अनिल तिवारी
बिहार के बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र से उठकर भाजपा संगठन के राष्ट्रीय क्षितिज पर पहुंचे नितिन नवीन की नवगठित टीम ने अपना कामकाज विधिवत शुरू कर दिया है। नवनियुक्त पदाधिकारियों का दिल्ली स्थित पार्टी मुख्यालय में औपचारिक स्वागत तथा आगे के काम के लिए रणनीतिक मंत्र देने का कार्यक्रम संपन्न हुआ। जिन्हें जगह मिली उनकी जय जयकार के बीच वे खुद को साबित करने की रणनीति बना रहे हैं वहीं पार्टी से जुड़े कार्यकर्ता, इधर-उधर के दलों से आए नेता गण और शुभचिंतक जो संगठन में जगह मिलने की आस लगाए बैठे थे वे अब गुलदस्ते के साथ फोटो खिंचवाकर डिजिटल मीडिया पर अधिक से अधिक प्रसारित करने के होड़ में जुट गए हैं।
मालूम हो कि स्वतंत्रता दिवस के दूसरे दिन यानी 17 अगस्त 2026 को घोषित भाजपा की नई टीम में 13 राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, 8 राष्ट्रीय महासचिव और 16 राष्ट्रीय सचिवों सहित संगठन के विभिन्न स्तरों पर व्यापक परिवर्तन किया गया है। प्रधानमंत्री ने नई टीम को संगठनात्मक अनुभव, ऊर्जा और जमीनी जुड़ाव का मिश्रण बताया और कहा कि नई टीम पार्टी को और अधिक मजबूती देने में सक्षम होगी।
दरअसल इस टीम को समझने के लिए इसे केवल ‘कौन आया और कौन गया’ के चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे भाजपा की दीर्घकालीन संगठनात्मक रणनीति, सामाजिक समीकरणों की समझ और आने वाले चुनावों की राजनीतिक चुनौतियों को पढ़ना अधिक महत्वपूर्ण है। नितिन नवीन की टीम का सबसे बड़ा संदेश है-पुराना अनुभव, पहले से परखे गए किरदारों को सहेजते हुए जेन जी और जेन अल्फा को चुनावी नफा नुकसान के हिसाब से साधने की कोशिश। पार्टी के संतुलनकारों ने भी यही कहा है कि पुराने को हटाकर युवा ऊर्जा नहीं लाई गई है, बल्कि अनुभव के साथ नई ऊर्जा को जोड़ने का नव प्रयोग किया गया है।
पीयूष गोयल को राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष बनाया गया है। श्री गोयल पार्टी प्रमुख नितिन नवीन की भांति ही एक तरह से परिवारवाद की उपज है। इनके पिता स्वर्गीय वेद प्रकाश गोयल पूर्व में 20 वर्षों तक पार्टी के कोषाध्यक्ष थे। उन्होंने अटल बिहारी वाजपेई जी की सरकार में केंद्रीय जहाज मंत्री के रूप में अपनी सेवाएं दी थी। पीयूष गोयल को मिली यह जिम्मेदारी बताती है कि संगठन में प्रशासनिक, आर्थिक और पेशेवर दक्षता के साथ-साथ पुराने अनुभव और प्रचलित परिपाटी को भी महत्व दिया जा रहा है। बी. एल. संतोष का राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बने रहना संगठन की निरंतरता को सुनिश्चित करता है। अर्थात् पार्टी के वास्तुकारों ने पूरी तरह से ‘पुराना हटाओ, नया लाओ’ की नीति नहीं अपनाई, बल्कि जहां पुरानी परिपाटी और निरंतरता आवश्यक थी वहां उसे बनाए रखते हुए परिवर्तन के लिए कुछ जगह बनाई है। नई टीम का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व है। भाजपा के लिए अब राजनीति चुनाव जीतने के साथ-साथ समाज के अलग-अलग वर्गों में संगठन की स्वीकार्यता और पहुंच बढ़ाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। नई टीम में महिलाओं, विभिन्न सामाजिक समुदायों, उत्तर भारत से लेकर पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत तक के प्रतिनिधित्व को स्थान दिया गया है। रिपोर्टों के अनुसार टीम में महिलाओं और अल्पसंख्यक समुदायों के प्रतिनिधियों को भी जगह मिली है।
यहां एक और महत्वपूर्ण संकेत दिखाई देता है-भाजपा अब केवल अपने परंपरागत समर्थक वर्ग से संवाद करने के बजाय नए मतदाता समूहों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है। जंतर मंतर के आंदोलन पर एक तरह से असफल रहने के बाद पार्टी ने यह स्वीकार किया है कि युवा, प्रथम बार मतदान करने वाली पीढ़ी, शहरी पेशेवर, तकनीक से जुड़े वर्ग और महिलाओं की राजनीतिक आकांक्षाएं आज चुनावी परिणामों को प्रभावित करती हैं। इसलिए संगठन में ऐसे चेहरों की आवश्यकता है जो केवल राजनीतिक भाषण न दें, बल्कि बदलते समाज की भाषा समझें। नई टीम बनाने के पहले प्रधानमंत्री ने खुद अपने सभी सहयोगियों से डिजिटल मीडिया खासकर इंस्टाग्राम पर अधिक से अधिक सक्रिय रहने का गुरु मंत्र भी दिया है। भाजपा की नई टीम में इसका प्रयास स्पष्ट दिखाई देता है। विशेष रूप से युवा मोर्चा और महिला मोर्चा के स्तर पर किए गए बदलाव इस बात का संकेत हैं कि संगठन भविष्य के मतदाता को आज से ही संबोधित करना चाहता है। जेन-जी को केवल सोशल मीडिया की पीढ़ी मानना भूल होगी। यह पीढ़ी रोजगार, तकनीक, उद्यमिता, पारदर्शिता, राष्ट्रवाद, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अवसरों को लेकर अलग तरह की अपेक्षाएं रखती है। भाजपा यदि इस पीढ़ी से वास्तविक संवाद स्थापित कर पाती है तो उसका लाभ केवल आगामी चुनाव में नहीं, बल्कि आगे की राजनीति में भी मिल सकता है।
