मां की ममता (कहानी)

गौरी तिवारी

 

पुराना जख्म अभी भरा भी नहीं था कि फिर किसी के चीखने की आवाज आती है, बेल्ट कि वह धारियां जब शरीर पर लगती है तो ममता अपनी पूरी कोशिश करती है कि वो रोए नहीं। उसकी सिसकियों के साथ रात ऐसे ही बीत जाती है, अगली सुबह एक प्यारा सा 5 साल का बच्चा ममता के पास जाता है और कहता है “मां, भूख लगी है मुझे खाना नहीं दोगी?” उस बच्चे को देखते ही ममता के सारे दर्द मानो कि गायब हो गए ! वह उत्साहित होकर उसे सीने से लगाती है और कहती है “तू ठहर, मैं अभी तेरे लिए कुछ पका कर लाती हूं।” टूटे हुए पैर से और चेहरे पर खुशी लेकर ममता रसोई में जाती है और देखती है की राजू के लिए क्या बनाए। चावल और शक्कर के अलावा रसोई में कुछ नहीं होता, वह मीठा चावल बनाती है और राजू को अपने हाथों से खिलाती है। उसके लिए राजू ही उसकी दुनिया है, राजू की आंखों में और उसके चेहरे पर खुशी की ललक देखकर ममता का मन गदगद हो जाता है। राजू भी अपनी मां से बहुत प्यार करता था रात की लोरी से लेकर शाम तक की अमूल्य ममता की उसे ऐसी आदत थी जो उस बच्चे को उसकी मां से एक पल के लिए भी ओझल नहीं देख सकती थी।

राजू अपनी मां से पूछता है “मां आपका पैर तो ठीक हो गया था, फिर यह दोबारा कैसे टूट गया? और चेहरे पर इतने सारे निशान कैसे हो गए?” उस बच्चे को करुणा भाव से देखते हुए ममता झूठ बोल कर बात टाल देती है। आखिर वह करती भी क्या, कैसे बताती कि उसके पिता रोज शराब के नशे में ममता को मारते हैं। जितना पैसा वो राजू के लिए मेहनत से कमाकर लाती, राजू के पिता सब छीन लेते। उस घर में ममता का एक-एक दिन आग की लपटों में डूबने जैसा था, जब-जब वह राजू को लेकर घर से भागने की कोशिश करती तब-तब उसका जानवर पति उसके शरीर की हड्डियां तोड़ देता था, उसके बेटे को मारने की धमकी देता था। ममता सारा अत्याचार उस मासूम के लिए सहती ताकि उसे एक अच्छी जिंदगी दे सके और उसे इस नरक से निकाल सके।

शराब का लती मनोज एक दिन लीवर की बीमारी से ग्रस्त हो गया, लगातार शराब के सेवन से उसकी दोनों किडनी खराब हो गई। ममता दिन रात मेहनत करती है, पाई-पाई जोड़ती है ताकि वह अपने पति की जान बचा सके, उसका इलाज करा सके। क्योंकि उसके मन में आज भी एक आस थी कि उसका पति सुधर जाएगा, पर होनी को कौन टाल सकता है, इलाज के दौरान मनोज ने दम तोड़ दिया। उसके मरने के बाद ममता की जिंदगी में कुछ खास परिवर्तन नहीं आया, क्योंकि अब तक सारे घर को वही चला रही थी। बस रोज-रोज की मार और लड़ाई-झगड़े से आज उसे मुक्ति मिल गई थी। वो अपने बच्चे को स्कूल भेज सकती थी, उसके भविष्य के लिए बिना डर के सपने देख सकती थी।

6 साल के लड़ाई-झगड़े और मारपीट से ममता की शारीरिक और मानसिक हालत दोनों बहुत दयनीय हो जाती है, आज उसकी एक आंख से 50% दिखना बंद हो जाता है उसका एक पैर टूट चुका था। शरीर पर जख्म अभी भी हरे थे, एक गरीब परिवार की लड़की जो सिर्फ उस समय आठवीं तक पढ़ी थी। उसके मां-बाप ने उससे छुटकारा पाने के लिए उसे एक जानवर से जिंदगी भर बांध दिया, यही कमी है हमारी समाज की यदि ममता के कहने पर उसके मां-बाप ने सही समय पर उसे मनोज से बचा लिया होता तो आज उसकी एक आंख और पैर सही सलामत होते। आज उसकी जिंदगी बेहतर होती, लेकिन ममता ने हार नहीं मानी। उसकी हिम्मत राजू था, उसने अपने जीवन का एक ही उद्देश्य बनाया था कि राजू को एक बहुत अच्छी जिंदगी देनी है तथा उसे एक बहुत सफल और कामयाब इंसान बनाना है जो हमेशा सच्चाई के मार्ग पर चलें।

