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Category: साहित्य

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पितृ-प्रेम (लघुकथा)

पितृ-प्रेम (लघुकथा)

गौरी तिवारी चंदनिया छुप जाना रे, क्षण भर को लुक जाना रे निंदिया आँखों में आए, बिटिया मेरी सो जाए ले के गोद में सुलाऊँ, गाऊँ रात भर सुनाऊँ मैं लोरी-लोरी, हो, मैं लोरी-लोरी लोरी

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स्वतंत्रता संग्राम (कविता)

स्वतंत्रता संग्राम (कविता)

गौरी तिवारी यह कथा है हिंदुस्तान की स्वाधीनता संग्राम की शहीदों का लहू है मिट्टी में यहां की ये गाथा है वीरों वीरांगनाओं की   जहां राज्य हथियाने डलहौजी ने षड्यंत्र रचाया था वह मंगल

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मैं सोच रहा हूं अगर तीसरा युद्ध हुआ तो (कविता)

मैं सोच रहा हूं अगर तीसरा युद्ध हुआ तो (कविता)

गोपालदास नीरज  अमर उजाला (काव्य डेस्क) मैं सोच रहा हूँ अगर तीसरा युद्ध हुआ तो, इस नई सुबह की नई फसल का क्या होगा। मैं सोच रहा हूँ गर जमीं पर उगा खून, इस रंग

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ऐसा क्यों होता है

ऐसा क्यों होता है

कविता (गौरी तिवारी)   ऐसा क्यों होता है हर सपना पूरा होने से पहले ही टूट कर बिखर जाता है   ऐसा क्यों होता है हर सच वास्तविक होने से पहले ही एक दिन सबसे

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नैक का चक्कर (कहानी)

नैक का चक्कर (कहानी)

डॉ॰ अनिल कुमार सिंह प्राध्यापक,हिंदी विभाग आत्माराम सनातन धर्म महाविद्यालय, दिल्ली विश्विद्यालय     रोहतक से जींद वाली सड़क पर गोहाना से लगभग दो-तीन किलोमीटर आगे बाई ओर एक पतली सी सड़क निकलती है। यह

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दिनकर : मुक्ति का लोक गायक

दिनकर : मुक्ति का लोक गायक

पिछली सदी बड़ी प्रतिभाओं के जन्म और कर्म की सदी थी, यह उनकी जयंतियों, पिंडदानों एवं कर्मकांडों की सदी है। वह गदरचियों के प्रतिकार का दौर था, यह विदोरचियों के प्रचार का दौर है, वह

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हर घर में तिरंगा हो

हर घर में तिरंगा हो

~ डॉ. अशोक कुमार पाण्डेय दंत चिकित्सा विभाग, राम मनोहर लोहिया अस्पताल, दिल्ली   सब में ज्ञान की गंगा हो कोई भूखा ना नंगा हो इंसान लोगों से जंग न हो ना कहीं कोई दंगा

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हिंदी साहित्य में नदी

हिंदी साहित्य में नदी

नदी एवं साहित्य में यह बुनियादी फर्क है कि नदी एक ही दिशा में अनंतकाल तक बहती रहती है, जबकि प्रत्येक मौलिक साहित्य एक नई दिशा लेकर आता है। वह तमाम तरह की सामाजिक जड़ताओं

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सिनेमा के आईने में मुस्लिम समाज

सिनेमा के आईने में मुस्लिम समाज

सच एक ऐसा शब्द है, जिसे बोलने का इस देश में दावा तो हर आदमी करता है. मगर यह बोला बहुत कम ही जाता है। यह एक अदभूत संयोग है कि हमारी मूक फिल्मों की

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अच्छे दिन आयेंगे

अच्छे दिन आयेंगे

गौरी तिवारी   एक बहुत बड़े महानगर में एक बहुत छोटी कॉलोनी थी, जहां एक सीमित क्षेत्र में लगभग 20-25 परिवार रहते थे। सभी परिवार विभिन्न धर्म जातियों में बटे हुए थे लेकिन उन्हें जोड़ती