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धीर – धर्मपरायणा, मुदुभाषिणी कौशल्या

 डॉ. जयशंकर

 

कौशल्या रामकथा की ऐसी धीर गंभीर, धर्मकर्म का सिद्दत के साथ बिना किसी कोलाहल के अनुपालन करने वाली पात्र हैं जिनके अनुपस्थित में राम लीला की परिकल्पना भी संभव नही थी। क्योंकि रामकथा के आधार पुरूष प्रभु राम की जननी ये ही हैं। वे दक्षिण कौशल जो वर्तमान में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ का अंग है जिसे कहीं-कहीं कुशस्थल भी कहा गया है, के नरेश सुकौशल और रानी अमृतप्रभा की एकल कन्या संतान थी। इसीलिए रामायण के अयोध्या कांड के अध्याय 59 में उन्हें ‘कोसलेन्द्रदुहिता’ से संबोधित किया गया है। पुराणों में उनको ‘अदिति’ का अवतार भी कहा जाता है। ऐसी भी कथा मिलती है कि वे पूर्वजन्म मे आदि पुरूष मनु की पत्नी शतरूपा थी। पउम चरिउ में कौशल्या को अपराजिता नाम से अभिहित किया गया है और गुणभद्र कृत उत्तरपुराण में उनकी माता का दूसरा नाम सुबाला भी मिलता है। ऐसी भी कथा मिलती है कि जब लंकेश रावण को पता चला कि उसका संहारक इसी कन्या के गोद से जन्म लेगा तो उसने शैशवास्था मे ही कौशल्या का अपहरण कर गुप्त रूप से काष्ठ-पेटी मे करके समुद्र में एक महामत्स्य के मुख मे यह विचार कर कि ‘न रहेगा बांस न बाजेगी बांसुरी’ रख दिया था। लेकिन जब दूसरे महामत्स्य से उसकी लड़ाई हुई तो उसने उस पर प्रतिवार करने के लिए अपने मुंह से काष्ठपेटी को निकाल कर किनारे पर रख दिया। मौका पाकर किसी तरह बाहर निकलकर कौशल्या वहां से भाग गई।
चक्रवर्ती सम्राट राजा दशरथ जब अपने राज्य का विस्तार करने के लिए भारत के अन्य भागों की यात्रा करते हुए विभिन्न भूभागों के राजाओं से संपर्क करने के क्रम में उनकी सीमा के करीब पहुंचकर कौशल नरेश से संपर्क करना चाहा तो कौशलराज को लगा कि वे उन पर आक्रमण करने वाले हैं और दोनों में भीषण युद्ध हुआ। युद्ध में पराजित होने के पश्चात वे राजा दशरथ के शालीन, मधुर, सम्मानजनक व्यवहार से प्रभावित होकर अपनी अतिप्रिय पुत्री हेतु सुयोग्य वर की खोज मे पहले से लगे हुए राजा ने उचित अवसर देखकर दोनों राज्यों में मित्रता को और दृढ़ता प्रदान करने तथा मित्रता को आजीवन संबंध में परिवर्तित करने की प्रबल इच्छा से चक्रवर्ती राजा दशरथ के समक्ष विवाह करने का प्रस्ताव रखा। अंततः राजा दशरथ ने कौशल्या को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया और उनको अयोध्या की महारानी का गौरव प्राप्त हुआ। कौशल्या बहुत ही सहज-सरल, नेकदिल, मृदुभाषिणी, सर्वप्रिय तथा स्वाभिमानिनी, कुल-परंपरा, मान-सम्मान का अनुपालन करने वाली नारी थी। उनका अधिकांश समय धार्मिक पूजा-पाठ, व्रत-ध्यान, दान-पुण्य करने में व्यतीत होता था। कौशल्या के उपरांत राजा दशरथ ने दो और विवाह कैकयराज की सुमुखी, वीरांगना, कुशाग्र प्रज्ञा-संपन्न पुत्री कैकेयी तथा राजा सौमित्र की सहज, सरल, निराभिमानी स्वभाव की पुत्री सुमित्रा से किए। इन तीनों रानियों को कोई संतान न होने के कारण वंश परंपरा को आगे बढाने को लेकर महाराज दशरथ बहुत चिन्तित रहते थे। बहुत दिनों के बाद कुलगुरू वशिष्ठ की सलाह पर श्रृंग ऋषि के द्वारा पुत्रेष्ठि यज्ञ संपन्न कराने के उपरांत तीनों रानियों को