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गिरिजाकुमार माथुर की जयंती पर विशेष

होंगे कामयाब, होंगे कामयाब
हम होंगे कामयाब एक दिन
हो-हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
हम होंगे कामयाब एक दिन 

यह पंक्तियाँ जो मनुष्य को कठिन परिस्थितियों के बीच भी निराश होने के बजाय अपने लक्ष्य और अपनी सामूहिक शक्ति पर विश्वास करना सिखाती हैं, जो व्यक्तिगत सफलता से आगे बढ़कर सहयोग, सामूहिक संकल्प और निरंतर प्रयत्न की भावना को व्यक्त करती हैं, जो ‘कामयाबी’ को सिर्फ भविष्य की उपलब्धि के रूप में ही नहीं, अपितु वर्तमान संघर्षों के बीच आशा, आत्मविश्वास और बेहतर भविष्य के निर्माण की जीवंत मानसिकता के रूप में भी देखती हैं, महान कवि गिरिजाकुमार माथुर द्वारा लिखे गीत ‘हम होंगे कामयाब’ का अंश हैं।

हिंदी कविता के आधुनिक परिदृश्य में कुछ कवि ऐसे हैं जिनकी रचनाएँ अपने समय की सीमाओं को लाँघकर जनजीवन की सामूहिक चेतना का हिस्सा बन जाती हैं। गिरिजाकुमार माथुर ऐसे ही रचनाकार हैं। आधुनिक हिंदी कविता के महत्त्वपूर्ण कवि व प्रयोगशील रचनाकार गिरिजाकुमार माथुर का जन्म 22 अगस्त 1919 को मध्य प्रदेश के अशोकनगर में हुआ था। उनका रचनात्मक जीवन आधुनिक हिंदी कविता के उस संक्रमणकाल से संबद्ध है, जब कविता परंपरागत अभिव्यक्ति से आगे बढ़कर आधुनिक जीवन, सामाजिक यथार्थ, वैज्ञानिक चेतना, राष्ट्रीय आकांक्षा और नवीन शिल्प की ओर अग्रसर हो रही थी। उनकी जन्मतिथि उस काव्य-दृष्टि को पुनः स्मरण करने का अवसर है जिसमें स्वतंत्रता सिर्फ राजनीतिक सत्ता-परिवर्तन नहीं, अपितु मनुष्य की गरिमा, सामाजिक न्याय, शांति और सामूहिक प्रगति की सतत आकांक्षा है। उनकी दो चर्चित रचनाएँ इस विचार को विशेष रूप से सामने लाती हैं—‘आज जीत की रात’ पंक्ति से आरंभ होने वाली ‘पन्द्रह अगस्त’ कविता और ‘हम होंगे कामयाब’। एक ओर स्वतंत्रता की ऐतिहासिक रात्रि में लिखी गई ‘पन्द्रह अगस्त’  स्वतंत्रता के उल्लास को स्वर देती है; दूसरी ओर ‘हम होंगे कामयाब’ है, जिसमें भविष्य की विजय के प्रति सामूहिक आस्था मुखरित होती है। पहली कविता स्वतंत्रता प्राप्ति के क्षण को उत्सव के साथ-साथ उत्तरदायित्व में रूपांतरित करती है, तो दूसरी संघर्षरत मनुष्य को यह विश्वास देती है कि सामूहिक संकल्प अंततः सफलता का मार्ग प्रशस्त करेगा।

