कलरव
भुखमरी दुनिया की एक बड़ी समस्या है लेकिन उससे भी बड़ी समस्या है पौष्टिक भोजन। दुनिया भर के देशों की सरकारें साल 2030 तक भूख के संकट को पूरी तरह खत्म करना चाहती हैं। पौष्टिक खाना उपलब्ध नहीं होना उससे भी बड़ी समस्या है । दुनिया के करीब 269 करोड़ लोग ऐसे हैं जो सेहतमंद खाना नहीं सकते हैं। भारत में ऐसे लोगों की संख्या लगभग 52 करोड़ है।
खाने-पीने की बढ़ती कीमतें, कमजोर सप्लाई चेन और देशों के आपसी झगड़े पौष्टिक भोजन में बड़ी रुकावट बन रहे हैं। लोगों को जिंदा रहने के लिए जितने भी न्यूनतम खर्च की जरूरत होती है, सेहतमंद खाना उससे करीब 43 फीसद महंगा हो चुका है। किसी भी देश की विकास की रफ्तार को आगे बढ़ाने के लिए वहां के लोगों का स्वस्थ रहना बेहद जरूरी है। इसके लिए लोगों को पौष्टिक भोजन जरूर मिलना चाहिए। इसके बावजूद दुनिया का करीब हर तीसरा व्यक्ति सेहतमंद खाने से दूर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार शरीर को ऊर्जा देने के लिए कैलोरी समेत कई पोषक तत्वों की जरूरत होती है। वह भोजन जो शरीर के विकास और अच्छे स्वास्थ्य के लिए जरूरी हो, जिसमें आवश्यक पोषक तत्व जैसे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, कैलोरी आदि सही और पर्याप्त मात्रा में हो उसे संतुलित आहार या सेहतमंद खाना कहा जा सकता है। इसमें दूध, दही, हरी सब्जियां आदि आते हैं। खराब खानपान विकलांगता, कुपोषण समेत कई समस्याओं को जन्म देता है। हेल्दी डाइट डायबिटीज, दिल की बीमारी, स्ट्रोक और कैंसर समेत कई बीमारियों से बचाने में मदद करती है। इसलिए संतुलित आहार बेहद जरूरी है।
हाल ही में संयुक्त राष्टं की 5 एजेंसियों ने मिलकर एक रिपोर्ट जारी की। इसमें दुनियाभर में लोगों तक सेहतमंद खाने की पहुंच की स्थिति बताने के साथ ही भविष्य की चुनौतियों के लिए आगाह भी किया गया है।रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में भुखमरी की समस्या में धीरे-धीरे सुधार आ रहा है। साल 2022 में दुनिया की 8.6 फीसद आबादी भूख की मार झेल रही थी। साल 2024 में यह प्रतिशत घटकर 8. 1 पर पहुंच गया। साल 2025 में इसमें और सुधार हुआ। इससे यह 7.8 फीसद पर आ गया। एशिया और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों में इस समस्या से निपटने में प्रगति आई है। अफ्रीका में काफी समय से भुखमरी बढ़ रही थी। वहां भी हालत स्थिर होने लगे हैं। हालांकि अभी भी अफ्रीकी देशों में भूखे लोगों की संख्या ज्यादा है।
रिपोर्ट के अनुसार साल 2025 में अफ्रीका के रिकॉर्ड करीब 30 करोड़ लोग भूख से प्रभावित रहे। एशिया के देश जिसमें भारत भी आता है, वहां करीब 29 करोड़ लोगों के पेट खाली रहे। लैटिन अमेरिका व कैरिबियन देशों में यह संख्या केवल 3.2 करोड़ ही रही। अफ्रीका का हर 5 में से 1 व्यक्ति भुखमरी का सामना कर रहा है। वहीं एशिया की केवल 6.0 फीसद आबादी ही इस समस्या से जूझ रही है। लैटिन अमेरिका की स्थिति अफ्रीका और पश्चिमी देशों से काफी बेहतर है। यहां करीब 4. 8 फीसद लोग ही इस संकट से प्रभावित है।