पुत्र रत्नों की प्राप्ति हुई। कौशल्या को राम के अलावा शांता नाम की एक कन्या भी थी जिसको उन्होंने किसी ऋषि को गोद दे दिया था। पौराणिक कथा के अनुसार राम भगवान विष्णु के सातवें अवतार थे। ऐसा वर्णन मिलता है कि स्वायंभुव राजा मनु जी और उनकी पत्नी शतरूपा जी के द्वारा वृद्धावस्था में एक पैर पर खड़े रहकर ‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करते हुए की गई घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु के प्रकट होने और ‘वरदान मांगने’ के कहने पर दोनों ने उनसे इच्छा व्यक्त की कि किसी जन्म में आप हमारे पुत्र रूप में पैदा हों। ‘ऐसा ही होगा’ त्रेता युग में मैं सातवें अवतार में आप दोनों के पुत्र राम के रूप में जन्म लूंगा। जन्म के पश्चात राम ने जब मां कौशल्या को अपना विराट रूप दिखाया तो वे दोनों हाथों को जोड़कर बोली हे प्रभु, आप अपना यह विराट रूप त्याग कर शिशु स्वरूप मे होईये और शिशु लीला करिए। और राम ने माता का निवेदन स्वीकार कर शिशु रूप में लीला करने लगे। कौशल्या जी ने राम का पालन-पोषण बहुत ही संयम-नियम, अनुशासन के साथ करती हैं। उनके सर्वांगीण विकास के लिए सदैव तत्पर तथा जागरूक दिखाई देती हैं। सभी तीनों भाईयों की शिक्षा-दीक्षा एक ही गुरू के सानिध्य में और एक ही गुरूकुल में संपन्न हुई थी। लेकिन तीनों के व्यक्तित्व में जमीन आसमान का फर्क दिखाई देता है। यह अन्तर तथा वैशिष्ट्य और कुछ नही है अपितु तीनों माताओं के उनके स्वभाव, स्वरूच्यानुकूल पालन-पोषण तथा माताओं के विभिन्न गुणों, कलाओं, विद्याओं में रूचि लेकर अपने पाल्यों के अन्दर उनको संवर्द्धित, संपोषित करने के परिमाण का प्रभाव है। कौशल्या संपूर्ण रामकथा में सर्वत्र आदर्श माता के साथ-साथ पतिपरायणा आदर्श पत्नी के रूप में दिखती हैं। उनके व्यवहार और आचरण में एक आदर्श पट्टमहिषि, आदर्श ज्येष्ठा का स्वरूप भी मिलता है। श्री वेदव्यास कृत अध्यात्म रामायण में उन्हें अपने अधिकारों के प्रति सचेष्ट नारी के रूप में चित्रित किया गया है तथा राम को वन जाने से रोकते हुए चित्रित करके उनके मन की दुविधा के वर्णन के साथ उनके हृदय में प्रेम भावना और बुद्धि के परस्पर संघर्ष को बहुत ही खुबसूरती से चित्रित किया गया है।
जब महाराज दशरथ के द्वारा राम के राजतिलक करने की बात का उन्हें पता चलता हैं तो हृदय और मन की प्रसन्नता उनकी आंखों में अश्रु के रूप में छलछला उठती है। लेकिन वह इतनी धीर- गंभीर हैं कि प्रभु की परमकृपा का आशीर्वाद मानते हुए उन्हीं को समर्पित कर देती हैं और बाह्यजगत में होने वाली दैनिक चर्या तथा आहार-व्यवहार में किसी भी तरह की विशेष व्यंजना नहीं आने देती है। हालांकि इस सूचना के उपरांत तप-जप, पूजा-पाठ, ध्यान दान के प्रति उनका आकर्षण और बढ़ जाता है तथा ज्यादा से ज्यादा समय उन्हीं सब में व्यतीत करती हैं। जिस दिन राम का राजतिलक होना था उसके पूर्व वाली रात्रि को पूरे समय उन्होंने अराधना में ही व्यतीत किया। लेकिन सुबह होते ही सब कुछ बदल गया। राजतिलक के स्थान पर राम के लिए राजा ने बहुत दुखी मन से शोकाश्रुओं से आकुल- व्याकुल होते हुए 14 वर्ष का वनवास और भरत के लिए राज्याभिषेक की घोषणा की। एकाएक इस कुमंगल राजाज्ञा को सुनकर जहां कौशल्या को