गिरिजाकुमार माथुर का साहित्यिक व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे कवि के साथ-साथ गीतकार, नाटककार, आलोचक और प्रसारण-माध्यमों से जुड़े रचनाकार भी थे। उनकी काव्य-यात्रा का आरंभ 1941 में प्रकाशित ‘मंजीर’ से माना जाता है। आगे चलकर अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तार सप्तक’ में उनकी कविताओं का समावेश हुआ। ‘तार सप्तक’ का प्रकाशन 1943 में हुआ और उसने हिंदी कविता में प्रयोगशील आधुनिकता की एक नई दिशा को प्रतिष्ठित किया। उनकी कविता में प्रगतिवादी और प्रयोगवादी दोनों प्रवृत्तियों का समावेश दिखाई देता है। गिरिजाकुमार माथुर की ‘पन्द्रह अगस्त’ भारतीय स्वतंत्रता की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रची गई महत्त्वपूर्ण कविता है। इसका आरंभ “आज जीत की रात” से होता है। पहली दृष्टि में यह पंक्ति विजय के उल्लास से भरी हुई प्रतीत होती है, किंतु कविता आगे बढ़ते ही स्पष्ट हो जाता है कि कवि केवल विजय का जयघोष नहीं कर रहा। वह स्वतंत्रता प्राप्त कर चुके देशवासियों को संबोधित करते हुए चेताता है कि यह विजय अंतिम पड़ाव नहीं है। कविता का केंद्रीय संबोधन ‘पहरुए’ को है। यह ‘पहरुआ’ कौन है? वह कोई पहरेदार या सैनिक नहीं अपितु स्वतंत्र भारत का आम नागरिक है। औपनिवेशिक सत्ता से मुक्ति के बाद राष्ट्र की रक्षा का दायित्व अब स्वयं जनता के कंधों पर है। इसलिए कविता में विजय के उल्लास के तुरंत बाद सावधानी का स्वर आता है। उपलब्ध पाठ में “पहरुए” को देशवासियों और देश के रक्षकों के रूप में समझाया गया है। यहीं माथुर की राष्ट्रीय चेतना सामान्य देशभक्ति से अलग दिखाई देती है। उनके लिए स्वतंत्रता केवल विदेशी शासन के अंत का नाम नहीं। स्वतंत्रता के बाद एक ऐसे समाज का निर्माण करना भी आवश्यक है जिसमें मनुष्य वास्तविक अर्थों में मुक्त हो। इसलिए कविता में स्वतंत्रता को “प्रथम चरण” कहा गया है। यह शब्द अत्यंत अर्थवान है। पहला चरण तभी सार्थक होगा जब आगे की यात्रा पूरी की जाए। स्वतंत्रता की पहली रात को कवि का यह दृष्टिकोण असाधारण रूप से दूरदर्शी था। 15 अगस्त 1947 भारत के राजनीतिक इतिहास में राजनीतिक परिवर्तन का दिन था, किंतु स्वतंत्रता के साथ विभाजन की त्रासदी, विस्थापन, सामाजिक विषमता और आर्थिक चुनौतियाँ भी उपस्थित थीं। ऐसे समय में केवल उत्सवधर्मी राष्ट्रवाद के बजाय माथुर का कवि स्वतंत्रता को निर्माण की प्रक्रिया के रूप में देखता है। स्वतंत्रता प्राप्ति को  जन-मंथन से जोड़ते हैं। स्वतंत्रता किसी एक दिन अचानक प्राप्त हुई वस्तु नहीं थी। उसके पीछे लंबे संघर्ष, असंख्य बलिदान और करोड़ों भारतीयों की आकांक्षाएँ थीं। इसलिए स्वतंत्रता के बाद भी मंथन समाप्त नहीं होता। अब यह मंथन राष्ट्र-निर्माण का मंथन है। इस रूपक में एक और महत्त्वपूर्ण बात छिपी है, मंथन से केवल अमृत नहीं निकलता, विष भी निकलता है। स्वतंत्र भारत को भी विकास के साथ अपनी सामाजिक विषमताओं, अन्याय, गरीबी और विभाजनकारी प्रवृत्तियों से जूझना था। अतः उनकी कविता विजय के साथ-साथ आत्मपरीक्षण का भी आग्रह करती है। उनकी कविताओं में आशावाद इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि वह यथार्थ से पलायन नहीं करता, वे कठिनाइयों को नकारकर आशावादी नहीं बनते। उनकी कविता में संघर्ष उपस्थित है, असमानता की चिंता उपस्थित है और राष्ट्र-निर्माण की जटिलता भी उपस्थित है। फिर भी वे निराशा को अंतिम सत्य स्वीकार नहीं करते। ‘हम होंगे कामयाब’ का विश्वास इसी सक्रिय आशावाद का प्रतिनिधि है। यहाँ कामयाबी सिर्फ मन में जागृत इच्छा नहीं, सामूहिक प्रयास का लक्ष्य है। जो विश्वास मनुष्य को निष्क्रिय प्रतीक्षा नहीं, बल्कि संघर्ष के लिए प्रेरित करता है।

गिरिजा कुमार माथुर ऐसे कवियों में शामिल थे जिनकी रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिकता लिए हैं जितनी उस समय जब प्रकाशित हुई थी। उनकी कविताओं में व्याप्त प्रश्न आज भी हमे विचार करने के लिए विवश करते हैं कि क्या स्वतंत्रता सिर्फ राजनीतिक स्वतंत्रता को कहा जाता है? क्या विजय प्राप्त करने के बाद हमारी जिम्मेदारियाँ समाप्त हो जाती हैं? क्या विकास के साथ सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा भी सुनिश्चित हो रही है? आदि। उनकी कविता हमें  कठिन परिस्थितियों में  सामूहिक विश्वास बनाए रखना सिखाती है। जहाँ एक ओर 15 अगस्त कविता हमें सजग नागरिक बनने का आग्रह करती है, तो वहीँ दूसरी ओर हम होंगे कामयाब आशावान नागरिक बनने का। एक हमें बताती है कि स्वतंत्रता की रक्षा करनी होती है, दूसरी यह विश्वास देती है कि सामूहिक प्रयास से भविष्य बदला जा सकता है। आज जब समाज अनेक प्रकार की चुनौतियों से गुजर रहा है, तब गिरिजाकुमार माथुर की कविता का ‘हम’ विशेष महत्त्व रखता है। वह साम्प्रदायिकता के बजाय सहभागिता, भय के बजाय विश्वास और निष्क्रिय प्रतीक्षा के बजाय सामूहिक प्रयत्न की ओर संकेत करता है।

 

 

 

गौरी तिवारी

 

1 Comment

  • ज्योतिषाचार्य अरुण कुमार मिश्र "प्रेरक-वक्ता" says:

    दिव्य प्रस्तुती

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