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विज्ञान, गणेश चतुर्थी और उसकी कथा

कलरव

 

भारतीय संस्कृति में कोई भी त्यौहार सिर्फ उल्लास का अवसर नहीं, अपितु जीवन को समझने और समाज को दिशा देने वाला सांस्कृतिक सूत्र भी रहा है। गणेश चतुर्थी ऐसा ही पर्व है, जहाँ आस्था के केंद्र में विराजमान गणपति को बुद्धि, विवेक और ज्ञान का अधिष्ठाता माना गया है। यदि इस पर्व को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए, तो इसके अनेक आयाम हमारे सामने खुलते हैं। तब गणेश चतुर्थी का त्यौहार मात्र पूजा और उत्सव का अवसर नहीं रह जाता, अपितु जिज्ञासा, विवेक, पर्यावरणीय चेतना और वैज्ञानिक उत्तरदायित्व का संदेश देने वाला पर्व बन जाता है। विज्ञान का आरंभ प्रश्न से होता है और ज्ञान की यात्रा जिज्ञासा से। भारतीय परंपरा में भी बुद्धि को अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। गणेश इसी बुद्धि और विवेक के प्रतीक हैं। यही कारण है कि किसी भी शुभ कार्य से पहले उनका स्मरण करने की परंपरा रही है। इस परंपरा को यदि आज के संदर्भ में समझें, तो इसका एक अर्थ यह भी है कि प्रत्येक कार्य का आरंभ विचार, समझ और विवेकपूर्ण निर्णय से होना चाहिए। केवल तकनीक का विकास पर्याप्त नहीं है; उसका सही और मानवीय उपयोग भी आवश्यक है। विज्ञान हमें ज्ञान देता है और विवेक उस ज्ञान को सही दिशा प्रदान करता है।

गणेश चतुर्थी का सबसे रोचक पक्ष प्रतिमा-निर्माण और विसर्जन की प्रक्रिया में दिखाई देता है। परंपरागत रूप से मिट्टी से निर्मित गणेश प्रतिमा पूजा के पश्चात जल में विसर्जित होकर पुनः प्रकृति में लौट जाती है। मिट्टी से निर्मित आकृति का फिर मिट्टी और प्रकृति के व्यापक चक्र में विलीन हो जाना हमें यह समझने का अवसर देता है कि जीवन और पदार्थ किसी स्थिर अवस्था के नाम नहीं हैं, बल्कि परिवर्तन की निरंतर प्रक्रिया हैं।

गणेश जी जो आदि देव भी कहे जाते हैं, ये नव आरम्भ, बाधाओं को दूर करने वाले, सौभाग्य, समृद्धि और बुद्धि देने वाले देवता माने जाते हैं। चौथ की पूजा के रूप में तो गणेश जी की पूजा सभी घरों में की जाती है लेकिन गणेश चतुर्थी के भव्य आयोजन, जुलूस निकालने और फिर विसर्जित करने की शुरुआत महाराष्ट्र से हुई थी। सन् 1893 में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाल गंगाधर तिलक ने हिन्दू राष्ट्रवादी पहचान और ब्रिटिश सरकार के प्रति विरोध जताने के लिए गणेश चतुर्थी के सार्वजनिक उत्सव की शुरुआत की थी। उस समय इस दिन ब्रिटिश शासन के प्रति विरोध जताने के लिए सार्वजनिक स्थानों पर ग्रन्थों का पाठ, भोज, खेलकूद और मार्शल आर्ट आदि प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती थीं।