अपने कर्णकुहरों पर विश्वास नही हो रहा था वहीं पर वह अनेक तरह की चिन्ताओं से घिर जाती हैं और कह उठती हैं इदं तु दुःखं यदनर्थकानि मे व्रतानि दानानिच सयंमाश्वहि। तपश्च तप्तं यदपत्य काम्यया सुमि फलं बीजमिवोत भूषरे। इस सूचना की सत्यता प्रमाणित होने पर कौशल्या के आंखों के सामने अमावस रात्रि का घोर अंधेरा छा गया और चक्कर खाकर धड़ाम से अपने कक्ष में गिर गईं, चेहरे की आभा के विलुप्त होने के साथ- साथ उनके शरीर की सभी रक्तवाहिकाएं भी कुछ देर के लिए सूख गईं थी। पूरा शरीर निर्जीव हो उठा, हाथ-पैर कुछ भी हिलाने में अपने को असमर्थ पा रही थी। एकाध प्रहर में जब उनकी चेतना लौटी तो धीरे-धीरे अपने को संभालते हुए उठीं और मुख, हाथ पैर को मलती हुई अपने को पूर्व स्थिति में लाने की कोशिश करने लगी। कुछ देर के पश्चात महाराज सबकी नजरों से बचते हुए उनके कक्ष में प्रवेशकर युगल हस्त को क्षमा मांगने की मुद्रा में जोड़कर दृष्टि को अधोगामी किए हुए दीन स्वर में कहने लगे-महारानी जी आप तो कैकेय-दुहिता कैकेयी के स्वभाव को मुझसे ज्यादा ही जानती हैं कि वह कुलमानभंगिनी कितनी घोर स्वार्थिनी, जिद्दी, निज-हित की शर्तों पर जीवनयापन करने वाली अभिमानी और घमंडी है।
इन सबके मूल में वह तथा उसकी शरीरभ्रष्टा, कुलनाशिनी, दुर्बुद्धिजननी, कुलटा, चुगलखोर दासी मंथरा दोनों ही हैं। इन सबके बावजूद मै आपका घोर अपराधी हूँ, क्या आप मुझे क्षमा करेंगी? पति के इस दीन वचन को सुनकर कौशल्या जी ने महाराज को अनेक तरह से सांत्वना देने की कोशिश की और महाराज से बोली स्वामी, जिस स्त्री से दीनतापूर्वक प्रार्थना करता है, उस स्त्री के धर्म का नाश होता है। पति ही स्त्री के लिए लोक और परलोक का एक मात्र स्वामी है। वह यह कहती हुई महाराज की अपार वेदना से म्लान मुख देखकर सशंकित हो उठी ‘कौशल्याँ नृप दीख मलाना। रबिकुल रबि अँथयउ जियँ जाना।।’ उर धरि धीर राम महतारी। बोली बचन समय अनुसारी।। मानस अयोध्यकाण्ड दोहा 154-चौ. 2 वह पुत्र वियोग की अपनी असह्य पीडा को एक तरफ करके महाराज को धैर्य बंधाते हुए कहने लगी ‘नाथ समुझि मन करिअ बिचारू। सम बियोग पयोधि अपारू ।। करनधार तुम्ह अवध जहाजू। चढेउ सकल प्रिय पथिक समाजू ।।’उ धीरज धरिअ त पाइअ पारू। नाहि त बूड़िहि सब परिवारू ।। जौ जियँ धरिअ बिनय पिय मोरी। रामु लखनु सिय मिलहि बहोरी।। 4 हम देखते हैं कि कौशल्या परिवारिक प्रतिष्ठा को कायम रखने वाली, अपने पाल्यों में अच्छे संस्कारों को जागृत करने वाली अद्भुत ममतामयी मां के साथ अति सुलझी हुई पत्नी और पूरे परिवार की हित चिंता करने वाली विशालहृदया, उच्च विचारों से संपन्न पट्टमहिषि भी हैं। इतना कुछ विपरीत होने के बावजूद भी उनके अंतर्मन में किसी के प्रति किसी प्रकार का ईर्ष्या- द्वेष भाव नही है। वह इस होनी का किसी अन्य पर दोष न मढकर स्वयं को कारण बताती हैं। कौशल्या पूर्वजन्म की एक घटना का स्मरण करते हुए कहती हैं कि उस जन्म में मैने गाय के बछडों को उनकी माताओं के चाहने पर भी उनके थन से दूध नहीं पीने दिया और वे माएं रंभाती रह गई। जिस तरह से वे अपनी संतानों के लिए बहुत देर तक कलपती रहीं, संभवतः उसी कारण इस जन्म में मुझे भी कलपना पडेगा। अर्थात प्रकृति उसी का बदला मुझसे ले रही है। यह मेरे ही पूर्वजन्म