अब ममता ने ठान लिया था कि राजू को अच्छी शिक्षा देनी है, इसके लिए उसे उसका दाखिला किसी अच्छे विद्यालय में कराना होगा, इसलिए उसने एक साथ दो-तीन घर में साफ-सफाई और बर्तन धोने का काम शुरू कर दिया। अपनी एक आंख और टूटे हुए पैर से वह बेचारी अपनी पूरी ईमानदारी से काम करती थी, लेकिन आज हम जिस पूंजीवादी समाज में रहते हैं वहां गरीब को लोग लालची, चोर और तिरस्कार के योग्य समझते हैं। ममता जिस जगह काम पर जाती थी, वहां अपने बेटे राजू को वह जरूर साथ ले जाती ताकि उसका ध्यान रख सके। एक दिन वह बर्तन धो रही थी और राजू उसके पास बैठकर अपनी पढ़ाई कर रहा था, लेकिन उसकी अमीर मालकिन को यह देखकर ठेस पहुंची कि एक गरीब नौकरानी का बेटा कैसे पढ़ सकता है। इसलिए उसने ममता से कहा कि अब से राजू भी काम करेगा, उनके घर के सारे जूते साफ करेगा। ममता को यह सुनकर बहुत बुरा लगता है, वह कहती है “मैम साहब, आपको जो करवाना है मुझसे करवाइए, मेरा बेटा राजू यहां सिर्फ इसलिए आता है क्योंकि इस पूरी दुनिया में उसकी मां के अलावा और कोई नहीं है जो उसका ध्यान रख सके। उसका भविष्य किसी के जूते साफ करना नहीं है बल्कि हर जरूरतमंद की मदद करना है और एक कामयाब इंसान बनना है।” एक नौकरानी के मुंह से इतनी बड़ी-बड़ी बातें सुनना आखिर कैसे किसी को पसंद आता । अगले दिन मालकिन ममता पर चोरी का आरोप लगा देती है और उसे तथा उसके बेटे को घर से निकाल देती है। वह पूरे कॉलोनी में ये बात आग की तरह फैला देती है कि ममता चोर है और उसका बेटा चोरी करने में उसकी सहायता करता है। ममता पर इतना बड़ा झूठा और बेबुनियाद आरोप लगता है जिसके कारण वह बहुत परेशान होती है, दुखी हो जाती है और सबको यकीन दिलाती है कि उसने ऐसा कुछ नहीं किया। किंतु फिर भी कोई उसकी बात नहीं सुनता। इतना ही नहीं, जिस घर में वह और उसका बेटा राजू रहते थे, वहां के मालिक ने भी उन्हें घर से निकाल दिया।

ममता अपने बेटे राजू को लेकर एक सड़क के चौराहे पर बैठी तारों को देख रही थी और अपने बच्चे को लोरी सुना रही थी ताकि वह सो जाए पर, 2 दिन का भूखा बच्चा जो बीमार भी था उसकी आंखें में नींद कैसे आती? वह सिर्फ अपनी मां को देखता और उसके आंसू पोछता। राजू ने कहा “मां, आप चिंता मत कीजिए, यह रात बीत जाएगी और कल एक नई सुबह होगी। फिर सब ठीक हो जाएगा।” ममता राजू की यह बात सुनकर रोती है और उसे कसकर सीने से लगा लेती है। ममता के लोरी गाने की वजह से आखिर कुछ समय बाद राजू को नींद आ ही गई, और उस बच्चे को सोता देख ममता भी सो जाती है।

अगली सुबह ममता काम की तलाश में राजू को लेकर फिर भटकती है, लेकिन ममता की कमजोर हालत देखकर उसे कोई काम नहीं देता। बड़ी मुश्किल से उसे एक मजदूरी का काम मिलता है जिसमें उसे ईंट तथा रेत से भरे भारी बोरे उठाकर एक स्थान से दूसरे स्थान रखना होगा। बेशक ममता की हालत बहुत खराब थी, पर फिर भी वह काम करती है ताकि इन्हीं कुछ पैसों से राजू को पाल सके। यही काम करते-करते 1 साल बीत जाते हैं, ममता ने अपने बेटे राजू को स्कूल भेजना शुरू कर दिया था, राजू सरकारी विद्यालय में ही पढ़ता था क्योंकि ममता के पास इतने पैसे नहीं जुड़ पाते थे कि वह उसे किसी बड़े स्कूल में पढ़ा सके।

दिहाड़ी मजदूरी करते करते ममता का स्वास्थ्य दिन-प्रतिदिन बिगड़ता जा रहा था, पर वह किसी से कुछ नहीं कहती, ना ही राजू को कुछ पता चलने देती। अपनी भूख और नींद त्याग कर वो राजू का पेट भरती थी, उसके पढ़ाई का सामान उसे पहले लाकर देती थी। दो ही साड़ी जिसमें अनेकों जगह टांके लगे थे, उसे भी वह नहीं बदलती क्योंकि अगर अपने लिए साड़ी खरीद लेगी तो राजू के कपड़े और घर का सामान कैसे आएगा।