विशेष रूप से यह गणेश जी के जन्मदिन का उत्सव है जिसे गणेश चतुर्थी, गणेश उत्सव, विनायक चतुर्थी भी कहा जाता है। वैसे तो इसे पूरे भारत वर्ष में मनाया जाता है पर महाराष्ट्र में इसे सभी घरों में व्यक्तिगत रूप से और समाज में सार्वजनिक रूप से पंडाल लगाकर गणेश जी की प्रतिमा की स्थापना करके मंत्रोच्चारण के साथ पूजा की जाती है। भोग में मोदक का प्रसाद चढ़ाया जाता है क्योंकि यह मान्यता है कि गणपति जी को मोदक बहुत प्रिय है। शुरू होने के दसवें दिन अनन्त चतुर्दशी के दिन मूर्ति विसर्जन किया जाता है। गणेश जी की पूजा के समय घरों में एक कहानी पढ़ी जाती है, बूढ़ी दादी मां की। एक बार की बात है भगवान गणेश पृथ्वी पर मनुष्यों की परीक्षा लेने के लिए एक नन्हें बालक का रूप धारण करके आये। वे एक हाथ में एक चम्मच में दूध 1 और एक चुटकी चावल लेकर सभी से यह कहते हुए घूम रहे थे, ‘कोई मेरी खीर बना दो, कोई मेरी खीर बना दो। वे गली-गली घूम-घूम कर आवाज लगा रहे थे कि कोई मेरी खीर बना दो लेकिन कोई भी आगे नहीं आया सभी उनको देखकर हँसने लगते थे। एक ने कहा अरे। बेटा इतने कम दूध और चावल में खीर थोड़ी बनती है और सब हंसने लगे। घूमते-घूमते गणेश जी को शाम हो गई तभी वे एक गरीब बूढ़ी दादी के पास पहुंचे। वे बड़ी दयालु थीं, उन्हें बच्चे पर दया आ गई कि देखो बच्चे की खीर कोई नहीं बनाता है वो बच्चे से कहती हैं ला बेटा मैं तुझे खीर बनाकर खिलाती हूँ और वे एक भगोने में दूध और चावल चढ़ाकर कुछ और काम करने लगती हैं तभी बालक उनसे कहता है ‘दादी बड़ा भगौना चढ़ाओ पूरे गांव को खिलाना है दादी बड़ा बर्तन चढ़ाकर उसमें एक चम्मच दूध और चुटकी भर भर चावल डाल देती हैं और कुछ काम करने लगती हैं, फिर आकर वे देखती हैं तो चकित रह जाती हैं कि उनका बड़ा भगौना भी दूध से भर गया था खूब भगौने भर-भर खीर बनी पूरे गांव में खीर बांटी गई। सभी ने प्रसन्नता से खीर खाई। बूढ़ी दादी की बहू को पता चला तो वह भी आई और उसने एक कटोरी में खीर निकाल कर गणेश जी का स्मरण करते उन्हें भोग लगाकर खीर बालक को खिला दी। जब बालक दादी के पास आये और उन्होंने परोसनी चाही तो उसने जी ने कहा कि मेरा पेट भरा है क्योंकि उनकी बहू ने दरवाजे के पीछे से उन्हें भोग लगा दिया है। तब बूढ़ी काकी को समझ में आ गया कि यह चमत्कारी बालक और कोई नहीं साक्षात गणेश भगवान हैं वह हाथ जोड़कर खड़ी हो गई और प्रार्थना करने लगी। गणेश जी ने बुढ़िया उसके परिवार और पूरे गांव को भरपेट खीर खिलाने के लिए कहा और बची हुई खीर को घर के चारों कोनों में चार बर्तनों में रखने के लिए कहा। अगली सुबह दादी ने देखा कि खीर हीरे मोती में बदल गई है। गणेश भगवान ने उस गरीब बूढ़ी काकी की दरिद्रता हमेशा के लिये खत्म कर दी थी।

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हम सभी को बिना सोचे-समझे अपने आसपास के लोगों की हमेशा मदद करनी चाहिये। हमेशा सबका हित सोचने वाले व्यक्ति का हित भगवान करते हैं, उसके कष्टों को दूर करते हैं और उसकी जिन्दगी को आसान बनाते चलते हैं।

माना जाता है कि भगवान गणेश की पूजा करने के बाद प्रारंभ होने वाला कार्य हर हाल में पूरा होगा। भगवान शिव व माता पार्वती के पुत्र गणेश को विघ्नहर्ता भी कहा जाता है। गणेश चतुर्थी का त्योहार इस बार 14 सितम्बर को मनाया जा रहा है। त्योहार आने से दो-तीन महीने पहले ही कारीगर भगवान गणेश की मिट्टी की मूर्तियां बनाना शुरू कर देते हैं। गणेशोत्सव के दौरान बाजारों में भगवान गणेश की अलग-अलग मुद्रा में बेहद ही सुंदर मूर्तियां मिल जाती है। गणेश चतुर्थी वाले दिन लोग इन मूर्तियों को अपने घर लाते हैं। कई जगहों पर 10 दिनों तक पंडाल सजे हुए दिखाई देते हैं जहां गणेश जी की मूर्ति स्थापित होती हैं। प्रत्येक पंडाल में एक पुजारी होता है जो इस दौरान चार विधियों के साथ पूजा करते हैं। सबसे पहले मूर्ति स्थापना करने से पहले प्राणप्रतिष्ठा की जाती है। उन्हें कई तरह की मिठाईयां प्रसाद में चढ़ाई जाती हैं। गणेश जी को मोदक काफी पंसद थे। जिन्हें चावल के आटे, गुड़ और नारियल से बनाया जाता है। इस पूजा में गणपति को लड्डूओं का भोग लगाया जाता है।

