Tuesday , 13 October 2026
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धर्म-कर्म

प्रतिशोध और तप कर्म के बीच फंसी हुई अहल्या

डॉ. जयशंकर

 

इस ब्रह्मांड में दो लोक स्वर्ग और पृथ्वी अति महत्वपूर्ण हैं। स्वर्ग में देवताओं का और पृथ्वी पर मनुष्यों का निवास है। जहां मनुष्य कर्म के द्वारा अपनी स्थिति को बदलने के लिए स्वतंत्र है वहीं पर देवगणों को यह सुविधा नहीं है। वह अपने आरक्षित लोक में प्रसन्न रहते हैं।

वहां के सर्वघोषित, सर्वकालिक राजा इन्द्र हैं। उनका कार्य है वहां की सुख सुविधाओं की देख-रेख करना, उनको जुटाना, और देवताओं को उपलब्ध कराना तथा उन सुख-सुविधाओं, विभिन्न भोगों में सदैव आकंठ लिप्त रहना। ऐसा कथाओं में मिलता है कि स्वर्गलोक में हजारों-हजार-मेनका रंभा आदि अप्सराएं है। जो रूप गुण, यौवन-भोग, संगीत नृत्य की दृष्टि से अतिसंपन्न तथा अनुपमेय हैं, जो सदैव इन्द्र की शारीरिक मानसिक सेवा में रत रहती हैं। इन्द्र का एक और महत्वपूर्ण कार्य है पृथ्वी लोक की निगरानी करना। अर्थात् वहां की क्षण-प्रतिक्षण, पल-पल की जानकारी अपने गुप्तचरों के माध्यम से लेते रहना। यदि मानव जाति का कोई भी चाहे पुरूष हो या स्त्री, ऋषि, तपस्वी, राजा रंक, शूरवीर खासकर पुरूष जाति का जो अपने श्रेष्ठ कर्म, जप-तप के बल पर उपर उठ रहा हो तो किसी न किसी माध्यम से छल करके उसको विपथ करना, उसकी तपस्या को भंग करना या करवाना, उसकी दुर्घर्ष प्रतिज्ञा को भंग करना या करवाना जिससे कि वह स्वर्ग तक न पहुंच जाए और यहाँ की सुख सुविधाओं में हिस्सेदारी न करे, उनका उपभोक्ता न बने। यह सभी जिम्मेदारी देवताओं ने सर्वसम्मति से इन्द्र महाराज को ही दी है। कुशाग्र, अति बुद्धि संपन्न, साधन संपन्न इन्द्र इनका बहुत ही स्वाभिमान के साथ पालन करते हैं। उनको इस कार्य में अतीव सम्मान और आनंद का अनुभव होता है। इसीलिए ऋषि, मुनि, राजा या साधारण मानुष जो श्रेष्ठ कर्म, जप तप के बल पर ऊंचाई पर पहुंचते पहुंचते, अपने लक्ष्य के अति निकट पहुंचते पहुंचते विपथ हुआ है उस दुर्घटना गहराई से खोज बीन, जांच पड़ताल में इंद्र की भूमिका अर्थात संलिप्तता अवश्य मिलती है। पृथ्वी की भांति ही स्वर्गलोक अर्थात् देवलोक में भी मातृ और पितृ वर्ग में दोनों कोटियां सतगामी तथा असतगामी प्रवृति वाले मिलते हैं। सेविकाओं को छोड़कर संपूर्ण मातृ वर्ग अर्थात् देवियां लक्ष्मी, दुर्गा, पार्वती आदि सभी बिना किसी भेदभाव के जन कल्याण में रत, धर्म की पक्षधरता और अधर्म का प्रबल विरोध करती हुई दिखती हैं। लेकिन दैवों में तीन कोटियां मिलती हैं। प्रथम कोटि-जनकल्याणकारी कार्यों में रत, धर्म की संस्थापना करते हुए, अधर्म का विनाश करने वाले, स्वपुरूषार्थ से पृथ्वी का संतुलन बनाने वाले जैसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश, दूसरी कोटि उनकी है जो मानव और उसके श्रेष्ठ कर्मों से अपनी सुख सुविधा छीन जाने के डरबर से सदैव भयभीत रहते हैं और उनका महत्वपूर्ण कार्य है अपने श्रेष्ठ कर्म के बल पर शीर्ष पर पहुंचते हुए मानव को विपथ करना, उसके सदाचरण में व्यवधान डालना, उसकी अखंड प्रतिज्ञा को खंडित करना। ऐसे देवताओं में विशेष रूप से इंद्र का और कुछ हद तक माध्यम स्वरूप में नारद जी का नाम आता है। तीसरी कोटि उनकी आती है जो न्यूट्रल रहते हैं जिनको न ऊधो से लेना न माधव को देना, जो अपनी ही मस्ती में निष्फिक्र भाव से डूबे रहते हैं। अहल्या का कष्टमय जीवन भी दूसरी कोटि के देवताओं की ईर्ष्या की ही कहानी है जिसमें इन्द्र और उनके सहयोगी चंद्रमा की प्रमुख नकारात्मक भूमिका दिखती है।

