(भेंट वार्ता)
पूरी दुनिया में हिंदी बोलने वालों की संख्या सौ करोड़ से अधिक हो चुकी है। भारत की 61 क्षेत्रीय बोली-भाषाओं का पुट समेटे हिंदी देश की चौथाई आबादी से ज्यादा लोगों द्वारा नियमित बोली जाती है। उदारीकरण के बाद से तो इसके विस्तार में खासी तेजी आई है। आज यह भाषा कारोबारी और डिजिटल होते दौर में अपना वर्चस्व जमाने की ओर अग्रसर है। हाल ही में केंद्रीय सरकार ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात कही तो देश के कुछ हिस्सों में तीव्र प्रतिक्रिया भी हुई। दरअसल देश के आजाद होते ही यह माना जा रहा था कि हिंदी के भी दिन बहुरेंगे और इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा मिल जाएगा, लेकिन काफी जद्दोजहद के बाद केवल राजभाषा का दर्जा हासिल हो सका है। हिंदी लगातार बढ़ रही है। हम यह गर्व के साथ कह सकते हैं कि बीते वर्षों में हिंदी ने भाषा के रूप में अपना एक अलग रुतबा बनाया है। देश के करीब-करीब हर क्षेत्र में हिंदी पहले से कहीं ज्यादा ग्राह्य हो चुकी है। हिंदी की लोकप्रियता का आलम यह है कि अब देश में इंजीनियरिंग और मेडिकल की शिक्षा भी हिंदी सहित कई स्थानीय भाषाओं में दी जाने लगी है। हिंदी के नाम पर आए दिन होने वाली राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों, सोशल मीडिया के मंच पर आयोजित किया जा रहे वेबीनार सेमिनार के आलोक में हिंदी की दशा, दिशा, विस्तार और चिंताओं को लेकर कलरव के संपादक अनिल तिवारी ने वैश्विक हिंदी परिवार के संरक्षक, भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अधीन’ केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल’ के पूर्व उपाध्यक्ष अनिल शर्मा ‘जोशी’ से लंबी बातचीत की है। प्रस्तुत है बातचीत के संपादित अंश…..
बकौल अनिल शर्मा जोशी, “हम भारतवासी भाग्यशाली हैं कि हमारे पास अरब सागर, बंगाल सागर और हिंद महासागर जैसे रत्नों से भरपूर लहराते हुए सागर और महासागर हैं। हमारा विशेष सौभाग्य है कि हमारे पास अपने हिंद में हिंदी का महासागर भी है। फर्क यह है कि प्रकृति और भूगोल के दिए सागर-महासागर खारे हैं, पर हमारी राष्ट्रभाषा, राजभाषा और मातृभाषा हिंदी का महासागर मीठा ही नहीं सारी दुनिया को मिठास देने वाला एक आगाध, अगम और अछोर महासागर है। यह हमारी रक्त भाषा, देश भाषा, मातृभाषा, राष्ट्रभाषा और राजभाषा की उत्ताल उठती लहरों से लहराता हुआ महासागर है। वह समय गया जब हम अपनी भाषा संपदा के अतीत पर बात करते हुए वर्तमान पर विचार को टाल देते थे और भविष्य के बारे में आकाश देखकर लंबी सांसे छोड़ते रहते थे। कुछ साल पहले तक हिंदी की बातें यदा कदा समारोह में ही हुआ करती थी। आज हम अपनी भाषा के अतीत को खंगालते हैं, वर्तमान को सजाते हैं और भविष्य के प्रति चेतना से परिपूर्ण जागृति की बात को आगे बढ़ाते हैं। आज हिंदी पर विचार विमर्श बातचीत गोष्टी संगोष्ठी बहस मुबहिसा आम बात हो गई है। पूरे भारत में और विश्व के कई देशों में प्रतिदिन हिंदी पर कुछ ना कुछ होता ही रहता है।
इन सारी चहल पहल और बातचीत में विचारणीय बिंदु हर जगह यह उभरता है कि हम स्वयं हिंदी भाषी और हिंदी वाले हिंदी के लिए कितना कुछ कर रहे हैं? अपनी भाषा और इसकी शब्द संपदा के लिए हमारी अपनी व्यवहारिक भूमिका क्या है? क्या हम खुद भी हिंदी में हैं? क्या हमारी अपनी हिंदी हमारे अपने विचार और व्यवहार में है? हमारी दैनंदिन दिनचर्या में हमारी राष्ट्रभाषा हमारी हिंदी का कितना और कैसा स्थान है?
