पढ़ने की ललक (कहानी)

गौरी तिवारी

 

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि भारत एक विशाल जनसंख्या वाला देश है, और इस देश के गांव ही वह जड़ें हैं जिनसे शहर विकसित होते हैं। यहां का एक बहुत बड़ा भाग आज भी गांव में निवास करता है। उन्हीं गांवों में से एक गांव है रेवती। वहां लोग प्रायः सादा जीवन व्यतीत करते हैं, अपनी आजीविका के लिए वे पूर्ण रूप से कृषि पर निर्भर नहीं हैं, दुकानदारी, अध्यापन, वकालत आदि का काम भी करते हैं। दिन में वहां के किसान तपती धूप में खेती करते हैं और महिलाएं घर का काम संभालती हैं तथा सायं काल को लोग चौपाल, द्वार अथवा किसी भी जगह एकत्रित होकर बातें किया करते हैं। सभी ग्रामवासी दूसरे के साथ एक परिवार की तरह मिलजुल कर रहते हैं तथा जरूरत पड़ने पर हमेशा एक दूसरे की सहायता करने के लिए तत्पर रहते हैं।

उसी गांव में से एक मध्यम वर्ग का परिवार है, जिसमें कुल 4 सदस्य थे, सत्यजीत, उसकी पत्नी सरस्वती तथा उनके दो बच्चे सिया और विद्वान। सत्यजीत गांव के ही एक विद्यालय में अध्यापक था, सरस्वती घर को संभालती थी एवं सिया 11वीं कक्षा में पढ़ती थी। पिछले वर्ष उसने 10वीं की बोर्ड परीक्षा में पूरे गांव में सबसे अधिक अंक प्राप्त करके प्रथम स्थान प्राप्त किया था और विद्वान 14 वर्ष का बालक है जो अभी नौवीं कक्षा में पढ़ता है। विद्वान अपने नाम की तरह ही बुद्धिमान है वह अपनी कक्षा का सबसे होशियार विद्यार्थी है बुद्धिमान होने के साथ-साथ विद्वान बहुत ज्यादा चतुर भी है, वह मुश्किल से मुश्किल स्थिति का सामना कर लेता है। एक बार वह 9 वीं कक्षा के द्वितीय सत्र की अंतिम परीक्षा देकर विद्यालय से अपने घर आ रहा था तभी अचानक से गाड़ी ने उसे टक्कर मार दिया, और कार चालक बिना अपनी गाड़ी रोके वहां से चला गया। एक व्यक्ति ने देखा कि विद्वान के सिर से बहुत खून बह रहा है, वह बेहोश है, यह देखते ही वह व्यक्ति तुरंत विद्वान के पास आया और उसे रिक्शे पर बैठकर पास के एक अस्पताल में ले गया। अस्पताल में विद्वान को भर्ती करवाने के बाद उस व्यक्ति ने विद्वान के बस्ते से उसका प्रमाण पत्र निकाला और उससे उसके माता-पिता का दूरभाष नंबर ढूंढ कर उनसे संपर्क किया। कुछ ही समय में विद्वान के माता-पिता अस्पताल पहुंच गए, जिस व्यक्ति ने विद्वान की जान बचाई वह उसके माता-पिता को सारी घटना बता देता है, यह सब सुनने के बाद विद्वान के माता-पिता उस व्यक्ति के प्रति अपना आभार व्यक्त करते हैं। विद्वान के बारे में सोच सोच कर वे दोनों अत्यंत चिंतित हो जाते हैं और डॉक्टर के आने की प्रतीक्षा करने लगते हैं, लगभग 2 घंटे बाद डॉक्टर आते हैं और विद्वान के माता पिता यानी सत्यजीत और सरस्वती से कहते हैं कि विद्वान का ऑपरेशन सफल हुआ उसकी जान बच गई परंतु उसने अपने दोनों नेत्रों की रोशनी को दी। यह सुनकर सरस्वती व सत्यजीत दोनों स्तब्ध रह जाते हैं और फिर डॉक्टर से पूछते हैं कि क्या इसका कोई इलाज है? क्या विद्वान की आंखों की रोशनी दोबारा आ सकती है? इस पर डॉक्टर ने कहा हमारे पास तो इसके लिए पर्याप्त मशीन एवं संसाधन नहीं है लेकिन यदि आप किसी बड़े अस्पताल में जाते हैं, तो वहां पर विद्वान का इलाज हो सकता है और उसकी आंखों की रोशनी भी लौट सकते हैं। यह सुनकर सरस्वती और सत्यजीत दोनों ही बहुत निराश हो जाते हैं क्योंकि उनके पास विद्वान का किसी बड़े अस्पताल में इलाज करवाने के लिए पैसे नहीं थे, जो पैसे थे उनसे वह लोग जैसे तैसे अपना जीवन यापन कर रहे थे।

