
• नाटक दृश्य विधा है, यह शब्दकला नहीं अपितु अभिनय की कला है।
• अवस्थानुकृतिर्नाट्यम – अर्थात अवस्था का अनुकरण नाटक है।
• तदुपारोपांतुरूपकम – अर्थात रूप का आरोप नाटक कहलाता है।
नाटक की परिभाषा
नाटक साहित्य की वह दृश्य-श्रव्य विधा है, जिसमें मानवीय जीवन की घटनाओं, संघर्षों, भावनाओं तथा विचारों को पात्रों के संवादों और क्रियाओं के माध्यम से रंगमंच पर प्रस्तुत किया जाता है। ‘नाटक’ शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत की ‘नट्’ धातु से मानी जाती है, जिसका संबंध अभिनय अथवा नृत्य से है। इससे स्पष्ट होता है कि नाटक का मूल संबंध अभिनय-कला से है। नाटक में कथावस्तु को केवल वर्णित नहीं किया जाता, बल्कि पात्रों के माध्यम से उसका अभिनय किया जाता है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में नाट्यकला का विस्तृत विवेचन मिलता है। भारतीय नाट्यपरंपरा में नाटक को ऐसी कला के रूप में देखा गया है, जिसमें मानवीय जीवन के विविध भावों, अवस्थाओं और व्यवहारों का अनुकरण अभिनय के माध्यम से किया जाता है।
भरतमुनि ने नाट्य को लोकजीवन के विविध पक्षों का कलात्मक रूपांतरण माना है। उनके अनुसार नाट्य में लोक के भावों, आचरणों, सुख-दुःख तथा विभिन्न जीवन-स्थितियों का समावेश होता है। नाट्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि दर्शकों को भावात्मक अनुभव प्रदान करना तथा जीवन के विविध पक्षों से परिचित कराना भी है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अपने निबंध ‘नाटक’ में कहते हैं कि नाटक शब्द का अर्थ है नट लोगों की क्रिया, नट कहते हैं विद्या के प्रभाव से अपने या किसी वस्तु के स्वरूप को फेर कर देने वाले को, व स्वयं दृष्टि रोचन के अर्थ फिरने को। पाश्चात्य काव्यशास्त्र के अनुसार नाटक के विकास की पांच अवस्थाएं मानी गई हैं – आरम्भ, विकास, चरमबिंदु, ह्यास तथा समाप्ति।
नाटक के तत्व
आचार्य धनंजय द्वारा नाटक के निम्नलिखित तीन मुख्य तत्व बताए गए हैं –
१) वस्तु : नाट्यवस्तु, कथानक
२) नेता : नायक, चारित्रचितरण
३) रस : उद्देश्य
१) वस्तु
• नाट्यवस्तु – जहां एक ओर नाट्यवस्तु जीवन से ली गई कच्ची सामग्री है
• कथानक – वहीं दूसरी ओर कथानक संगठन और विन्यास की प्रक्रिया।
• नाट्यवस्तु – भारतीय नाट्यशास्त्र के अनुसार, नाट्यवस्तु वह मूल विषय, घटना अथवा कथा-सामग्री है, जिसके आधार पर नाटक की रचना की जाती है। इसमें नाटक का केंद्रीय भाव, प्रमुख घटनाएँ, पात्रों के कार्य-व्यापार तथा उनसे संबंधित प्रसंग सम्मिलित होते हैं। नाट्यवस्तु का संबंध इस बात से है कि नाटक में क्या प्रस्तुत किया जा रहा है। आचार्य भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में नाट्यवस्तु के विवेचन के अंतर्गत वस्तु के तीन भेद माने गए हैं:
• प्रख्यात – प्रसिद्ध पौराणिक कथा अथवा इतिहास पर आधारित होती है।
• उत्पाद्य – नाटककार की मौलिक कल्पना से निर्मित होती है।
• मिश्रित – प्रसिद्ध कथा तथा कल्पना का समन्वय होता है।
महत्व के आधार पर दो प्रकार होते हैं
• आधिकारिक मुख्य नाट्यवस्तु
• प्रासंगिक गौण नाट्यवस्तु : • पताका – एक बार कथावस्तु से जुड़ जाती है तो अंत तक साथ रहती है। आधिकारिक कथा से जोड़कर फल की प्राप्ति तक साथ रहती है।
• प्रकरी – पानी की तरह उठती है यह कथा फिर मुख्य कथा को गति देकर गायब हो जाती है।