अहल्या ब्रहमा की मानस पुत्री है। ब्रहमा ने स्वयं कहा है “कि मन में सुदंर रचना का भाव आने पर सृष्टि के रूप गुण, जप तप, संयम नियम, मर्यादा, संतोष, समर्पण, पातिव्रत्य, धैर्य, सहनशीलता, गंभीरता, प्रसन्नता से सर्वोत्कृष्ट तत्वों का चयन कर हमने मानस पुत्री का निर्माण किया है।” इस सुकन्या को उसके सुसंकृत ढंग से पालन-पोषण के लिए अत्रि और उनके पुत्र गौतम ऋषि के आश्रम में दे दिया। जब स्नेह मर्यादा के साथ पालन पोषण के क्रम में अहल्या किशोरावस्था को पारकर युवावस्था की दहलीज पर पहुंची तो ऋषि श्रेष्ठ गौतम ने अपने अगाध प्रेम पर रोक लगाकर ब्रहमा जी के अति विशिष्ट कन्या-सौगात को उनको सौंप आए। ब्रहमा जी अपनी छोटी सी कली स्वरूप कन्या को तन-मन-विवेक, मनसा-वाचा-कर्मणा से प्रस्फुटित पुष्पित कन्या को पाकर अत्यंत गदगद हो उठे। इस महत कार्य के लिए उन्होंने गौतम ऋषि को कोटिशः धन्यवाद देकर विदा करके उसके अग्रिम जीवन के बारे में विचार करने लगे। उसके हाथ को पीला करने के लिए सभी देवताओं, ऋषि-महर्षियों किन्नर-गंधर्वों के मध्य एक वैवाहिक प्रतियोगिता का आयोजन किया और शर्त रखी कि जो भी सदस्य तीनों लोको का सबसे पहले परिक्रमा कर लेगा उसी को पत्नी स्वरूप अपनी कन्या का हाथ दूंगा। इस प्रतियोगिता में निर्णायक की भूमिका तटस्थ व्यक्तित्व और आचरण के लिए सुविख्यात, वेद वेदांग, शास्त्रों के महाज्ञानी नारद जी को दी गई। अहल्या के रूप गुण से सम्मोहित, आकर्षित इन्द्र अपने छलकल बल बुद्धि के आधार पर सबसे पहले परिक्रमा को पूर्णकर अपना अधिकार प्रस्तुत किया।

ब्रह्मा इंद्र के द्वारा अधिकार की चेष्टा दिखाते हुए देखकर नारद के तरफ निर्णय जानने के लिए उत्सुक हुए तो नारद ने बताया कि ‘हे सृष्टिकर्ता देव’, इस कार्य में तो ऋषि गौतम ही प्रथम हैं क्योंकि उन्होंने कुछ ही पलों में अर्ध रूप से गौवंश को जन्म देते हुए (आर्धप्रसूता) गौ माता का दो बार भ्रमण कर लिया था। गौ की परिक्रमा तीनों लोको की परिक्रमा से ज्यादा फलदायी और विशुद्ध मानी गई है।

