गौरी तिवारी चंदनिया छुप जाना रे, क्षण भर को लुक जाना रे निंदिया आँखों में आए, बिटिया मेरी सो जाए ले के गोद में सुलाऊँ, गाऊँ रात भर सुनाऊँ मैं लोरी-लोरी, हो, मैं लोरी-लोरी लोरी
गौरी तिवारी यह कथा है हिंदुस्तान की स्वाधीनता संग्राम की शहीदों का लहू है मिट्टी में यहां की ये गाथा है वीरों वीरांगनाओं की जहां राज्य हथियाने डलहौजी ने षड्यंत्र रचाया था वह मंगल
गोपालदास नीरज अमर उजाला (काव्य डेस्क) मैं सोच रहा हूँ अगर तीसरा युद्ध हुआ तो, इस नई सुबह की नई फसल का क्या होगा। मैं सोच रहा हूँ गर जमीं पर उगा खून, इस रंग
कविता (गौरी तिवारी) ऐसा क्यों होता है हर सपना पूरा होने से पहले ही टूट कर बिखर जाता है ऐसा क्यों होता है हर सच वास्तविक होने से पहले ही एक दिन सबसे
डॉ॰ अनिल कुमार सिंह प्राध्यापक,हिंदी विभाग आत्माराम सनातन धर्म महाविद्यालय, दिल्ली विश्विद्यालय रोहतक से जींद वाली सड़क पर गोहाना से लगभग दो-तीन किलोमीटर आगे बाई ओर एक पतली सी सड़क निकलती है। यह
पिछली सदी बड़ी प्रतिभाओं के जन्म और कर्म की सदी थी, यह उनकी जयंतियों, पिंडदानों एवं कर्मकांडों की सदी है। वह गदरचियों के प्रतिकार का दौर था, यह विदोरचियों के प्रचार का दौर है, वह
~ डॉ. अशोक कुमार पाण्डेय दंत चिकित्सा विभाग, राम मनोहर लोहिया अस्पताल, दिल्ली सब में ज्ञान की गंगा हो कोई भूखा ना नंगा हो इंसान लोगों से जंग न हो ना कहीं कोई दंगा
नदी एवं साहित्य में यह बुनियादी फर्क है कि नदी एक ही दिशा में अनंतकाल तक बहती रहती है, जबकि प्रत्येक मौलिक साहित्य एक नई दिशा लेकर आता है। वह तमाम तरह की सामाजिक जड़ताओं
सच एक ऐसा शब्द है, जिसे बोलने का इस देश में दावा तो हर आदमी करता है. मगर यह बोला बहुत कम ही जाता है। यह एक अदभूत संयोग है कि हमारी मूक फिल्मों की
गौरी तिवारी एक बहुत बड़े महानगर में एक बहुत छोटी कॉलोनी थी, जहां एक सीमित क्षेत्र में लगभग 20-25 परिवार रहते थे। सभी परिवार विभिन्न धर्म जातियों में बटे हुए थे लेकिन उन्हें जोड़ती