के कर्मो का फल है। कौशल्या ईश्वर – न्याय के सामने अपने को शान्त भाव से समर्पित कर देती हैं। वह मूक भाव से पुत्र वियोग के अपार कष्ट को सहन करती हुई कष्ट सहन की प्रतिमा के रूप में दिखाई देती हैं। शान्ति, सरलता, पवित्रता, धैर्यता, गंभीरता, पवित्रता की साक्षात् प्रतिमूर्ति के रूप में उनका चरित्र संपूर्ण रामकथा में दिखाई देता है। वह सुख-दुख सभी परिस्थितियों में संयत आचरण से अनुपालन करती हुई दिखती हैं। जब श्रीराम अपने राज्याभिषेक होने की बात मां कौशल्या से बताते हैं- ‘अम्ब पित्रा नियुक्तो अस्मि प्रजापालनकर्मणि। भविता श्वो अभिषेको मे यथा मे शासनं पितुः।’ 35 अर्थात माँ! पिताजी ने मुझे प्रजापालन के कर्म में नियुक्त किया है। कल मेरा अभिषेक होगा। जैसा कि मेरे लिए पिताजी का आदेश है। तब वह बहुत ज्यादा उछल कूद न करते हुए अतिशालीन सौम्य भाव से प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहती हैं वत्स राम चिरंजीव हतास्ते परिपन्थिनः । ज्ञातीन मे त्वं श्रिया युकतः सुमित्रायाश्च नन्दय।।, अमोघं ब्रतं मे क्षान्तं पुरुषे पुष्करेक्षणे। येयमिक्ष्वाकुराजश्रीः पुत्र त्वां संश्रयिष्यति ।।39, 41 अयोध्याकाण्ड, चतुर्थ सर्ग अर्थात बेटा श्रीराम ! चिरंजीवी होओ। तुम्हारे मार्ग में बाधा डालने वाले शत्रु नष्ट हो जायें।, बडे हर्ष की बात है कि मैने भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए जो व्रत उपवास आदि किया था, वह आज सफल हो गया। जब श्रीराम के लिए चौदह वर्ष के वनवास की घोषणा हुई और राम जब मां से वन जाने की आज्ञा लेने गए तब कौशल्या बहुत ही गंभीर ढंग कहती हैं- बहुरि बच्छ कहि लालु कहि रघुपति रघुबर तात। कबहि बोलाइ लगाइ हियँ हरषि निरखिहउँ गात ।। 68 दोहा अयोध्याकाण्ड, बेगि प्रजा दुख मेटब आई। जननी निठुर बिसरि जनि जाई।। चौ. 67/3 अयो। जब भरत अयोध्या आते हैं और यहां की स्थिति देखकर माता कौशल्या के सम्मुख अपराधी की भांति जाकर क्षमा भाव में खड़े हो जाते हैं तो अपने कष्ट को अभिव्यक्त करने और क्रोधित होने की बजाए भरत के प्रति सदभाव से कहती हैं- राम प्रानहु ते प्रान तुम्हारे। तुम रघुपतिहि प्रानहु ते प्यारे ।। बिधु बिष चवै स्रवै हिमु आगी। होइ बारिचर बारि बिरागी ।।1/168 अयोध्या, लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि 164 हे भरत ! तुम्हारे और राम में कोई अंतर नही है। तुम राम के समान ही मुझे प्रिय हो। तुम्हारे उपर मुझे कोई संदेह नही है। वह भरत को हृदय से लगा लेती हैं। इस प्रकार हम देखते है कि कौशल्या जी लौकिक और अलौकिक दोनों रूपों में पवित्रता, वात्स्ल्यता की समुद्र और मृदुभाषिणी हैं।

लेखक – डॉ. जयशंकर शेरपुरवासी
वर्तमान मे निवास – लखनऊ
संपर्क सूत्र– 6394192621

सहायक ग्रंथो की सूची
1. वाल्मीकि रामायण
2. चौपाई 154 अयोध्या काण्ड तुलसीकृत रामचरित मानस
3. 3- अयोध्या काण्ड तुलसीकृत रामचरित मानस
4. श्लोक सं. 35 अयोध्या काण्ड वाल्मीकि रामायण
5. श्लोक सं. 39,41 अयोध्या काण्ड वाल्मीकि रामायण
6. दोहा 68 अयोध्या काण्ड तुलसीकृत रामचरित मानस
7. चौपाई 67/3 अयोध्या काण्ड तुलसीकृत रामचरित मानस
8. 9-168,164 अयोध्या काण्ड तुलसीकृत रामचरित मानस

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