इस प्रकार ब्रह्मा जी ने नारद की उदघोषणा से गौतम ऋषि से अहल्या का धूमधाम से विवाह कर दिया। इंद्र सहित सभी देवता आदि ब्रह्मा की घोषणा को सुनकर और विवाह में शामिल होकर वहां से अपने-अपने स्थान को चले गए। गौतम और अहल्या भी पति पत्नी के रूप में खुशहाल जीवन व्यतीत करने लगे। लेकिन अहल्या को अतिसय चाहने वाले तथा एक मानव ऋषि से पराजित होने के साथ ही अहल्या को न पाने की टीस और कसक इंद्र के मन से नहीं गई। समय के साथ ही उनकी अहल्या के साथ भोग करने, अतृप्त कामना और गौतम तथा अहल्या से प्रतिशोध लेना की दुरेच्छा बढ़ती ही गई। इन दोनों के वशीभूत हो गौतम ऋषि की दैनिक चर्या को बखूबी जानकर इंद्र एक रात्रि में उनके आश्रम के बाहर पहुंचकर कुकुक्ट के रूप अर्धरात्रि के दो प्रहर बाद ही बाग देने लगे। कुकुक्ट की आवाज को सुनकर ब्रह्ममुहूर्त व्यतीत हो जाने की आशंका से घबराकर निद्रा-आसन को झटपट त्यागकर जो भी वस्त्र मिला लेकर अहल्या के संज्ञान में लाए बिना ही प्रातः कालीन मज्जन, स्नान आदि दैनिक कर्म के लिए अकेले ही नदी के तरफ शीघ्र कदमों से चल पड़े। नदी तट पर पहुंचकर वस्त्र, कमण्डल इत्यादि को वृक्ष की शाखाओं पर सुरक्षित रखकर सहज श्वास के साथ सिर उठाकर जब आकाश के तरफ तारों की स्थिति से समय का अनुमान लगाया तो उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ। अभी अर्धरात्रि के पश्चात् एकाध घड़ी ही व्यतीत होने का भान होने पर तुरंत आश्रम को लौट गए। कुटिया के करीब पहुंचकर उन्होंने आंखों को मलते हुए देखा कि घबराए हुए तीव्र कदमों से इंद्र पसीने से तरबतर अधोवस्त्र को सुव्यवस्थित करते हुए अंधेरे में विलुप्त होने का प्रयास कर रहे हैं। इससे अमंगल होने का कयास करते हुए कुटिया के भीतर का दृश्य देखकर ऐसा लगा कि उनके पूरे अस्तित्व पर किसी ने खौलता हुआ तेल उडेल दिया हो। क्रोधाग्नि में जलते हुए उन्हें अहल्या के तरफ नजर फेकी थी तो वह भी इंद्र की गति में अस्त-व्यस्त, घबराई हुई मिली। वह लाख अनुनय-विनय करती रही, भूलवश दुष्कृत्य के लिए क्षमा मांगती रही, मै पहचान नही पायी, बहुत बड़ी गलती हो गई, पैर पकड़ने के लिए भी गिड़गिडाते हुए कोशिश करती रही, लेकिन गौतम ऋषि का क्रोध शांत होने के बजाए और बी भड़कता ही गया। दोनों हाथ ऊपर कर क्षमा के साथ परमेश्वर का स्मरण कर पहले नपुंसक होने, दोनों अण्डकोश के विलुप्त होने, पूरे शरीर पर कामांग पैदा होने का श्राप देकर क्रोधाग्नि में भस्मीभूत होते हुए अहल्या को अदृश्य, यज्ञ-राख के बीच निर्जीव सौंदर्य विहीन अशरीरी, बंध्या शिला खण्ड के रूप में पड़े रहने का अभिशाप देकर जैसे ही कुटिया से बाहर निकलने को उद्यत हुए वैसे ही हे देव ! आपके सिवा मेरा इस त्रैलोक्य में कोई आश्रय नहीं है, अपने चरणों में स्थान दीजिए आदि कहते हुए इस असह्य अपराध के लिए क्षमा मांगते हुए बहुत हिम्मत जुटाकर उनके चरणों में गिरकर विलाप करने लगी।

