अनिल तिवारी
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अपना महान भारत देश प्राकृतिक, नैसर्गिक और स्वाभाविक रूप से एक शुद्ध चित्त दार्शनिक देश भी है। यही कारण है कि हर भारतीय विभिन्न धार्मिक और दार्शनिक मान्यताओं पर खुले दिल से विमर्श करता है और तहे दिल से स्वीकार भी करता है। एक समय था जब स्वयं श्री कृष्ण ने अपने दर्शन में ज्ञान कर्म योग भक्ति का मार्ग दिखलाया, तब लोगों ने निष्काम कर्म को भी आगे बढ़कर अपनाया,जिया। कुछ साल पहले तक ‘कर्ज’ और ‘उधार’ शब्द लोगों को डरावना लगता था। वैश्वीकरण की आंधी आने के बाद अर्थायाम में बदलाव आया। दार्शनिक ऋषि चार्वाक की धारणाओं को बल मिला। नई पीढ़ी एक हाथ से कर्म तत्काल दूसरे हाथ में फल की दौड़ लगाते हुए इस असार संसार में भोग को महत्व देने लगी है। ‘यावत जीवेत सुखम जीवेत ऋणम कृत्वा घृतम् पिवेत’की संस्कृति का फैलाव हुआ है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा कर्जदार देश की सूची में शामिल है। आज हर भारतीय पर लगभग दो लाख रुपए का कर्ज है। कर्ज की यह प्रवृत्ति व्यक्तिक भी है और सांस्थानिक भी है। व्यक्ति जीवन-मरण में दिखावे के लिए बेतहाशा खर्च कर कर्जदार बना रहा है तो सरकारें और राजनीतिक दल सिर्फ सत्ता में आने के लिए, बने रहने के लिए खजाना खाली कर रहे हैं। यह जानते हुए भी कि दुनिया में कोई चीज मुफ्त नहीं होती और चाकू खरबूजा पर गिरे या खरबूजा चाकू पर कटना खरबूजा को ही पड़ता है, सरकारें दोनों हाथ से मुफ्त की रेवड़ी बांट रही है और लोग झोली बढ़ाकर जल्दी-जल्दी समेट रहे हैं। यहां कल क्या हो किसने जाना का तराना गाते हुए सभी कह रहे हैं कि ‘राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट।
इन दिनों देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। मतदाताओं को लुभाने के लिए सभी राजनीतिक दल बिना किसी हिचक के मुफ्त की रेवड़ियां बांटने का ऐलान कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में मतदान के पहले ही 37000 करोड रुपए कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर बांटे जा चुके हैं। इसमें से 20000 करोड़ से कुछ अधिक की राशि नकद के रूप में हस्तांतरित कर दी गई है।
मालूम हो कि अभी कुछ दिन पहले बिहार में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान 38000 करोड रुपए सीधे मतदाताओं के हाथ में पहुंचाए गए थे। तब इसे लेकर कई विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा करते हुए सवाल उठाया था, लेकिन इन दिनों सत्ता पक्ष के साथ-साथ वही विपक्षी दल दिल खोलकर सरकारी खजाना लूटाने की घोषणाओं में मशगूल हैं।
स्थापित सत्य है कि दुनिया में कोई भी चीज मुफ्त नहीं होती। हर मुफ्त में मिलने वाली चीज की कीमत वसूली जाती है। क्योंकि मांग और आपूर्ति से सजा अर्थशास्त्र अपना संतुलन समाजशास्त्र से साधता है। कुछ माह पूर्व बिहार में मुफ्त की रेवड़ी बांटने का परिणाम सामने है। बिहार की सरकार के पास जरूरी खर्चों के लिए एक फूटी कौड़ी नहीं है। खजाना खाली है। बिजली की दरें बढ़ा दी गई है, बुनियादी ढांचा से जुड़े कामकाज 100% ठप हो गए हैं। वित्तीय संकट से उबरने के लिए शराबबंदी हटाने का विकल्प भी तलाशा जा रहा है। बहुत संभव है कि राज्य में शराब बंदी की घोषणा करने वाले नीतीश कुमार के बिहार से हटते ही इसे कानूनी जामा पहनने की कोशिश राज्य के अगले मुख्यमंत्री की देखरेख में शुरू हो सकती है।
यह स्थिति केवल बिहार की ही नहीं है, बल्कि उन सभी राज्यों की है जिन राज्यों में मतदाताओं को लुभाने के लिए खजाना का आकलन किए बगैर मुफ्त की सौगात बांटने का ऐलान किया गया। हिमाचल प्रदेश के सरकारी कर्मचारी अपनी तनख्वाह को लेकर अक्सर धरना प्रदर्शन करते रहे हैं। हिमाचल सरकार के पास इतना भी फंड नहीं है कि वह समय से अपने कर्मचारियों की पगार अदा कर सके। मध्य प्रदेश सरकार का कर्ज़ लगातार बढ़ते हुए नई ऊंचाई दर्ज कर रहा है। इस बेतहाशा खर्च को लेकर सभी राज्यों की वित्तीय स्थिति पतली हो चुकी है। नीति आयोग की रिपोर्ट में भी इसे लेकर समय-समय पर गंभीर चिंता प्रकट की गई है।
