डॉ. जयशंकर
मंदोदरी भारतीय सनातन साहित्य पुराणों, कथाओं में एक ऐसा पवित्र नाम है जिसके स्मरण मात्र से ही सारे पाप धुल जाते हैं “अहल्या तारा द्रौपदी सीता मंदोदरी तथा। पंचकन्याः स्मरेन्नित्यम् महापातकनाशिनी ।। मंदोदरी पंचकन्याओं में से एक हैं। मंदोदरी अपने समय के महान वास्तुविद मयासुर और उनकी महारानी स्वर्ग की अप्सरा हेमा की संतान है। मंदोदरी के जन्म के बारे में अनेक कथाएं मिलती हैं। तेलगु भाषा के ग्रंथ उत्तर रामायण में एक कथा के अनुसार मधुरा नामक अप्सरा शिव को प्रसन्न करने के घोर तपस्या करने लगी। अवसर पाकर वह औघडदानी शिव को प्रणाम करने के लिए कैलाश पर्वत पर पहुंच गई। शिव प्रसन्न होकर उससे प्रेम करने लगे। उस समय पार्वती कहीं गई हुई थी। जब पार्वती लौटकर आईं तो देखी कि उसके वक्षस्थल पर शिव के शरीर की भस्म लगी हुई है। वे अपने अधिकार में उसके द्वारा किए गए अतिक्रमण को देखकर भयंकर क्रोध में उसको पार्वती ने मेढकी होने का श्राप दे डाला। वह पास के एक कुंए में मेढकी के रूप रहने लगी। शिव उसकी यह स्थिति देखकर बहुत दुखी हुए और उन्होंने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा कि तुम बारह साल के पश्चात अपने पूर्व रूप स्वरूप में लौट आओगी। कुंए में टर्र-टर्र करती हुई मेढकी एक सुंदर कन्या के रूप में परिवर्तित हो गई। उधर कन्या की तीव्र लालसा तप करने वाले असुर दंपति मयासुर और हेमा उधर से गुजर रहे थे उन्होंने उसे शिव का प्रसाद मानकर नवीन नाम मंदोदरी देते हुए कन्या के रूप में स्वीकार कर लिया। मयासुर के घर अक्सर रावण का आना जाना होता था। रावण के मन में मंदोदरी के रूप लावण्य से आकर्षण बढने लगा। रावण के द्वारा दिए गए विवाह प्रस्ताव को पिता-पुत्री दोनों ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। दोनों का वैदिक रीति से विवाह संपन्न हुआ। यही मंदोदरी आगे चलकर रावण की पटरानी बनी। मंदोदरी चित्त-चिन्तन, आचरण से विचारवान, धैर्यशील, बुद्धिमान, धार्मिक प्रवृति संपन्न नारी थी। वह तीन पुत्रों-मेघनाथ, अतिकाय, अक्षय कुमार की माता थी। रावण जितना ही उग्र, उछृंखल, पथभ्रष्ट, घमंडी अत्याचारी, कामी था, वहीं मंदोदरी ठीक उसके विपरीत शांति प्रिय, धर्म नियम का पालन करने वाली, विचारवान, अन्याय विरोधी, सुसंस्कृत एवं साहसिक व्यक्तित्व से संपन्न थी।
रंगनाथ रामायण में मंदोदरी के जन्म के विषय में कथा है कि पार्वती एक गुडिया बनाती हैं और महादेव से उसको जीवंत बनाने के लिए कहती हैं। महादेव के आशीर्वाद से वह एक चित्ताकर्षण युक्त सुंदर युवती बन जाती है। महादेव का ज्यादा से ज्यादा ध्यान उसी गुड़िया से बनी अप्सरा स्वरूपा युवती पर रहने लगा। पार्वती का मन शिव का उसके प्रति बढते झुकाव से चिन्तित रहने लगा। ईर्ष्या -द्वेष से दग्ध पार्वती ने उसको श्राप से मेढकी बना दिया। कुछ वर्षोंपरांत वह पुनः मेढकी से धीर, वीर, विचारवान, विवेकी, साहसी, तेजोदीप्त वदनवाली, गुणज्ञ युवती बन गई। कुचिपुडी नृत्य परंपरा में रावण शिव से पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में मांगता है। शिव मेढकी को पार्वती की हमशक्ल युवती बनाकर पत्नी के रूप में रावण को दे देते हैं। एक जनश्रुति के अनुसार मंदोदरी की पैदाईश राजस्थान के जिस स्थान पर हुई थी वह राजस्थान के जोधपुर से 8 कि.