व्यथा (कविता)

अब यह मात्र कोई व्यथा नहीं,

यह भीतर उठता प्रलय निनाद है

मन रूपी ज्वालामुखी के गर्भ में

सदियों से पलता हुआ यह प्रतिशोध अगाध है

इस विश्व में रेखाएँ नहीं, जंजीरें खिंची हैं

जहां स्वर्णिम शिखरों पर मदोन्मत्त अट्टहास है

वहीं नीचे कराहती असंख्य दबी हुई चीखें हैं।

कहीं अन्न व्यर्थ हो सड़ता है,

कहीं कोई कण-कण के लिए जीवन से लड़ता है

कहीं जन्म ही सिंहासन रचता,

कहीं पाने अस्तित्व भीख मांगना पड़ता है

लोहे के फंदे से लैंगिक बंधन

स्वप्नों की गर्दन कसते जाते

एक ही धरा, एक ही आकाश

फिर भी मानव गुटों में बँटते जाते

है धर्म यहाँ शस्त्र बना ,

मानव-मानव पर ही है तना

है मृगमरीचिका के जाल में वह फंसा

न जाने मानवता की डोर किस ओर कसा

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