• कथानक – कथानक नाट्यवस्तु का वह कलात्मक एवं क्रमबद्ध संगठन है, जिसके माध्यम से नाटक की घटनाएँ एक-दूसरे से जुड़कर नाटकीय क्रिया का विकास करती हैं। इसमें घटनाओं का आरंभ, विकास, संघर्ष, चरम स्थिति तथा परिणाम सम्मिलित होते हैं। कथानक का संबंध इस बात से है कि नाटक की घटनाओं को किस प्रकार व्यवस्थित और प्रस्तुत किया गया है। भारतीय नाट्यशास्त्रीय परंपरा में कथानक के विकास को अर्थप्रकृतियों, कार्यावस्थाओं और संधियों के माध्यम से समझा जाता है। इनके द्वारा नाटक की कथा अपने उद्देश्य की ओर क्रमशः अग्रसर होती है।
• कार्यावस्थाएं = आरम्भ, प्रयत्न, प्रत्याशा, नियताप्ती, फलागम
• अर्थप्रकृतियां = बीज, बिंदु, पताका, प्रकरी, कपि
• संधियाँ = मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श, निर्वहन
२) नेता – (पात्र, चरित्र चित्रण, नायक)
नाटक में निहित क्रियाओं को फल की ओर ले जाने वाला प्रधान पात्र नायक कहलाता है। भारतीय दृष्टि के अनुसार मुख्य कार्य का फल जिसे प्राप्त हो वह नायक कहलाता है। जबकि पाश्चात्य की दृष्टि से जो पत्र सारे क्रिया व्यापारों के केंद्र में होता है वह नायक कहलाता है। भारतीय नाटक में सुखांत माना गया है, जबकि पाश्चात्य नाटक की अवधारणा दुखांत और त्रासदी है। नायक के अलावा नाटक में प्रतिनायक, खलनायक, नायिका, विदूषक, सूत्रधार, चैट-चैटी, विक्ट, विद्वान आदि पात्र भी होते हैं।
नाटक या महाकाव्य का नायक चार प्रकार का होता है –
• धीरोदात्त = वह नायक जो उदात्त गुणों से संपन्न, जिसका उदार चित्त हो, धैर्यवान, क्षमाशील होता है। जिसमें 16 गुण होते हैं। अपने धन वैभव बल और सौंदर्य पर घमंड नहीं करता, शरणागत की रक्षा करने वाला होता है। विपरीत परिस्थितियों में भी अपने आदर्शों तथा कर्तव्य से विचलित नहीं होता। उसमें वीरता के साथ विनम्रता और त्याग की भावना भी विद्यमान रहती है। उदाहरण: राम।
• धीरललित = वह नायक जो स्वभाव से कोमल, कलाप्रिय, निश्चिंत, विनोदी और प्रेमपूर्ण होता है। जिसकी ललित कलाओं में विशेष अभिरुचि होती है। उदाहरण – दुष्यंत, कृष्ण
• धीरप्रशांत = वह नायक जो शांत स्वभाव का हो तथा जिसकी धर्म में विशेष अभिरुचि हो। उदाहरण – युधिष्ठिर
• धीरोद्धत = वह नायक जो साहसी, शक्तिशाली, आत्मगौरव से युक्त तथा क्रोधी स्वभाव का होता है।
नायक के श्रृंगार के आधार पर भेद –
• अनुकूल नायक : वह नायक जो एक ही नायिका के प्रति एकनिष्ठ रहता है तथा सिर्फ उसी के प्रति अनुराग रखता है। वह अपनी नायिका के प्रति प्रेम, निष्ठा और समर्पण का भाव रखता है। उदाहरण – राम।
• दक्षिण नायक : वह नायक जो नवोधा से प्रेम करता है पर पूर्व पत्नी का सम्मान करता है। उदाहरण – शूद्रक (मृच्छकटिका)
• शठ नायक: वह नायक जो एक नायिका से प्रेम करने का दिखावा करते हुए दूसरी नायिका के प्रति अनुराग रखता है (अनेक नायिकाओं से प्रेम)।
• धृष्ट नायक: वह नायक जो अनेक स्त्रियों से प्रेम करता है और जिसके साथ रहता है उसे कहता है कि सबसे अधिक प्रेम उससे ही करता है। अपनी प्रेम-संबंधी त्रुटि अथवा परस्त्री-प्रेम प्रकट हो जाने पर भी लज्जित नहीं होता और अपने आचरण को छिपाने अथवा उचित ठहराने का प्रयास करता है।
