यदि विरासत और परिस्थिति ही सबकुछ होते तो संसार में हमें इतनी भिन्नता नजर नहीं आती। एक ही माता-पिता के दो लड़के एक जैसी अवस्थाओं के अंदर उत्पन्न होते हैं परंतु वे रंग, रूप और बुद्धि में एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। दो पेड़ों के बीज भूमि पर गिरते हैं। एक भूमि में से मिठास के तत्त्व लेकर मीठे फल पैदा करता है दूसरा उसी से खुराक लेकर जहरीला फल पैदा करता है। एक ही वृक्ष के दो बीजों से एक जैसी भूमि पर भिन्न-भिन्न रूप और कद के दरख्त बनते हैं। यदि केवल परिस्थिति और जन्म के अनुसार ही संसार चलता तो कुछ विशिष्ट जोड़ों से पैदा हुए मनुष्य या दूसरी योनियों में इतना भेद कहाँ से आता कि कोई भी दूसरे से मिलता दिखाई नहीं देता। परिणाम यह है कि समस्त पैतृक प्रभाव के बावजूद हर प्राणी का अपना अलग व्यक्तित्व है, जो परिस्थिति से खास खास संस्कार ग्रहण करता है। यह व्यक्तित्व ही उसकी प्रकृति है। यही उसका स्वभाव है।
बाह्य प्रकृति को लेकर देखने से प्रतीत होता है कि वनस्पतियों के अंदर मन, बुद्धि आदि का कोई निशान नहीं मिलता। पशुओं में जहाँ इंद्रियों की काफी उन्नति हो चुकी है, हम मन और बुद्धि का प्रारंभ पाते हैं। उनमें बुद्धि निसर्ग या नैसर्गिक प्रेरणा की अवस्था है अर्थात् पशु जो कर्म करते है, स्वभाव से बाध्य होकर करते हैं। जब किसी जंगली जानवर को कोई हानिकारक पदार्थ खा लेने पर कष्ट हो जाता है तो वह वैद्यक शास्त्र जाने बगैर उसका स्वाभाविक इलाज कर लेता है। पशुओं को ब्रह्मचर्य का लाभबताने की जरूरत नहीं, उनके अंदर नर-मादा के संयोग की इच्छा सिवा नियत समय के कभी उत्पन्न नहीं होती परंतु कुत्ता, हाथी, बंदर आदि समुन्नत पशुओं के अंदर सोच-विचार के निम्न चिह्न पाए जाते हैं। मनुष्य में यह नैसर्गिक प्रेरणा बुद्धि का रूप ले लेती है। बुद्धि का अर्थ ही विचार है और विचार के साथ अच्छा तथा बुरा, लाभदायक और हानिकारक कामों में पहचान का होना भी आवश्यक है। यदि मनुष्य को किसी काम के विभिन्न पहलुओं पर विचार करने के बाद उसे करने या न करने का अधिकार न हो तो उसके अंदर बुद्धि के होने का कुछ अर्थ नहीं। जब बुद्धि इंद्रियों के वश में होकर चलती है तो मनुष्य को प्रकृति का गुलाम बना देती है। उस अवस्था में उसे स्वतंत्र नहीं कहा जा सकता है। इसलिए गीता के तेरहवें अध्याय के श्लोक 211 में लिखा है कि पुरुष का प्रकृति के उन गुणों के साथ बंधा होना ही जीव के जन्म-मरण के बंधन का कारण है। किंतु बुद्धियुक्त होकर व्यवसायात्मिका बुद्धि (जिसका अध्याय दो के श्लोक 412 आदि में उल्लेख है) प्राप्त करने पर ही मनुष्य प्रकृति के गुणों से ऊपर उठकर अधिकार कर सकता है।