अपने चरणों पर ढुलकते अहल्या के दयाद्र अश्रुओं ने उनके अंनत क्रोध पर तुषारापात करते हुए दयाद्र भाव से सोचने को विवश करने पर बोले-यह तो अक्षम्य अपराध है ऐसे प्राणी के लिए किसी भी लोक में जगह नही होती, तुम्हारे पातिव्रत्य पर मुझे न पहले संदेह था न अभी है। मै जानता हूँ कि तुम तो इंद्र के द्वारा विवश की गई हो, फिर भी रूप नहीं पूरी चेतना को जागृत करने वाले स्पर्श को पहचान कर प्रतिरोध करना चाहिए था, तुम्हें उस घोर पापी को ढकेल देना चाहिए था। लेकिन इसमें तुम्हारा भी दोष है, विगत की अवचेतना में जमे हुए इन्द्र को पाने की लालसा के कारण तुम भी कम दोषी नहीं हो, बराबर की ही भागी हो। लेकिन तुम अबला हो, तुम्हारी विवशता समझता हूँ। श्राप तो वापस नही हो सकता है शूर-वीर पुरूष के धनुष की प्रत्यंचा से प्रक्षेपित बाण जिस तरह से लक्ष्य को बिना भेदे खाली नही जाता उसी तरह से ऋषि मुख से निकली हुई बाणी खाली और टाली नही जा सकती, फिर भी परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ। कुछ पल के ध्यानस्थ होने के पश्चात बोले कि अभी तो कुछ नही हो सकता, तुम्हें मेरे जप-तप को क्षीण करने वाले, विश्वास को चकनाचूर करने वाले इस अक्षम्य अपराध की सजा तो चुकानी ही पड़ेगी। इसमें मै असहाय हूँ। हां इतना अवश्य होगा कि अनंत काल तक श्रापित रहने के पश्चात त्रेता युग में भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम इधर से गुजरते हुए इस स्थान पर आएंगे तो उनके चरण स्पर्श से तुम्हारा उद्धार होगा। इतना कहकर बहुत भारी मन से गौतम ऋषि कठिन तपस्या के लिए हिमालय के तरफ प्रस्थान कर गये।

इधर भगवान श्री राम लक्ष्मण सहित गुरू विश्वामित्र के निर्देशन में अनेक भयंकर राक्षसों समेत ताड़का का बक्सर (भोजपुर) में वध करने के पश्चात स्वयंवर में भाग लेने हेतु मिथिला जा रहे थे तो सघन निर्जन वन रास्ते में एक सायं सायं करते हुए खग-मृग विहिन आश्रम के बीचों बीच राख की ढेर में पाषाण-खंड को देखकर जानने की उत्सुकता प्रकट की आश्रम एक दीख मग माही। खग मृग जीव जंतु तंह नाही।।, पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी। सकल कथा मुनि कहा विसेषी ।। 1 श्रीराम की उत्सुकता को शांत करते हुए उन्होंने सारा वृतांत बताया। श्री राम नजदीक जाकर शीतल शिला पर चरण रखते हुए इधर उधर देखते हुए वहां के वातावरण में घुली हुई सोंधी सुगंध के बारे में सोच ही रहे थे कि वह शिलाखण्ड उस स्थान विशेष की प्रत्येक गतिविधियों से सुपरचित रूप यौवन- संपन्न, भद्र-भव्य-आभामय स्त्री के रूप में परिवर्तित हो गयी। वह आश्रम भी अपनी पूर्व की आभा और संपन्नता से भर उठा- ‘परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही। देखत रघुनायक जन सुखदायक सनमुख होई कर जोरी।। अछि प्रेम अधीरा पुलक सरीरा मुख नहि आवइ बचन कही। अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही।।’ 2 अहल्या मुनि के श्राप से मुक्त होते ही पूर्व काया प्राप्त कर अपने अंग प्रत्यंग को निरखते हुए, अद्भुत परिवर्तन देख समझ गई कि यही प्रभु श्री राम हैं। एक पल पश्चात विश्वास के पूर्ण होते ही पुलकित शरीर, रूंधे हुए गले से अश्रुओं से, पूर्ण नेत्रों के साथ उनके चरणों में गिरकर बहुत देर तक सिसकती रही। प्रभु के उठाने पर घुटनों के बल बैठकर कंपित भाव से एक ही श्वास में अपने पूर्वजन्म की, अपने साथ घटी सारी बातें बिना किसी दुराव छिपाव के, बगैर-लोक-लज्जा के बताकर प्रभु का गुणगान करने लगी- “मै नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई। राजीव विलोचन भवभय मोचन पाहि पाहि सरनहि आई।।” 3 भगवान राम के धैर्य बंधाने पर अपने को संभालते हुए उठकर अश्रुओं से विगलित नेत्रों को पोछते हुए उसने कंदमूल फल लाकर सबका श्रद्धापूर्वक आतिथ्य करते हुए कोटि कोटि क्षमा मांगती रही। अहल्या की मनोकांक्षा को भांपकर प्रभु के आदेश को सर माथे पर लगाते हुए ऋषिवर ने पुनः पत्नी के रूप में उसको अंगीकार किया। ‘एहि भांति सिधारी गौतम नारी बार बार हरिचरन परी।, जो अति मनभावा सो बरु पावा गै पतिलोक अनंदभरी।।’4