मी. उत्तर में स्थित मंडोर शहर है। इसी कारण से यहां के कुछ स्थानीय ब्राह्मण समूह रावण को दामाद के रूप में आज भी मानते हैं। मंदोदरी का आचरण सती सावित्री के समान था। वह नहीं चाहती थी कि रावण सीता का हरण करें। बहुत समझाया लेकिन वह कहां मानने वाला, अपनी जिद्द और हठधर्मिता के वशीभूत सीता को अपहृत कर लंका ले आया और अशोकवाटिका में भयंकर राक्षसियों के पहले में रख दिया। लेकिन सीता खोज में आए हनुमान ने लंका दहन कर दिया तब भी पति को बहुत समझाया-परस्त्री का स्पर्श अज्ञान में करना भी शास्त्रोक्त नहीं है उसके लिए भी प्रायश्चित अनिवार्य होता है तो संज्ञान में तो ऐसा करना तो घोर पाप है। इसके लिए मनुष्य ऐसे पाप का भागी हो जाता है जिससे मुक्ति बमुश्किल ही मिल पाती है। इसका दंड को व्यक्ति विशेष के साथ साथ संपूर्ण समाज को भोगना पड़ता है जिसका ज्वलंत प्रमाण लंका दहन है। जब दलबल के साथ श्री राम के आगमन को सुनती है तो भविष्य की आगत विपत्तियों को सोचकर अतिव्याकुल भाव से लौकिक पति परमेश्वर रावण का दोनों हाथों से पैर पकड़ कर कहती है ‘कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति जिम धरहू।।, समुझत जासु दूत कइ करनी। स्रवहि गर्भ रजनीचर घरनी।। तासु नारि निज सचिव बौलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई ।।।।, सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हे। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हे 35/3,4,5 इतना ही नही वह रावण को मनोवैज्ञानिक रूप से यह कहकर दवाव बनाती है कि श्रीराम जी के बाण सर्पों के समूह के समान हैं और राक्षसों का समूह उनके समक्ष मे मेढको के समान है जिसको विनष्ट करने में एक क्षण की भी देर नही लगेगी। लेकिन दशानन इतना दंभी और हठी था कि उसके ऊपर कोई प्रभाव नही पड़ा उलटे वह मंदोदरी की बात को अनसुना कर हंस कर मंदोदरी को अंक में भरकर ठहाका लगाते हुए अपने बल का बखान करने लगा। रावण के इस कुनीति पूर्ण आचरण को देखकर आग पर पानी का छीटा मानकर वह चिन्तित भाव से यह सोचकर कि ‘भयऊ कंत पर विधि विपरीता’ शांत हो गई। मंदोदरी का चिन्तन बहुत ऊच्चकोटि का था। साथ वह अति दूरदर्शी भी थी। रावण और उसके समर्थकों के अनर्गल आचरण का परिणाम राक्षस कुल का संपूर्ण विनाश उन्हें पहले से ही ज्ञात था।