गणेशोत्सव का संबंध देश की आजादी से भी है। महान क्रांतिकारी बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1882 में वन्देमातरम नामक एक गीत लिखा था। जिस पर भी अंग्रेजों ने प्रतिबंध लगा कर गीत गाने वालों को जेल में डालने का फरमान जारी कर दिया था। इससे लोगों में अंग्रेजो के प्रति बहुत नाराजगी व्याप्त हो गयी थी। लोगो में अंग्रेजो के प्रति भय को खत्म करने और इस कानून का विरोध करने के लिए महान स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य तिलक ने गणपति उत्सव की स्थापना की और सबसे पहले पुणे के शनिवारवाड़ा मे गणपति उत्सव का आयोजन किया गया। देश की आजादी के आन्दोलन में गणेश उत्सव ने बहुत महत्वपूण भूमिका निभायी थी। 1894 में अंग्रेजों ने भारत मे एक कानून बना दिया था जिसे धारा 144 कहते हैं जो आजादी के इतने वर्षों बाद आज भी लागू है। इस कानून में किसी भी स्थान पर 5 से अधिक व्यक्ति इकट्ठे नहीं हो सकते थे। और न ही समूह बनाकर कहीं प्रदर्शन कर सकते थे।

1894 से पहले लोग अपने अपने घरो मे गणपति उत्सव मनाते थे। लेकिन 1894 के बाद इसे सामूहिक तौर पर मनाने लगे। पुणे के शनिवारवडा के गणपति उत्सव में हजारों लोगों की भीड उमडी। लोकमान्य तिलक ने अंग्रेजों को चेतावनी दी कि हम गणपति उत्सव मनाएंगे अंग्रेज पुलिस उन्हें गिरफ्तार करके दिखाये। कानून के मुताबिक अंग्रेज पुलिस किसी राजनीतिक कार्यक्रम मे एकत्रित भीड़ को ही गिरफ्तार कर सकती थी लेकिन किसी धार्मिक समारोह में उमड़ी भीड़ को नहीं। इस प्रकार 20 अक्तूबर 1894 से 30 अक्तूबर 1894 तक पहली बार 10 दिनों तक पुणे के शनिवारवाड़ा में गणपति उत्सव मनाया गया। लोक मान्य तिलक वहां भाषण के लिए हर दिन किसी बड़े नेता को आमंत्रित करते। 1895 में पुणे के शनिवारवाड़ा में 11 गणपति स्थापित किए गए। उसके अगले साल 31 और अगले साल ये संख्या 100 को पार कर गई। फिर ६ पीरे-धीरे महाराष्ट्र के अन्य बड़े शहरों अहमदनगर, मुंबई, नागपुर, थाणे तक गणपति उत्सव फैलता गया। गणपति उत्सव में हर वर्ष हजारों लोग एकत्रित होते और बड़े नेता उसको राष्ट्रीयता का रंग देने का कार्य करते थे। इस तरह लोगों का गणपति उत्सव के प्रति उत्साह बढ़ता गया और राष्ट्र के प्रति चेतना बढ़ती गई।

1904 में लोकमान्य तिलक ने लोगों से कहा कि गणपति उत्सव का मुख्य उद्देश्य स्वराज्य हासिल करना है। आजादी हासिल करना है और अंग्रेजो को भारत से भगाना है। आजादी के बिना गणेश उत्सव का कोई महत्व नहीं रहेगा। तब पहली बार लोगों ने लोकमान्य तिलक के इस उद्देश्य को बहुत गंभीरता से समझा। आजादी के आन्दोलन में लोकमान्य तिलक द्वारा गणेश उत्सव को लोकोत्सव बनाने के पीछे सामाजिक क्रान्ति का उद्देश्य था। लोकमान्य तिलक ने ब्राह्मणों और गैर ब्राह्मणों की दूरी समाप्त करने के लिए यह पर्व प्रारम्भ किया था जो आगे चलकर एकता की मिसाल बना।

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