कुछ समय बाद विद्वान को होश आया और उसने अपनी आंखें खोली, लेकिन उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था उसके चारों और सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा था। वह जोर से चिल्लाया मां… पापा…. दीदी…!! उसके चिल्लाने की आवाज सुनते ही उसके माता-पिता और डॉक्टर उसके पास जाते हैं, उसे देखते ही उसके माता-पिता उसे अपने गले से लगा लेते हैं। वह रो-रोकर पूछता है “मां मुझे कुछ दिखाई क्यों नहीं दे रहा? मुझे क्या हो गया है पापा? मेरे चारों सिर्फ अंधेरा है।” इस पर उसके माता-पिता कुछ कह ना पाने के कारण रोने लगते हैं, फिर डॉक्टर विद्वान से कहते हैं “बेटा, चोट लगने के कारण आपकी आंखों की रोशनी चली गई है पर आप चिंता मत कीजिए और आप डरिए भी मत क्योंकि कुछ समय के बाद आपको सब दिखने लगेगा।” यह सुनकर विद्वान के मन को शांति मिली और वह स्वयं के ठीक होने का इंतजार करने लगा।

दो दिन बाद विद्वान को अस्पताल से छुट्टी मिल जाती है और वह अपने माता-पिता के साथ अपने घर चला जाता है। घर पहुंचते ही विद्वान के माता-पिता उसकी बड़ी बहन सिया को सारी घटना बताते हैं और उससे कहते हैं कि इस मुश्किल घड़ी में उसे विद्वान का पूरा साथ निभाना है। उसी दिन शाम को लगभग 4:00 बजे विद्वान की नौवीं कक्षा का परिणाम आ जाता है और हर बार की तरह इस बार भी वह अपनी कक्षा में प्रथम आया है, परीक्षा के परिणाम से विद्वान का पूरा परिवार बहुत खुश होता है और उसके पिता विद्वान के लिए उसकी मनपसंद मिठाई लाते हैं, किंतु विद्वान एक कोने में उदास बैठा हुआ होता है। उसे उदास देखकर सिया ने उससे पूछा “तुम्हारी नौवीं कक्षा के परिणाम से सब खुश हैं लेकिन तुम यहां अकेले और उदास क्यों बैठे हो?” इस पर विद्वान ने कहा “दीदी, मुझे यह सोचकर बुरा लग रहा है कि मैं दसवीं कक्षा की बोर्ड की परीक्षा की तैयारी कैसे करूंगा? क्योंकि मेरी आंखों की रोशनी जा चुकी है, मैं अब बाकी बच्चों की तरह देख नहीं सकता।” यह बोलते-बोलते वह रो पड़ता है। सिया ने विद्वान को समझाते हुए कहा “विद्वान, तुम्हें मालूम है हर अंधेरी रात के बाद एक आशा से भरी सुबह होती है, क्योंकि जिस प्रकार अंधेरा सिर्फ प्रकाश का अभाव है वह कभी सदैव के लिए नहीं रहता ठीक उसी प्रकार यह अंधकार सिर्फ तुम्हारी आंखों का है लेकिन तुम्हारा भविष्य इस अंधेरे से कहीं ज्यादा उज्जवल है। इसलिए स्वयं पर इतना भरोसा रखो कि तुम्हारी आंखों का यह अंधकार कभी तुम्हारी जीवन की सफलता में बाधक ना बन पाए।” अपनी बड़ी बहन की यह सारी बातें सुनकर विद्वान को बहुत हौसला मिला तथा उसने हार ना मानने का दृढनिश्चय किया।

एक बार वह अपनी लाठी, जिसके सहारे वह दृष्टिहीन होने के बाद चलता था, उसे लेकर बाहर प्रकृति का आनंद लेने अर्थात प्रकृति को महसूस करने के लिए निकला। तभी रास्ते में उसे अपने दोस्तों (अमित, अभिषेक तथा रुद्र) की आवाज सुनाई दी, उसके दोस्तों ने उसे रोककर बुलाया लेकिन विद्वान को गलत दिशा में जाते हुए देखकर खुद उसके पास चले गए और उससे पूछा कि ये लाठी का सहारा लेकर क्यों चल रहा है? और चलती हुई गाड़ियों के सामने क्यों जा रहा है? और आखिर इतने दिनों से वह उनसे क्यों नहीं मिला। इस पर विद्वान ने अपने सभी दोस्तों को बताया कि नौवीं कक्षा की अंतिम परीक्षा देने के बाद उसके साथ क्या-क्या घटित हुआ और कैसे व दृष्टिहीन हो गया। यह सुनकर उसके दोस्तों ने उसे सांत्वना देते हुए कहा ” विद्वान इस मुश्किल घड़ी में तुम अकेले नहीं हो, हम सब तुम्हारे साथ हैं।” फिर सभी साथियों ने कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करने के लिए उसे शुभकामनाएं दी । तभी अचानक से रूद्र बोल पड़ा “विद्वान एक बात कहूं? पर तुम बुरा मत मानना… तुम्हारा नाम तो विद्वान है, लेकिन तुम तो दृष्टिहीन हो गए हो जिसके कारण अब तुम पढ़ भी नहीं सकते, इसका तो यही मतलब है कि एक प्रकार से तुम अपने नाम के विपरीत ही रहोगे।” रूद्र की इस बात से विद्वान बहुत निराश हो जाता है और रोते हुए वहां से चला जाता।