कुछ साल पहले बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे का उद्घाटन करते समय देश के प्रधानमंत्री ने मुफ्त की रेवड़ी पर देश में बहस चलाए जाने की अपील की थी। लेकिन उनकी अपील हाथी के उस दांत की तरह थी जो खाने के लिए नहीं सिर्फ दिखाने के लिए होती है। उनकी घोषणा के कुछ ही दिन बाद भाजपा शासित राज्यों द्वारा मुफ्त कल्याणकारी योजनाओं का तेजी से विस्तार किया गया। केंद्र की सरकार ने उसी दौर में देश के पचासी करोड़ लोगों को मुफ्त में अगले 5 साल तक अनाज दिए जाने की घोषणा भी की थी, जो अब भी बदस्तूर जारी है। पिछले दो-तीन वर्षों में मुफ्त की योजनाओं की देश में बाढ़ आ गई है। दिल्ली की नई नवेली सरकार राज्य की महिलाओं को 100000 लाख रुपए मुफ्त उपहार के रूप में प्रदान करने का ऐलान किया है। वर्ष 2025- 26 के बजट को देखें तो केवल महिलाओं को नगद हस्तांतरण के रूप में सहयोग की योजनाओं पर 168040 करोड रुपए प्रतिवर्ष खर्च किए जाने का अनुमान है। इस खर्च के कारण वर्ष 2026 में राजस्व खर्च 7 से लेकर 9% तक बढ़ जाने का अंदेशा है। अगर राजस्व खर्च इस रफ्तार से बढ़ता है तो विकास कार्य की रफ्तार उसी अनुपात में धीमी होती जाएगी। सड़क, बिजली, पानी, स्कूल जैसे बुनियादी कामों पर आवश्यकता के अनुरूप बजट का आवंटन नहीं हो सकेगा। बजट के अभाव में अधिकांश राज्यों के सरकारी स्कूल धीरे-धीरे बंद करने पड़ रहे हैं।और अगर विकास का काम रुकता है या गति धीमी पड़ती है तो उसका सीधा असर रोजगार सृजन पर पड़ता है।
अगले साल देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में चुनाव होना है। जाहिर सी बात है कि वहां भी वोट बटोरने के लिए अनेक प्रकार की सहायता योजनाएं नगद की मुफ्त रेवड़ियां बांटी ही जाएगी। क्योंकि कमोवेश सभी राजनीतिक दलों ने यह मंत्र स्वीकार कर लिया है कि चुनाव के समय जनता को आधिकाधिक लाभ पहुंचा कर पाले में खड़ा किया जा सकता है, जनता भी यह मान चुकी है की राजनीतिक दल और उनके नेता चुनाव के दौरान जो दे सकते हैं उसका दोहन कर लेना चाहिए क्योंकि बाद में फिर वह अगले चुनाव तक क्षेत्र में दिखाई नहीं देते। एक तरह से दोनों तरफ ‘गिव एंड टेक’ की संस्कृति विकसित हो चुकी है। विचारधारा की राजनीति अब केवल कागजों पर, बैठकों में, नारों में और सेमिनारों में ही सुनाई देती है जमीन पर साम- दाम- दंड- भेद का बोलबाला है।आर्थिक मामलों के जानकार बता रहे हैं कि मुफ्त की योजनाओं के दबाव के कारण अगले दो वर्षों में केंद्र के सामने आर्थिक मोर्चे पर बड़ी चुनौती खड़ी होने वाली है। इस समय अमेरिका,इजरायल- ईरान युद्ध को लेकर पूरी दुनिया सकते में है। युद्ध का असर कीमतों पर अभी से दिखने लगा है। तेल गैस के साथ-साथ अन्य उपभोक्ता वस्तुओं के दाम भी बढ़ने लगे हैं। हालांकि सरकार बार-बार कीमतों पर नियंत्रण की बात कह रही है लेकिन अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ी तो राहत पैकेज की भी ज़रूरतें बढ़ेगी और राहत के लिए खजाना का मजबूत होना बहुत आवश्यक होता है। अगले साल आठवे वेतन आयोग के तहत नया वेतनमान लागू किया जाना है। केंद्र सरकार अगर आठवें वेतन आयोग की सिफारिश को मंजूर कर उसे लागू करती है तो राज्यों पर भी इसके लिए दबाव पड़ेगा। जो राज्य अभी ही निरुपाय है उनके लिए आने वाला दिन और संकट पूर्ण हो सकता है। सरकार के संतुलनकार महंगाई, आर्थिक दबाव और चुनावी योजनाओं का समन्वय करना चाहते हैं लेकिन खजाना खाली है, ऐसे में नंगा नहाएगा क्या और निचोड़ेगा क्या वाली स्थिति ही है।
मुफ्त की रेवड़ी सरकारों के लिए गले की हड्डी बन चुकी है। बातचीत में सभी इस दुष्चक्र से बाहर निकलना चाहते हैं लेकिन बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे के भय से ठिठके हैं। सीमित खजाने और सिकुड़ते संसाधनों के चलते शिक्षा और स्वास्थ्य पर सीधा असर दिखने लगा है।

One Comment
@AnilTiwari, बहुत ही बढ़िया और प्रभावशाली लेख है।