‘मम रूपं समास्थाय कृतवानसि दुर्मते। अकर्तव्यमिदं यस्माद विफलस्त्वं भविष्यसि ।। ‘5 अर्थात् दुर्मते ! तूने मेरा रूप धारण कर यह अकरणीय पापकर्म किया है इसलिए तुम्हारी यह शक्ति सदा सदा के लिए समाप्त हो जाएगी।, ‘गौतमेनैवमुक्तस्य सुरोषेण महात्मना। पेततुवृषणौ भूमौ सहस्त्राक्षस्य तत्क्षणात्।।’ अर्थात् क्रोध से जलते हुए गौतम ऋषि के ऐसा कहते ही उनके दोनों अण्डकोष तत्काल पृथ्वी पर गिर पड़े और उनके शरीर में कामांग बन गए। अपने इस गर्हित कार्य के लिए यह तर्क कि यदि मै गौतम की तपस्या को भंग नहीं करता तो वे देवताओं का राज्य छीन लेते। अतः ऐसा करके मैने देवताओं का ही कार्य सिद्ध किया है। इसीलिए आपसब से निवेदन है कि ‘मुझे अण्डकोष युक्त करने का प्रयत्न करें।’ इंद्र की इस आर्त पुकार से द्रवित होकर मरुद्गणों सहित अग्नि आदि समस्त देवता समस्त देवता कव्यवाहन आदि पितृदेवताओं के पास जाकर उनके द्वारा पालित पोषित भेडे के दोनों अण्डकोषों को इंद्र के अंग में स्थापित करने की प्रार्थना करने लगे। इस पुकार को सुनकर पितृदेवताओं ने इन दोनों अण्डकोषों को इंद्र के शरीर में उचित स्थान पर स्थापित कर दिए-‘अग्नस्तु वचनं श्रुत्वा पितृदेवाः समागताः। उत्पाट्य मेषवृषणौ सहस्त्राक्षे न्यवेशयन।।’

इस प्रकार अहल्या का श्री राम ने उद्धार करते हुए अत्रि ऋषि-पुत्र को आदेशित कर उसकी निर्दोषिता के बारे में उनको बताते-समझाते हुए और साथ शेष जीवन में अर्धांगिनी के रूप में मान-सम्मान, प्रेम देने के लिए सहमत कर पुनः दाम्पत्य जीवन का सुख भर कर गौतम ऋषि को उसका हाथ सौंपकर एक अबला के उद्धार संबंधी कल्याणकारी कार्य करने की मन में प्रसन्नता लिए हुए महातपस्वी कौशिक ऋषि के साथ अपने गंतव्य स्थान मिथिला की ओर अनुज सहित प्रस्थान कर गये। इस अनुचित कार्य में इंद्र की चन्द्रमा ने भी सहायता तथा सहभागिता की थी। इसलिए ऋषि ने उनको भी आजीवन दागदार रहने का श्राप दिया था जिसका प्रमाण उनके मुखमण्डल की श्वेताभा में काले दाग के रूप में आज भी दिखाई देता है।

अहल्या पंचसतधर्मी – कर्मी कन्याओं में से सबसे वरिष्ठ हैं। इस लिए इनका नाम ब्रह्मपुराण के तसंबंधी श्लोक में सर्वप्रथम दिया गया है- ‘अहल्या द्रौपदी सीता तारा मंदोदरी। पंचकन्याः स्मरेन्नित्यं महापातकनाशिनी ।।’ कहीं कहीं ऐसी भी कथा मिलती है कि श्रीराम के उद्धार करने के पश्चात वह गौतमी नाम से अजस्र शीतल पवित्र नीरसंपन्न प्रवाहिनी के रूप में गतिशील हो गईं।
अहल्या शब्द संस्कृत के हल् शब्द में नयं प्रत्यय लगने से बना है। हल् का अर्थ ‘रूप’ होता है, प्रत्यय लगने के बाद अहल्या का अर्थ होता है ‘बिना किसी कुरूपता का रूप,’ कहीं पर बिना जोता हुआ अर्थ भी मिलता है।
इन्द्र का भी, उनके शरीर में मृषमेण का अण्डकोष स्थापित करने और पूरे शरीर में उग गये कामांगों के स्थान पर आंख का चित्र बन जाने से, उद्धार हो गया और इंद्र पुनः अपने पुराने रव में आ गये और देवराज के रूप में जीवन व्यतीत करने लगे।