• पात्र : वह व्यक्ति अथवा चरित्र है, जो नाटक की कथा में भाग लेता है और अपने संवादों, कार्यों, प्रतिक्रियाओं तथा व्यवहार के माध्यम से नाटकीय घटनाओं को विकसित करने में योगदान देता है। पात्र नाटक के कथ्य को मूर्त रूप प्रदान करते हैं और उनके पारस्परिक संबंधों तथा संघर्षों से नाटकीय प्रभाव उत्पन्न होता है। भारतीय रंगमंच में पात्रों का महत्त्व केवल कथा को आगे बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे विभिन्न सामाजिक स्थितियों, मानवीय भावनाओं, जीवन-मूल्यों और विचारों को भी अभिव्यक्त करते हैं। नाटक में नायक, प्रतिनायक, सहायक पात्र तथा गौण पात्र आदि विभिन्न भूमिकाओं में दिखाई देते हैं।
• चरित्र चित्रण : वह कलात्मक प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से नाटककार किसी पात्र के स्वभाव, व्यक्तित्व, विचारों, भावनाओं, गुणों, दोषों और मनोवैज्ञानिक विशेषताओं को उसके संवादों, कार्यों, व्यवहार तथा अन्य पात्रों के साथ संबंधों के माध्यम से उद्घाटित करता है। रंगमंच में चरित्र-चित्रण का विशेष महत्त्व है, क्योंकि यहाँ पात्रों का व्यक्तित्व केवल शब्दों से ही नहीं, बल्कि अभिनेता की वाणी, मुखमुद्रा, शारीरिक गतिविधियों, भाव-भंगिमाओं और मंचीय व्यवहार से भी व्यक्त होता है। प्रभावशाली चरित्र-चित्रण पात्रों को विश्वसनीय, स्वाभाविक और जीवन के निकट बनाता है। यह पात्र के व्यक्तित्व और उसकी विशेषताओं को कलात्मक रूप से प्रस्तुत करने की प्रक्रिया होती है।
३) रस और उद्देश्य :-
प्राचीन दृष्टि से नाटक में रस निष्पत्ति का होना अनिवार्य है और रंगमंचीय क्रियाकलाप से रस उत्पन्न होता और दर्शक रस का आस्वादन करते हैं।नाट्यशास्त्र के अनुसार – श्रृंगार, वीर, करूण रसों में से किसी एक रस की अनुभूति नाटक में मुख्य रूप से और अन्य रसों की स्थिति सहायक रूप में होनी चाहिए। किंतु, आधुनिक युग में रस से आगे बढ़कर नाटक में समयानुसार उद्देश्य की मांग की जाती रही है। आधुनिक हिंदी के जनक, महत्वपूर्ण नाटककार भारतेंदु ने नाटक के उद्देश्य को लेकर सटीक टिप्पणी की है – “आजकल की सभ्यता के अनुसार नाट्करचना में उद्देश्य अर्थात फल उत्तम निकलना बहुत आवश्यक है यह न होने से सभ्य, शिष्ट गण, ग्रंथ का तादृश आदर नहीं करते। अर्थात नाटक पढ़ने और देखने से कोई शिक्षा मिले जैसे – सत्यहरिश्चंद्र देखने से आर्य जाति की सत्यप्रतिज्ञा, नीलदेवी देखने से देशस्नेह इत्यादि की शिक्षा मिलती है।” भारतेंदु के मतानुसार नाटक के उद्देश्य का स्वरूप समाज और जीवन की ऐतिहासिक जरूरतों के अनुसार होना चाहिए। जो नाटक भाव को केवल रसानुभव तक ले जाते हैं अथवा उद्देश्य को समाज, इतिहास को निरपेक्ष, सनातन रूप में प्रस्तावित करते हैं वे आधुनिक दृष्टि से अपर्याप्त और अयोग्य होते हैं। किंतु, साहित्य के अन्य रूपों की तरह नाटक में भी उद्देश्य नाटक की रचना प्रक्रिया के भीतर से उत्पन्न होने चाहिए। आरोपित आरोपित होने पर विचार और साहित्यिकता दोनों की हानि होती है। नाट्यलेखकों और आलोचकों का ऐसा वर्ग भी है जो किसी सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक उद्देश्य को नाटक के लिए हानिकारक समझता है। जो मानते हैं नाटक में उद्देश्य होना चाहिए उन्हें यथार्थवादी आलोचक और जो यह मानते हैं की नाटक में उद्देश्य ना हो उन्हें आधुनिकतावादी नाट्य आलोचक कहा जा सकता है।
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