मनुष्य दो प्रकार के होते हैं-1. उदासीन (विचार-स्वातंत्र्य से रहित) और 2. क्रियावान (स्वयं सोचकर काम करने वाला)। जिन देशों में विचार-स्वातंत्र्य की प्रथा बहुत कम है, वहाँ विशेष रूप से सब लोग नदी के प्रवाह के साथ तिनकों की तरह बह जाते हैं। मनुष्य की उन्नति का मार्ग यह है कि सब व्यक्तियों में हर विषय पर विचार करने का गुण पैदा हो। स्वयं सोचने वाले मनुष्य को क्रियावान कहा जा सकता है। मनुष्य के मन के दो भाग है- 1. ऐच्छिक, 2. अनैच्छिक। ऐच्छिक मन केवल जाग्रत् अवस्था में काम करता है, अनैच्छिक हर अवस्था में चाहे मनुष्य सोया हुआ हो या जागला। नींद में आनेवाले सपने इसी अनैच्छिक मन के काम हैं। बंदर की तरह यह मन विचारों के एक क्रम से दूसरे की तरफ दौड जाता है। इसे भाव साहचर्य का कानून कहा जाता है। एक बात विचित्र सी मालूम होती है, परंतु देखने में प्रायः आती है। यदि रात को सोने से पूर्व हम मन से कह दें कि सवेरे चार बजे जगा देना, तो प्रायः नियत समय पर अंदर से उठाने की आवाज आ जाती है। जिन आदमियों के मन और भी ज्यादा बड़े होते हैं, वे और भी अधिक प्रभावित होते हैं। ऐसे मनुष्य सम्मोहन या हिप्नोटिज्म के अच्छे माध्यम बन सकते हैं। और सम्मोहन की उपचार विधि (झाड या मंत्र यंत्र आदि) ऐसे लोगों के लिए लाभप्रद पाई गई है। इनके ऊपर दूसरे के भाषण या लेख का प्रभाव अधिक होता है। ऐसे आदमी केवल अच्छे सिपाही या शिष्य बन सकते हैं, उनके अंदर अपना रास्ता बना सकने का गुण कम होता है।
दूसरे प्रकार के मनुष्यों का ऐच्छिक मन बलवान् होता है। जहाँ ऐसे लोग अधिक हों यहाँ हर अवसर या कठिनाई में नेता पैदा हो सकते हैं। इस रास्ते पर चलकर आदमी मन को जीत सकता है और तत्पश्चात् यह दूसरों पर भी विजय प्राप्त कर सकता है। ये वे लोग है जिन्हें परिस्थिति नहीं बदलती, बल्कि वे ही परिस्थिति को बदल देते है। वे महापुरुष या दिलवाले कहलाते है।
भगवद्गीता के अध्याय चार का श्लोक 401 बताता है, जिस मनुष्य का मन अज्ञान और संशय में फँसा होता है, वह नष्ट हो जाता है। उसके लिए न इस दुनिया में सुख होता है, न उसमें। श्लोक 411 में कहा गया है, जिस मनुष्य ने कर्मयोग की सहायता से कर्मों को जीत लिया है और ज्ञान के संशय को टुकड़े टुकड़े कर दिया है वही आत्म-उन्नत है, वह कर्मों के बंधन में नहीं फँसता है।
इसी विषय को हम एक दूसरे दृष्टिकोण से भी देख सकते हैं। बाह्य संसार मनुष्य के मन का प्रतिबिंब है। विज्ञानवादी उसे विचारों का स्थान बना हुआ रूप कहते हैं। अर्थात् सब रूप मन से ही बने हैं। वे कहते हैं कि समस्त जगत् मन की तरंगों से ही बना, जैसे सारे रंग सूर्य की किरणों के प्रतिबिंब है। विज्ञान बताता है कि रंग वास्तव में कोई चीज नहीं है। हर एक पदार्थ पर सूर्य की किरणें पड़ती है, किरणों की लहरों से सब रंग दिखाई देते हैं। पदार्थ कुछ लहरों को अपने अंदर समा लेता है और बाकी वापस कर देता है। सभी प्रकार की लहरें आत्मसात् कर लेने पर काला रंग पैदा होता है और सभी लौटा देने पर सफेद । बिलकुल स्वार्थी मनुष्य काले रंग के और निस्स्वार्थ व्यक्ति सफेद के समान कहे गए हैं। जैसा कोई मनुष्य होता है वैसी ही उसे दुनिया नजर आती है। एक कंजूस धनिक को सब लोग लालची दिखाई देते हैं। भूखे से किसी ने पूछा, दो और दो? उसने जवाब दिया, चार रोटियाँ। नेक आदमी सबको नेक समझकर विश्वास कर लेता है।
कलरव