रिपोर्ट के अनुसार साल 2025 में दुनियाभर के 210 करोड़ लोग यानी कुल आबादी के करीब 25.8 फीसद लोग इस फिक्र में जी रहे थे कि उन्हें भरपेट खाना मिलेगा कि नहीं। ऐसे लोगों को पेटभर और पौष्टिक खाने का कोई भरोसेमंद स्रोत नहीं था। हालांकि भूख से परेशान होने का यह आंकड़ा साल 2024 की तुलना में करीब 28.7 फीसद कम है। वहीं साल 2025 में साल 2020 की तुलना में 13.5 करोड़ कम लोगों ने भूख के संकट का सामना किया। साल 2020 से एशिया, लैटिन अमेरिका और कैरिबियन देशों में लगातार सुधार देखा गया। रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में पुरुषों की तुलना में महिलाओं को ज्यादा भूख के संकट का सामना करना पड़ा। उन्हें कभी कम भोजन तो कभी खाली पेट रहकर ही अपने दिन गुजारने पड़े। हालांकि साल 2024 की तुलना में साल 2025 में इस जेंडर गैप में मामूली गिरावट भी देखने को मिली। वहीं, साल 2015 के बाद पहली बार अफ्रीका में भुखमरी की स्थिति में सुधार देखा गया। शहरी और ग्रामीण इलाकों की बात करें तो ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों को खाने-पीने की चीजों का ज्यादा संकट का सामना करना पड़ा।
रिपोर्ट बताती है कि मौजूदा समय सेहतमंद खाने की पहुंच पहले की तुलना में थोड़ी आसान हुई है। साल 2021 के डेटा पर नजर डालें तो पता चलता है कि उस दौरान पूरी दुनिया के करीब 297 करोड़ लोग ऐसे थे जो अपने लिए अच्छा और पौष्टिक खाना नहीं खरीद पा रहे थे। इसके बाद के वर्षों में इसमें सुधार देखने को मिला। इसकी वजह से साल 2025 में यह संख्या घटकर 269 करोड़ रह गई। लोगों की आमदनी महंगाई की तुलना में तेजी से बढ़ी। हालांकि यह तस्वीर पूरी दुनिया में एक जैसी नहीं रही। अफ्रीका में हालत और बिगड़ गए।
संयुक्त राष्टं की पिछले साल आई रिपोर्ट में लोगों को सेहतमंद खाना क्यों नहीं मिल पा रहा है, इसकी वजह भी बताई गई थी। ये साल 2026 में भी बरकरार है। रिपोर्ट में बताया गया था कि सेहतमंद खाना कम आमदनी वाले लोगों के बजट से बाहर हो चुका है। पिछले साल एक व्यक्ति के रोजाना पौष्टिक खाने का औसत खर्च करीब 4. 28 डॉलर (करीब 100 से 120 भारतीय रुपये) था। यह गरीब परिवारों की रोजाना की कुल कमाई से भी ज्यादा है। वहीं कुछ अमीर या दूरदराज के देशों में पौष्टिक खाना गरीब देशों के मुकाबले 3 गुना तक महंगा है।
संयुक्त राष्टं की 5 एजेंसियों की रिपोर्ट बताती है कि दुनियाभर में मौजूदा समय की जो चुनौतियां हैं, उनसे निपटने के लिए भोजन की कमी और कुपोषण से निपटना बेहद जरूरी है। रिपोर्ट के अनुसार लोगों तक पौष्टिक खाने की पहुंच आसान बनाने के लिए अलग-अलग देशों में अलग-अलग उपाय करने की जरूरत है। सेहतमंद खाने को कम खर्चीला बनाने के लिए खेत से लेकर थाली तक के सफर में सरकार और अन्य संगठनों को मिलकरकाम करने की जरूरत है। सीधे छोटे किसानों, खेतों और मंडियों में लगातार बड़ा निवेश होना चाहिए, जिससे फसलें खराब न हों, और खाने की कीमतें कम हो सकें। इसके अलावा क्षेत्रवार भी कई अन्य तरीके अपनाए जा सकते हैं। यूएन ने चेतावनी दी है कि यदि सरकारों ने अपनी कृषि नीतियों में बदलाव नहीं किया तो भुखमरी को जीरो करने का साल 2030 का लक्ष्य पूरा नहीं हो पाएगा।
भारत सरकार ने देश में कुपोषण को दूर करने और पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने के लिए कई प्रमुख कदम उठाए हैं। प्रधानमंत्री पोषण योजना: सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में बच्चों को गर्म व पौष्टिक दोपहर का भोजन दिया जाता है।मिशन पोषण 2.0 इसमें बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए पूरक पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। राष्टंीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत देश की बड़ी आबादी को रियायती दरों पर खाद्यान्न उपलब्ध कराया जाता है। बच्चों और महिलाओं में खून की कमी (एनीमिया) दूर करने के लिए आयरन-फोलेट की गोलियां दी जाती हैं।