राजू अपनी मां की मेहनत को बचपन से देख रहा था, मां के प्रति उसका स्नेह इतना था कि वह अपनी मां को कभी तकलीफ में नहीं देख सकता था। उसने अपनी मां की सहायता करने के लिए दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करते ही छोटे-छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया। ताकि वह भी घर चलाने में अपनी मां की मदद कर सके। जैसे ही राजू को पैसे मिलते हैं वह अपनी मां के लिए साड़ी लेकर आता है और कहता है “मां, यह साड़ी मैंने आपके लिए ली है, अब आप अपनी पुरानी साड़ियां मत पहनना क्योंकि उन दोनो में अनेकों जगह टांके लगे हुए हैं, वह पहनने लायक नहीं है।” राजू का अपार स्नेह देखकर ममता की आंखें भर आती हैं और वह उसे गले से लगा कर कहती है “बच्चे, तू ही मेरी दुनिया है, मैं सिर्फ तुझे एक अच्छा और कामयाब इंसान बनता देखना चाहती हूं, फिर मेरे जीवन का लक्ष्य पूरा हो जाएगा।” राजू उदास होकर कहता है “मां, क्या जब मैं सफल हो जाऊंगा तो आप मेरे साथ नहीं रहोगी?

आप मुझे छोड़ कर चली जाओगी? आप ऐसा क्यों कह रही हो मां, अभी तो मुझे आपको पूरी दुनिया घुमानी है, आपको बहुत सारी खुशियां देनी है और यदि आप नहीं होगी, तो मेरे कामयाब होने का कोई अर्थ नहीं होगा क्योंकि मेरे लिए जीवन की हर सफलता आप से जुड़ी है। आपकी खुशियां ही मेरी मंजिल हैं।” बेटे की ये सारी बातें सुनकर ममता फूट-फूटकर रोती है लेकिन अपने बेटे को सच नहीं बता पाती कि उसे कैंसर की बीमारी है। राजू को आशीर्वाद देकर बस इतना कहती है “तुझे अभी बहुत आगे बढ़ना है, इसलिए तू सही दिशा में मेहनत कर और ये बात याद रखना की तेरी खुशी में ही मेरी खुशी है। अपने जीवन को इतना बेहतर बनाना कि तेरे जैसे हर बच्चे का पढ़ने का सपना पूरा हो सके। भले वह गरीब व असहाय ही क्यों न हो। हर जरूरतमंद की मदद करना ताकि जिस तकलीफ से मैंने तुझे पाला है वह कोई और ना सहे।”

ममता द्वारा सिखाए गए आदर्शों पर चलकर और मेहनत से राजू आगे जाकर एक बहुत बड़ा अधिकारी बन जाता है और अपना प्रशिक्षण के बाद घर लौटते समय वह सड़क दुर्घटना में घायल हो जाता है। दुर्घटना में उसकी एक किडनी पूरी तरह से खराब हो जाती है। जब ममता को अपने बेटे की हालत पता चलती है तो वह बहुत रोती है, परेशान हो जाती है। अपनी हर संभव कोशिश करती है उसे बचाने की, पर पूरे शहर में उसे किडनी, ट्रांसप्लांट के लिए नहीं मिलती। अंत में ममता डॉक्टर से कहती है “मेरे जीवन में सिर्फ कुछ महीने ही बचे हैं, और यह जीवन सिर्फ मेरे बेटे के लिए है मैंने जिया है इसलिए आप मेरी किडनी ट्रांसप्लांट कर दीजिए।” यह सुनकर डॉक्टर और राजू के सारे अफसर दोस्त ममता को मना करते हैं और बोलते हैं की “माताजी एक दिन रुक जाइए, हो सकता है की कल तक किडनी का इंतजाम हो जाएगा। अगर आपको कुछ हो गया तो राजू जीते जी मर जाएगा, वह सहन नहीं कर पाएगा।” लेकिन ममता कहती है “नहीं, मेरा राजू अभी नहीं मर सकता, उसे अभी अपने समाज के लिए बहुत काम करना है, वह आगे बढ़ेगा और अपना कर्तव्य निभाएगा।” यह कहकर ममता ऑपरेशन रूम में चली जाती है और राजू का किडनी ट्रांसप्लांट हो जाता है, पर ममता को डॉक्टर नहीं बचा पाते। जब राजू की आंखें खुलती है और उसे सब पता चलता है तो वह अपनी मां की लाश को पकड़कर बहुत रोता है और कहता है “मां, मैं आप के बलिदान को कभी व्यर्थ नहीं जाने दूंगा। मैं अपना कर्तव्य अवश्य निभाऊंगा। ममता के नाम से राजू एक एनजीओ की शुरुआत करता है जिसमे वह अनाथ बच्चों की परवरिश की पूरी जिम्मेदारी उठाता है, उसके साथ ही वह बेसहारा माताओं और उनके बच्चों के लिए भी एनजीओ खोलता है जहां पर उनकी देखभाल हो सके और उनका जीवन बेहतर बनाया जा सके।

आज राजू एक सफल इंसान और एक कामयाब ऑफिसर बन चुका है, जो हर जरूरतमंद की मदद करता है और अपने कर्तव्यों के प्रति तत्पर रहता है।

यह ममता के आदर्श और प्यार का ही नतीजा था कि वह हर बच्चे को उतना ही प्यार करता जितना ममता ने उसे प्यार दिया और हर माता के लिए उसके मन में उतनी ही इज्जत होती, जितनी उसके हृदय में उसकी मां ममता के लिए थी।

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