नई टीम का सबसे बड़ा राजनीतिक परीक्षण हालांकि उत्तर प्रदेश और अन्य चुनावी राज्यों में होगा। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में संगठन की मजबूती का सीधा असर राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ता है। आगामी चुनावों की दृष्टि से भाजपा के सामने केवल सत्ता विरोधी भावनाओं का मुकाबला करने की चुनौती नहीं है, बल्कि विपक्ष के तेज होते हमले, जातीय समीकरण, युवाओं की आकांक्षाओं और स्थानीय मुद्दों को भी साधना है। इसलिए राष्ट्रीय टीम में उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देना चुनावी दृष्टि से स्वाभाविक रणनीति है। वर्ष 2024 के चुनाव में बस्ती से हार का सामना कर चुके हरीश द्विवेदी के कंधे पर बड़ी जिम्मेवारी दी गई है। वही पूर्व में कांग्रेस के नेता राहुल गांधी को उनकी पारंपरिक सीट रायबरेली से चुनावी शिकस्त दे चुकी पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को फिर से संगठन में लाया गया है। तेज तर्रार टीवी अदाकारा स्मृति ईरानी अपने तेज बोल बचन के लिए जानी जाती हैं। रोहित वेमुला कांड के दौरान उन्हें शिक्षा मंत्री का पद छोडना पड़ा था।
संगठन स्तर पर व्यापक बदलाव के बाद अब सरकार में भी फेरबदल और नए लोगों को शामिल करने की चर्चा जोरों पर है। यूं तो केंद्रीय मंत्रिमंडल से कुछ लोगों को हटाने और नए लोगों को शामिल करने की बातें पिछले कई महीनो से गाहे -ब-गाहे होती रही है। पर हम सभी जानते हैं कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व अपने फैसलों से हमेशा चौंकता रहा है। वैसे भी निशाने पर रहे शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान हटाए जा चुके हैं। पीयूष गोयल को कोषाध्यक्ष बनाकर नेतृत्व ने अपना मंतव्य स्पष्ट कर दिया है। केंद्र की सरकार के समर्थन में खड़े अन्य दलों के लोग भी मंत्रिमंडल के फेरबदल और विस्तार से जगह पाने की लालसा लगाए हुए हैं,
लेकिन मंत्रिमंडल विस्तार के संबंध में अभी किसी विशेष व्यक्ति की नियुक्ति को निश्चित मानना उचित नहीं होगा। प्रचलित प्रथा के अनुसार अंतिम निर्णय प्रधानमंत्री और उनके किचन कैबिनेट के सहयोगियों पर निर्भर करेगा। इसलिए भविष्य में कोई महत्वपूर्ण बदलाव हो तो उसे आश्चर्य के बजाय व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जाना चाहिए।
नितिन नवीन की नई टीम का सबसे बड़ा संदेश बदलते राजनीतिक वातावरण के अनुरूप उसकी दिशा और गति को संतुलित करना है। वरिष्ठ नेताओं का अनुभव, युवाओं की ऊर्जा, महिलाओं की बढ़ती भूमिका, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, सामाजिक विविधता और पेशेवर दक्षता-इन सभी को एक मंच पर लाने का प्रयास दिखाई देता है। नई टीम के 65 पदाधिकारियों में बड़ी संख्या में नए चेहरों को जिम्मेदारी मिली है, जो संगठन में पीढ़ीगत बदलाव को अपने खांचे में फिट करने के प्रयास को दर्शाती है।
आने वाले दिनों में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं। यह देखना दिलचस्प होगा
कि संगठन कितना जमीनी बनेगा, कार्यकर्ताओं और नेतृत्व के बीच संवाद कितना मजबूत होगा, सोशल मीडिया के शोर के बाहर जनता की वास्तविक समस्याओं को कितना समझा जाएगा और युवाओं-महिलाओं सहित नए सामाजिक वर्गों का विश्वास कितना अर्जित किया जाएगा-इन्हीं कसौटियों पर नितिन नवीन की नई टीम का मूल्यांकन भी होगा।
कुल मिलाकर यह टीम भाजपा की उस राजनीति की तस्वीर प्रस्तुत करती है जिसमें अनुभव को विरासत, युवा ऊर्जा को भविष्य और सामाजिक विविधता को विस्तार का माध्यम बनाने की कोशिश की गयी है। यदि यह टीम अपनी क्षमताओं को एक साझा संगठनात्मक लक्ष्य में बदल पाए, तो यह परिवर्तन पार्टी की कार्यशैली, जनसंपर्क और चुनावी रणनीति में दिखाई देने वाला परिवर्तन बन सकता है। आने वाले चुनावों में इस प्रयोग की परीक्षा होंगी। लेकिन हमें यह स्मरण रहना चाहिए कि ‘प्रथमे ग्रास मच्छिका पात’ की तर्ज पर पार्टी के मुखिया नितिन नवीन पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद अपनी पारंपरिक सीट बांकीपुर बचाने में असफल रहे हैं।
