शुभकामनाएं, शुभकामनाये, शुभकामनायें।
हिन्दी को रोमन लिपि में लिखने अर्थात हिंग्लिश का चलन पिछले कुछ वर्षों में अत्यंत तेजी से बढ़ा है। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और डिजिटल संवाद के विस्तार ने इस प्रवृत्ति को और प्रोत्साहित किया है। आज बड़ी संख्या में लोग हिन्दी बोलते हैं, लेकिन उसे देवनागरी के बजाय रोमन लिपि में लिखना अधिक सुविधाजनक समझते हैं।
इस विषय पर हिन्दी जगत में अपेक्षित गंभीर चर्चा दिखाई नहीं देती। कुछ लोग इसे हिन्दी के लिए खतरा मानते हैं, जबकि कुछ इसे आधुनिक संचार की स्वाभाविक आवश्यकता बताते हैं। संभवतः सत्य इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच कहीं स्थित है।
भाषाओं का इतिहास बताता है कि कोई भी भाषा या उसका स्वरूप स्थिर नहीं रहता। संस्कृत से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश और अपभ्रंश से आधुनिक भारतीय भाषाओं का विकास इसी परिवर्तनशीलता का परिणाम है। इसलिए हिंग्लिश जैसी प्रवृत्तियों को पूरी तरह अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता। भाषा समाज के साथ बदलती है और नए माध्यमों के अनुरूप अपने रूप भी बदलती रहती है।
फिर भी यह प्रश्न विचारणीय है कि क्या हिन्दी को रोमन में लिखने की बढ़ती प्रवृत्ति भविष्य में देवनागरी लिपि की स्थिति को प्रभावित कर सकती है। सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर आज “मुझे लगता है” को कोई “mujhe lagta hai” लिखता है, कोई “muje lagta he”, तो कोई “mujhe lahgataa hai”। संप्रेषण तो हो जाता है, परन्तु लेखन का कोई मानक स्वरूप नहीं बन पाता। यदि यही स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो रोमन में लिखी जाने वाली हिन्दी के अनेक रूप विकसित हो सकते हैं।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हिंग्लिश का प्रसार केवल अंग्रेज़ी प्रेम के कारण नहीं हो रहा है। इसके पीछे तकनीकी और व्यावहारिक कारण भी हैं। बहुत-से लोग रोमन कीबोर्ड पर तेज़ी से टाइप कर लेते हैं, जबकि देवनागरी टाइपिंग में उन्हें अधिक समय लगता है। इसलिए हिंग्लिश को केवल हिन्दी-विरोधी प्रवृत्ति मानना उचित नहीं होगा। कलरव पत्रिका के प्रबंध संपादक विक्रम उपाध्याय वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्होंने विभिन्न अखबारों में लंबे समय तक अपनी सेवाएं दी है। वे तकनीकी रूप से भी दक्ष रहे हैं। लेकिन बदलते चलन से उनकी कार्यशैली भी प्रभावित हुई है। पहले वे रेमिंगटन या फोनेटिक कीबोर्ड के जरिए तेजी से कम कर लेते थे, अब वह अपना अधिकांश काम यूनिकोड में करते हैं, उनका पुराना हुनर कमजोर पड़ता जा रहा है। वे टाइपिंग के लिए अब इंग्लिश पर उतर आए हैं।
नीरज कुमार सिंह मूल रूप से हिंदी अंग्रेजी के टाइपिस्ट है। पहले वे 60 -70 शब्द प्रति मिनट की रफ्तार से टाइप कर लेते थे। उनकी टाइपिंग में अशुद्धियां कम होती थी। पर जब से रोमन इंग्लिश टाइप करने लगे हैं, उनकी रफ्तार भी कम हुई है और अशुद्धियों की संभावना अधिक बढ़ गई है। देवनागरी में प्रयोग होने वाले विभिन्न संकेतों को भी तलाश में मैं उन्हें दिक्कत होती है। खाने का आशय यह है की लगभग भूल रहे हैं।
दूसरी ओर, देवनागरी की एक बड़ी विशेषता यह है कि वह मुख्यतः ध्वन्यात्मक लिपि है। साधारणतः जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखा जाता है। इसके विपरीत अंग्रेज़ी में वर्तनी और उच्चारण के बीच कई बार बड़ा अंतर दिखाई देता है। उदाहरण के लिए “put” और “but” की वर्तनी मिलती-जुलती है, लेकिन उच्चारण अलग हैं। यही कारण है कि भाषा सीखने वालों को अंग्रेज़ी उच्चारण में अतिरिक्त कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
हिन्दी वर्णमाला का निर्माण भी अत्यंत वैज्ञानिक माना जाता है। ध्वनियों को उनके उच्चारण-स्थानों के आधार पर व्यवस्थित किया गया है। यह विशेषता भारतीय भाषाई परंपरा की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इसलिए देवनागरी का महत्व केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि भाषावैज्ञानिक दृष्टि से भी है।
इसी कारण प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि हिन्दी देवनागरी में लिखी जाए या रोमन में, बल्कि यह होना चाहिए कि बदलती परिस्थितियों में दोनों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए। यदि बड़ी संख्या में लोग रोमन लिपि का उपयोग कर रहे हैं, तो क्या उसके लिए कुछ मानक नियम विकसित किए जा सकते हैं? उदाहरण के लिए “नाम” को “nam”, “naam” या किसी अन्य रूप में लिखने के बजाय एक स्वीकृत मानक निर्धारित किया जा सकता है। इससे भ्रम कम होगा और भविष्य में भाषा का स्वरूप अधिक व्यवस्थित रहेगा।
विश्व के कुछ देशों ने अपनी भाषाओं के लिए रोमन लिपि का सफल उपयोग किया है। वहीं कई देशों ने अपनी पारंपरिक लिपियों को संरक्षित रखते हुए आधुनिक तकनीक के साथ उनका समन्वय स्थापित किया है। भारत के लिए भी सबसे उचित मार्ग संभवतः यही होगा कि देवनागरी की वैज्ञानिकता और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखते हुए डिजिटल युग की आवश्यकताओं का समाधान खोजा जाए।
मेरे विचार से हिन्दी के भाषाविदों, शिक्षाविदों और तकनीकी विशेषज्ञों को इस विषय पर गंभीर विमर्श प्रारम्भ करना चाहिए। उद्देश्य हिंग्लिश का विरोध करना नहीं, बल्कि उसके स्वरूप को समझना और आवश्यकता पड़ने पर उसके लिए मानदंड विकसित करना होना चाहिए। यदि ऐसा किया जाता है, तो हिन्दी का भविष्य अधिक सुव्यवस्थित और सशक्त हो सकता है।
अंततः यह याद रखना चाहिए कि किसी भाषा की वास्तविक शक्ति उसकी लिपि में नहीं, बल्कि उसे उपयोग करने वाले लोगों में निहित होती है। यदि समाज हिन्दी के प्रति आत्मीयता बनाए रखता है, तो देवनागरी भी जीवित रहेगी और नए माध्यमों में विकसित हुए रूप भी। आवश्यकता भय की नहीं, बल्कि दूरदर्शी और संतुलित विचार-विमर्श की है।
हिन्दी दिवस पर शायद यही सबसे बड़ा प्रश्न है: हमें परिवर्तन का विरोध करना चाहिए या उसे समझकर हिन्दी के हित में दिशा देनी चाहिए?
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