अब हड़बड़ी में कृषि के साथ कोई गड़बड़ी न हो

अनिल तिवारी

 

अंग्रेजी में एक कहावत है ‘हेस्ट मेक्स वेस्ट’ यानी हड़बड़ी में गड़बड़ी की आशंका होती ही है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के टैरिफ पर अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बदले घटनाक्रम के बाद देश के विपक्षी दलों ने भारत अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर सरकार पर जल्दी बाजी का आरोप लगाया है। हालांकि विपक्ष के आरोप राजनीति प्रेरित है लेकिन अच्छी बात है कि आज (23 फरवरी) से वाशिंगटन में व्यापार समझौते को लेकर दोनों देशों के बीच होने वाली वार्ताकारों की बैठक टाल दी गई है। भारत सरकार के पास अब यह अवसर है किअपने कृषि प्रधान देश के किसानों के हित को ध्यान में रखते हुए फूंक फूंक कर कदम बढ़ाए तथा मजबूती के साथ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भारत के कृषि और डेयरी क्षेत्र को विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के चंगुल में जाने से रोके।
इसमें दो राय नहीं है कि संयुक्त राज्य अमेरिका बरसों से भारतीय कृषि बाजार में बड़ी और व्यापक पहुंच हासिल करने की कोशिश में है। हाल में अमेरिका के साथ भारत ने महत्वपूर्ण व्यापार समझौता किया जिसके तहत अमेरिकी बाजारों में भारतीय सामान 18 प्रतिशत के टैरिफ पर उपलब्ध हो कराना था। अब वहां के सुप्रीम कोर्ट के चाबुक चलने के बाद यह घटकर 15% पर आ गया है। हालांकि कुछ ऑटो कॉम्पोनेंट्स पर 25% और स्टील कॉपर और एल्यूमीनियम पर 50% टैरिफ का मसौदा आगे भी जारी रहेगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप की ओर से भारतीय सामानों पर मनमाने तरीके से थोपे गए पचास प्रतिशत के टैरिफ के मुकाबले मौजूदा व्यापार समझौते के तहत अमेरिका की ओर से प्रस्तावित 18 प्रतिशत और अदालती फैसले के बाद 15% का टैरिफ कम नही कहा जाएगा क्योंकि अतीत के करीब तीन प्रतिशत के मुकाबले यह बहुत ज्यादा है।
बहरहाल इस समझौते के मद्देनजर जिस तरह से अमेरिकी कृषि मंत्री ब्रुक लेस्ली रोलिंग्स ने खुशी जताई, उससे भारतीय किसान आशंकित हो उठे।
भारतीय किसानों के आशंकित होने की वजह रोलिंग्स का बयान ही नहीं, अमेरिकी कृषि विभाग की कोशिशें भी हैं। रोलिंग्स ने व्यापार समझौते पर तीन फरवरी को एक्स पर खुशी जताते हुए लिखा कि यह समझौता अमेरिकी कृषि उत्पादों को भारत के विशाल बाजार में अधिक निर्यात करने में मदद करेगा, जिससे अमेरिकी कृषि उत्पादों की कीमतें बढ़ेंगी। इससे ग्रामीण अमेरिका में नकदी आएगी। रोलिंग्स यहीं पर नहीं रूके। उन्होंने सिर्फ 2024 के आंकड़ों का हवाला देते हुए लिखा कि भारत के साथ कृषि कारोबार के चलते अमेरिका को 1.3 अरब डॉलर का घाटा हो रहा है। रोलिंग्स ने उम्मीद जताई कि नए व्यापार समझौते की वजह से विशाल आबादी वाला भारत अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए महत्वपूर्ण बाजार हो सकता है।

रोलिंग्स की इस खुशी की वजह से भारतीय किसानों का आशंकित होना जायज है। अमेरिका का कृषि व्यापार घाटा पचास अरब डॉलर है, इसलिए वह लगातार कोशिश करता रहा है कि भारत अपने कृषि बाजारों को खोले। भारत की चिंता की वजह उसकी खेती-किसानी वाली बड़ी जनसंख्या है। भारत के छियासी प्रतिशत किसान सीमांत या लघु हैं। जिनकी जोत दो हेक्टेयर से कम है। भारत में खेती पर करीब 10.7 करोड़ परिवार निर्भर हैं। यह जनसंख्या का करीब बासठ प्रतिशत है। अगर अमेरिकी कृषि उत्पादों को भारतीय बाजारों में घुसने की अनुमति मिलती है तो भारी सब्सिडी के चलते भारतीय बाजार अमेरिकी कृषि उत्पादों से भर जाएंगे। इससे भारतीय उत्पादों की मांग घट सकती है। इससे भारतीय किसानों के सामने संकट उठ खड़ा हो सकता है।