इस घटना के बाद वह मानो एक सदमे में चला गया, वह बार-बार अपनी पुरानी पुस्तकों के पृष्ठों को स्पर्श करके उन पर लिखे अक्षरों को समझने की कोशिश करता परंतु उसे कुछ भी समझ में नहीं आ पाता। उसे लगने लगा कि उसके आसपास का अंधेरा उसके जीवन में भी अंधेरा ला देगा और उसका जीवन कालमयी हो जाएगा। विद्वान के मन को उदासी ने घेर लिया था, वह चुपचाप घर के कोने में बैठा रहता, ना विद्यालय जाता और ना ही अपने दोस्तों से बातें करता। उसके जीवन में उमंग अब नाम मात्र की भी नहीं थी। विद्वान के पिता बहुत समय से यह सब देख रहे थे, इसलिए एक दिन उन्होंने विद्वान को अपने पास बुलाया और उससे कहा “बेटा विद्वान, तुम्हारे विद्यालय के नए सत्र को शुरू हुए 3 दिन हो गए हैं लेकिन तुम विद्यालय क्यों नहीं जा रहे हो?” इस पर विद्वान कहता है “पिताजी मेरी आंखों की रोशनी जाने के कारण मैं कुछ भी नहीं पढ़ पा रहा हूं, ऐसे में मेरा विद्यालय जाना व्यर्थ है क्योंकि मैं पढ़ लिख नहीं सकता।” यह सुनते ही विद्वान के पिता उसे समझाते हुए कहते हैं “परेशानियां तो तुम्हारी परीक्षा लेने आई है, यदि तुम इतनी जल्दी हार मान लोगे तो तुम जीवन की परीक्षा में कैसे उत्तीर्ण होगे?? और रही बात तुम्हारी पढ़ाई की तो आंखों की रोशनी जाने के कारण तुम्हारी पढ़ाई नहीं रुकेगी।” विद्वान अपने पिता से कहता है कि यदि उसे दिखाई ही नहीं देगा तो वह पड़ेगा कैसे?? इस पर उसके पिता कहते हैं कि वे उसकी पढ़ने में मदद करेंगे। अगले दिन से विद्वान ने विद्यालय जाना शुरू कर दिया, पहले तो अध्यापकों को लगा कि वह पढ़ नहीं पाएगा लेकिन फिर उन्हें विद्वान का हौसला देखकर विश्वास हो गया कि वह पढ़ लेगा। विद्वान अपने विद्यालय में पढ़ाए गए पाठों को सुनकर याद करने लगा और घर आकर जिस विषय में उसे समस्या होती वह अपनी बड़ी बहन सिया से समझ लेता। ऐसे ही पढ़ कर उसने बोर्ड की परीक्षा की तैयारी कर ली, अब सिर्फ एक समस्या थी कि वह परीक्षा में लिखेगा कैसे?? इस समस्या का भी हल विद्वान और सिया ने मिलकर निकाल लिया। सिया ने पड़ोस के एक बच्चे को कहा कि परीक्षा आरंभ होते ही वह विद्वान को प्रश्न बोलकर बताएगा और उस प्रश्न का जो उत्तर विद्वान उसे बताएगा, वह उसे विद्वान की परीक्षा की कॉपी में लिख देगा। विद्वान की पहली परीक्षा हिंदी विषय की थी, और उसने ठीक इसी प्रकार अपनी परीक्षा अच्छे से कर ली। ऐसे करते-करते विद्वान ने सारी परीक्षाएं दे दी, और बोर्ड परीक्षा में अपनी कक्षा में हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी प्रथम आया।

11वीं कक्षा में विद्वान ने विज्ञान विषय चुना और अच्छे अंको से परीक्षा पास की। विद्वान ने 12वीं बोर्ड परीक्षा में पूरे रेवती में प्रथम स्थान प्राप्त किया और नेत्रहीन होने के बावजूद उसके पूरे रेवती में प्रथम स्थान प्राप्त करने पर वहां के एक बड़े नेता ने विद्वान को बहुत बड़ी राशि की छात्रवृत्ति प्रदान की। इस छात्रवृत्ति के पैसों से विद्वान के माता-पिता ने उसका इलाज एक बहुत बड़े अस्पताल में कराया, जिसके कारण उसकी आंखों की रोशनी लौट आई। विद्वान अब एक बहुत बड़ा डॉक्टर है, और उसने अपने गांव लक्ष्मीपुर में ही हर मशीनों तथा संसाधनों से लैस एक अस्पताल खोला था कि जिस प्रकार संसाधनों के अभाव में उसका इलाज गांव में ना हो सका ऐसा और किसी के साथ न हो।

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