आज भी कोई पुरुष किसी स्त्री के साथ व्यभिचार करता है तो कितना हो हल्ला मचता है और साबित हो जाने के बाद कठोर सजा भुगतनी पड़ती है तो यह घटना तो त्रेता युग से बहुत पहले की है। उस समय समाज तो बहुत संतुलित होता होगा। ऐसे कुकर्म की मान्यता भी पुरूष या स्त्री को कत्तई नहीं थी, न ही मान सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। अहल्या तो राम के आने तक अनंत काल तक इस असह्य वेदना में पथराई नेत्रों से पड़ी रही। उसका प्रायश्चित कम नही था। लेकिन इंद्र को इन श्रापों से इतनी शीघ्र मुक्ति कैसे मिल गई? क्या मानव के उसके कर्मों के अनुसार फल देने वाले दैवलोक में अपने निवासियों के लिए आचार-विचार, व्यवहार का कोई मानदण्ड नही होगा। जहां तक अत्याल्प बुद्धि से अनुमान लगाता हूँ कि अवश्य होंगा। प्रत्येक मनुष्य के लिए धर्म कर्म का निर्धारण करने वाले इतना पवित्र विशाल मनुष्य के कल्याण में रत दैवलोक में भी नियम-कानून अवश्य होगा। तभी तो संपूर्ण ब्रह्मांड का सुव्यवस्थित संचालन हो रहा है।.. निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि अतिनिन्दनीय कर्म करने के बावजूद इंद्र के थोथे तर्कों को नहीं मानना चाहिए था, न ही उनकी तरफदारी करतें हुए श्राप मुक्ति का कोई उपाय करना चाहिए। इंद्र को सभी देवगण यदि उनकी निन्दनीय अवस्था में केवल त्याज्य कर देते तो दैवलोक की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता वर्तमान में हजार गुना समृद्ध रहती तथा इस घोर कलयुग में भी ऐसा आचरण करने से पहले मानव जाति लाखों बार सोचती तथा मात्र ऐसा गर्हित विचार मन में आने से पूर्व ही केवल इसके आभास मात्र से ही उसका पूरा अस्तित्व ही कुकर्म के परिणाम के भय से कंपित हो उठता।

अहल्या की इस कहानी के माध्यम से यह सीख मिलती हैं कि जीवन में संयमनियम- धर्म का बहुत गंभीरता से अनुपालन करना चाहिए। जो ईश्वर ने दिया है उसी में संतोष करते हुए सदकर्म में सदैव प्रवृत रहना चाहिए। साथ ही ईर्ष्या-द्वेष, काम-क्रोध सदैव कष्टों और विपत्तियों को ही आमंत्रित करते हैं। जीवन में यदि कभी कोई गलती हो भी जाय तो छुपाना नहीं चाहिए अपितु अपने शुभचिन्तकों से चर्चा अवश्य करनी चाहिए और जगतनियंता के शरण में जाकर समर्पण करना चाहिए। इसका निदान और विकट परिस्थितियों से उबरने में प्रभु के साथ माता-पिता भी मदद करते हैं।

लेखक – डा. जयशंकर
निवास- 6/120, विनीत खण्ड, गोमती नगर, लखनऊ
संपर्क सूत्र- 6394192621

 

संदर्भ सूची 

1. दोहा /चौपाई 209/6 पृ.सं. 169 बालकाण्ड, तुलसी कृत रामचरितमानस ।
2. पृ.सं. 169 वही ।
3. पृ.सं. 169 वही।
4. पृ.सं.170 वही।
5. श्लोक सं 27 सर्ग 48 पृ.सं. 126 वाल्मीकि रामायण।
6. श्लोक सं.8 सर्ग 49 पृ.सं. 127 वही।
7. पृ.सं.227 ब्रह्मपुराण ।

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