रावण के अनर्थकर्मी-धर्मी होने के बावजूद भी वह पति दशानन से अद्भुत प्यार करती थी। आजीवन उन्होंने किसी पर पुरूष के तरफ आंख उठाकर देखा तक नही। वह विशिष्ट पतिव्रता थी। राक्षस कुल की अथवा किसी भी नारी के स्वमान, शील को अपने समान ही महत्वपूर्ण मानती थी। जहां भी उन्हें लगा कि पुरूष अपनी सीमा को लांघने की कोशिश कर रहा है वहीं पर वह चट्टान की भांति उसकी रक्षा मे खडी हो जाती थी। सभी नारियों के स्वमान की सदैव रक्षा करते हुए वह दिखाई देती है। रावण जब काम वासना से वशीभूत हो अशोक वाटिका में सीता द्वारा अपने अनुनय को ठुकराते देखकर आग बबूला हो वध करने के लिए तलवार निकालता है तब वह निर्भय भाव से तलवार सहित उसके हाथ को पकड़ कर झटकती हुई बोलती है कि यदि आपके सिर पर काम वासना का भूत सवार ही है तो अनेकानेक सुंदरियों से भरे हुए अपने रनिवास में जाकर अपने को तृप्त करिए। दूसरे कुल की बहू से जिसको स्वयं बलात अपहृत कर लाएं है अन्याय करना नीति संगत नही है। पहली बार रावण को, आज्ञाकारिणी पत्नी, सभी बात में हां में हां मिलाने वाली मंदोदरी के इस अकल्पित नये उग्र स्वरूप को देखकर मानों सांप सूंघ गया हो। मंदोदरी से आंख चुराते हुए गुमसुम भाव से सीता को निर्बल स्वर में दो चार चेतावनी देकर महल में लौट गया। वह उसको सदैव संमार्ग पर ले आने के लिए सार्वजनिक, व्यक्तिगत रूप से प्रेम, प्यार, फटकार, विनाश का भय दिखाकर मनोवैज्ञानिक, अध्यात्मिक, तरीकों से प्रयत्न करती रही जब वह देखती है कि इस अति निष्ठुर पत्थर पर लकीर खीचना संभव नहीं है तो थककर तत्काल के लिए अपने को विलग कर लेती थी लेकिन हार नही मानती थी।
वह पतिदेव के चरण स्पर्श कर हाथ जोड़कर निवेदन करने करते हुए बोली- बोली बचन नीति रस पागी। कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित जियो धरहू।। 35/3, तव कुल कमल विपिन दुखदाई। सीता सीत निशा सम आई।। सुनहू नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें।। 35/5 वही वह दशानन के सभी भ्रम को तोड़ती हुई कहती है कि यदि आप सीता को नहीं लौटाएगें तो आपका विनाश अवश्यंभावी है आपको इस घोर पाप के दण्ड से जिन्होंने आपको इतना शक्तिशाली बनाए वे शिव और सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी भी नहीं बचा सकते हैं। लेकिन रावण कहा मानने वाला, वह अपने दंभ मे इतना चूर था कि युद्ध में अपने पुत्रों के एक-एक कर मारे जाने और अपनी सेना के बल-मान मर्दन की सूचना पाकर बिलखने के बावजूद भी हठ नही छोडता है। मंदोदरी रावण के साथ-साथ अपने पुत्रों को भी प्रभु से बैर छोड़कर सीता को लौटाने के लिए, पिता को विवश करने के लिए बार बार समझाती है। लेकिन इस दंभी, अत्याचारी, अधर्मी परिवार समाज में उसकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज ही साबित होती है। कोई भी पीछे नही हटता, अंततः रावण उसके सभी पुत्रों का विनाश हो जाता है, सभी युद्ध में काल का ग्रास बन जाते हैं। रावण के मारे जाने की सूचना मिलते ही अन्य रानियों के साथ धराशायी निर्जीव रावण के पास पहुंच कर विलाप करती हुई कहती है कि ऐश्वर्यस्य विनाशाय देहस्य स्वजनस्य च। अरुन्धत्या विशिष्टां तां रोहिण्याश्चापि दुर्मते ।। 