किसानों की आशंकाओं को विपक्षी दलों ने अपने ऊंचे सुरों से और बढ़ाया ही है। हालांकि कृषि, किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री मैं बार-बार कहा है कि भारत-अमेरिकी व्यापार समझौते में भारतीय कृषि और डेयरी क्षेत्र के हितों से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया गया है और किसानों के हित पूरी तरह सुरक्षित हैं। केंद्रीय मंत्री का यह भी कहना है कि इस कारोबारी समझौते से देश के मुख्य खाद्यान्नों, मिलेट्स, फलों,सब्ज़ियों और डेयरी उत्पादों को पूरी तरह अलग रखा गया है। इस लिहाज से देखें तो इस कारोबार समझौते से देश के कृषि और डेयरी क्षेत्र पर किसी प्रकार का खतरा नहीं है। उनके मुताबिक, इस समझौते से भारतीय किसानों को नए अवसर मिलेंगे,क्योंकि इस समझौते में कृषि क्षेत्र को नुकसान पहुंचाए, ऐसा कोई प्रावधान नहीं किया गया है। लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से या यह कहें कि चोर दरवाजे से कृषि के क्षेत्र में दाखिल होने की गुंजाइश समझौते में दबाव डालकर बनाने की कोशिश की गई है। भारत अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों को चावल का बड़ा निर्यातक है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारत की ओर से अमेरिका समेत कई देशों को करीब 63 हजार करोड़ के चावल का निर्यात कर चुका है। भारत सरकार का दावा है कि नए टैरिफ समझौते से भारतीय किसानों के चावल और मसालों के साथ ही टेक्सटाइल का निर्यात बढ़ेगा।

भारत-अमेरिकी समझौते के तहत भारत को अमेरिका से पांच सौ अरब डॉलर का सामान पांच सालों में खरीदना है। वैसे समझौते पर जो संयुक्त वक्तव्य जारी हुआ है, उसके तहत भारतीय कृषि बाजार को भी खोलने की बात कही गई है। लेकिन सरकारी सूत्रों का कहना है कि इस समझौते से, भारतीय चावल, गेहूं, सोया और मक्का जैसे अनाजों को बाहर रखा गया है और साथ ही ट्रेड डील से चीनी और डेयरी प्रोडक्ट्स भी बाहर हैं। ऐसा करने की वजह यह है कि भारतीय किसान और डेयरी उद्योग को कारोबारी परेशानियां न झेलनीं पड़ें। वैसे भी भारत लंबे समय से कृषि और डेयरी उद्योग को ‘रेड-लाइन’ यानी किनारे रखने वाला सेक्टर मानता रहा है। इसकी वजह है कि गांवों में इनसे जुड़े काफी रोजगार हैं। इन सेक्टर को खोलने को लेकर भारत की बातचीत यूरोप और ब्रिटेन से भी अटक चुकी है। ऐसे में अमेरिका के लिए इस बाजार को खोलना भारतीय किसानों के लिए नुकसानदायक तो होगा ही, राजनीतिक बवंडर की वजह भी बन सकता है। इस बवंडर का सामना करने की हिम्मत विरली राजनीतिक ताकतें ही कर सकती हैं। तीन कृषि कानूनों के के मसले पर सरकार की भारी किरकिरी हुई थी।
इस समझौते से भारतीय निर्यातकों, खासतौर पर एमएसएमई, किसानों और मछुआरों के लिए तीन लाख अरब अमेरिकी डॉलर का बड़ा बाजार खुलने की उम्मीद है। इसकी वजह से जो निर्यात बढ़ेगा, उससे महिलाओं और युवाओं के लिए लाखों नए रोजगार के अवसर सृजित होने की संभावना जताई जा रही है। भारत मक्का, गेहूं, चावल, सोया, मुर्गी पालन, दूध, पनीर, एथनॉल, तंबाकू, सब्जियां और मांस सहित संवेदनशील कृषि और दुग्ध उत्पादों को पूर्ण रूप से संरक्षित करेगा। दोनों देश अपने-अपने हित वाले क्षेत्रों में एक-दूसरे को तरजीही बाजार पहुंच प्रदान करने को लेकर प्रतिबद्ध हैं।
सभी जानते हैं की अमेरिकी कोर्ट के फैसले से साझेदारों को थोड़ी राहत मिली है लेकिन अंतर्राष्ट्रीय हालातो में बहुत ज्यादा फर्क पड़ने वाला नहीं है। क्योंकि टैरिफ के मामले को ट्रंप स्टेट पॉलिसी की तरह इस्तेमाल करते रहे हैं, और उनके रुख से ऐसा लगता नहीं कि आगे वो कोई बड़ा बदलाव करेंगे। अभी तो उन्होंने सिर्फ सेक्शन 122 का इस्तेमाल किया है लेकिन वह आगे सेक्शन 232 और 301 का भी सहारा ले सकते हैं।
फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन के डॉक्टर अजय सहाय का मानना है कि व्यापार समझौते की मुकम्मल तस्वीर साफ होने मैं अभी वक्त लगेगा लेकिन घटनाक्रम से व्यापार के लिए ज्यादा अनुकूल स्थितियां बनने की संभावना बढ़ गई है।
कुल मिलाकर अमेरिकी अदालत के दखल के बाद ट्रम्प प्रशासन के कस बल थोड़ा ढीले हुए हैं इसका लाभ हमारी सरकार कृषि और डेयरी क्षेत्र को महफूज रखने में मिल सकता है। सरकार अगर सोच समझ कर आगे बढ़ती है तो विरोधी दलों को भी आरोप लगाने का मौका नहीं मिलेगा वहीं हमारी खेती किसानी भी अक्षुण्ण रहेगी।

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