20/111 सर्ग युद्ध काण्ड अर्थात् आपने अपने ऐश्वर्य, शरीर का तथा स्वजनों का विनाश करने के लिए ही अकस्मात सीता की कामना की थी। दुर्मते आपको पता होना चाहिए कि भगवती सीता अरुन्धती और रोहिणी से भी बढ़कर पतिव्रता हैं। आगे कहती हैं कि सीतां धर्षयता मान्यां ह्यहदृशं कृतम्। वसुधाया हि वसुधां श्रियाः श्रीं भतर्तृवतसलाम् ।। 21 वही अर्थात् अपने स्वामी के प्रति अनन्य अनुराग रखने वाली और सबकी पूजनीया उन सीता देवी का तिरस्कार करके आपने बड़ा अनुचिति कार्य किया था। वह अनेक प्रकार से विलाप करती हुई अपने को उलाहना देती हुई अंत में कहती है-धिगस्तु हृदयं यस्या ममेदं न सहस्त्रधा 11/2/85 त्वयि पंचतत्व्मापन्ने फलते शोकपीडितम् । इत्येवं विलपन्ती सा वाष्पपर्याकुलेक्षणा ।।86 वही अर्थात् आपकी मृत्यु हो जाने पर भी मेरे शोकपीड़ित हृदय के हजार टुकड़े क्यों नही हो जाते, अतः मुझ पाषाण हृदया स्त्री को धिक्कार है। वह रोते रोते मूर्छित होकर रावण के वक्षस्थल पर गिर पड़ी। वह अखंड पतिव्रता भी है। वह पट्टमहिषी होने के कारण प्रजा का बहुत ध्यान रखती थी। प्रजा की स्थिति को जानने के लिए उन्होंने गुप्तचरियों के समूह को नियुक्त कर रखा था जो प्रतिदिन की रिपोर्टिंग करती थी। वह राज्य की हित चिंता से भी सदैव जुडी रहती थी। वह नीतिज्ञ, राजधर्म की विशेषज्ञ के साथ-साथ कुशल प्रशासिका भी थी। इस लिए अपने सभी दुख-दर्द को एक तरफ करके शेष बचे हुए राक्षस कुल प्रजा की रक्षा और लंका के सुख समृद्धि के लिए न चाहते हुए भी प्रभु राम की सलाह पर उन्होंने पुत्रवत विभीषण से विवाह किया और बहुत दिनों तक लौकिक रूप में महारानी और अलौकिक रूप में तपस्विनी की भांति रहते हुए लोगों की अन्यायी प्रवृति को बदलने, सदमार्ग पर लाने तथा लंका की सुख समृद्धि के लिए कार्य करती रही। इस प्रकार हम मंदोदरी के चिंतन, आचरण, व्यवहार और कृत्य से देखते हैं कि विकट विपरीत परिस्थितियों में रहते हुए भी उन्होंने न्याय, नीति, सत्यादर्श का मार्ग कभी नहीं छोड़ा। वह जहाँ पत्नी के रूप में आजीवन रावण के जप-तप, संयम-नियम, अतुलित बल बुद्धि-विद्या की प्रशंसक, प्रबल समर्थक रही वहीं आजीवन उसके अन्याय अत्याचार, गर्हित कुकर्मों का विरोध भी करती रही। वे अति के आगे प्रबल विरोध प्रकट करते हुए खूंखार सिंहिनी की भांति आवश्यकता अनुकूल दहाड़ भी मारने लगती थी।
लेखक – डॉ. जयशंकर
निवास- 6/120, विनीत खण्ड, गोमती नगर, लखनऊ
संपर्क सूत्र- 6394192621
सहायक ग्रंथों की सूची
1. ब्रह्म पुराण
2. 35/3,4,5 सुन्दरकाण्ड तुलसीकृत रामचरित मानस
3. 35/3 सुन्दरकाण्ड तुलसीकृत रामचरित मानस
4. 20/111 सर्ग युद्धकाण्ड, वाल्मीकि रामायण
5. 21/111 – युद्धकाण्ड, वाल्मीकि रामायण
6. 1/2/85 – युद्धकाण्ड, वाल्मीकि रामायण
7. 86 – युद्धकाण्ड, वाल्मीकि रामायण
डॉ. जयशंकर
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