हिंदी के एक अत्यंत विनम्र कलमकार के रूप में मुझे कुछ महत्वपूर्ण कारणों से देश की वसुंधरा को देखने का अवसर मिला। मेरे भारत भ्रमण के निमित्त में दो निमित्त बहुत ही महत्वपूर्ण और प्रमुख हैं। पहला केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल के उपाध्यक्ष का दायित्व संभालते हुए देश के विभिन्न भागों में जाकर हिंदी की जमीनी जानकारी प्राप्त करना तथा स्थानीय भाषाओं से उसके संपर्क का सम्यक ज्ञान अर्जित करना। दूसरा है भारत सरकार के गृह मंत्रालय की राजभाषा समिति की सदस्यता के नाते हिंदी के कार्य व्यवहार का सम्यक आकलन करना । इस दौरान सैकड़ों अन्य विभागों के साथ जानने समझने का अवसर भी प्राप्त हुआ। मैंने बहुत करीब से देश के भीतर हिंदी के साथ साथ स्थानीय भाषाओं को तेजी के साथ बढ़ते हुए महसूस किया। मैंने पाया कि पूरे भारत में ग्राम पंचायत से लेकर प्रत्येक सरकार में चाहे वह ग्राम की हो, वह नगर पंचायत और नगर परिषद और नगर पालिका और नगर निगम प्रदेश की हो या देश की हो प्रत्येक कुर्सी पर हमारा अपना ही भाई, बेटा, बेटी, बहू बैठे हुए हैं। एक भी कुर्सी पर कहीं कोई विदेशी बैठा हुआ नहीं मिला। तब फिर हिंदी को लेकर राजभाषा और राष्ट्रभाषा तथा देश भाषा के मामले में हम इतना खींझते हुए से क्यों हैं? इतना जलते हुए से क्यों हैं?
आज पूरी दुनिया में हिंदी बोलचाल के रूप में बढ़ रही है। यह हिंदी का परचम लहराने जैसा ही है, लेकिन हम भारतीयों को यहां ठहरकर कुछ बिंदुओं पर विचार करना चाहिए।
1- जहां तक राष्ट्रभाषा का सवाल है, भारत की राष्ट्रभाषा कल भी हिंदी थी, आज भी हिंदी है और आने वाले कल भी हिंदी ही रहेगी। हिंदी किसी ससद, किसी संविधान और किसी सरकार की मोहताज नहीं है उसके पास उसकी अपनी प्राण वायुऔर खुद की प्राण शक्ति है।
2- जो भाषा बाहर से आई है वही बाहर जाएगी। हिंदी भारत की मिट्टी से उपजी भाषा है। यह यहीं थी और यहीं रहेगी। उसे कहीं नहीं जाना है। हिंदी धैर्य की भाषा है। उत्तेजना और हिंसा की नहीं। उसकी प्रतीक्षा शक्ति अनुपम है।
3- भारत की किसी भी प्रादेशिक भाषा से हिंदी का कोई विरोध या अलगाव नहीं है। संसार की किसी भाषा के साहित्य और संस्कृति से हिंदी का टकराव या वैराग्य नहीं है। बशर्ते कि वह यहां की संस्कृति और साहित्य की भाषा हो।
4- हिंदी का सारा संघर्ष विदेशी भाषा की प्रभुता के खिलाफ है। फिर वह भाषा कहीं की भी हो। हिंदी स्वमेव हमारी संप्रभु भाषा है। हमारी सभी प्रादेशिक भाषाओं की समृद्धि और विकास तथा व्यवहार के प्रति हिंदी सांस सांस सक्रिय है। देश के भीतर हिंदी का संघर्ष राष्ट्रभाषा का नहीं राजभाषा का है। आज यदि केंद्र और प्रादेशिक सरकारों में बैठे मात्र हिंदी भाषी कर्मचारी और अधिकारी ही अपनी सेवा के समय हिंदी में ही काम करें तो राजभाषा का संघर्ष भी 80% समाप्त हो जाएगा।
5- हिंदी की पाचन शक्ति गजब की है। भाषा के शब्दों को पचाना, बचाना वह खुब जानती है। शब्द संपदा के आदान-प्रदान में वह बहुत ही उदार और अनन्य है।
6- हिंदी को सत्ता की न कोई भूख है ना प्यास है। उसका संघर्ष प्रतिष्ठा और सम्मान का है। हिंदी एक हृदय ग्राही भाषा है। हिंदी दासी भाषा तो है ही नहीं।
7- भारत में वही हिंदी टिकेगी और चलेगी जिसे गैर हिंदी भाषी लोग व्यवहार में बोलकर या लिखकर प्रारूपित करेंगे। यह हिंदी की शास्त्रीयता और शुद्धता का समय नहीं है। वह जैसा रूपाकार ले रही है उसे लेने देना चाहिए।
8- गैर हिंदी भाषी लोग जैसी हिंदी लिख या बोल रहे हैं, उन्हें वैसा ही करने दिया जाना चाहिए। उनका उपहास ना हो। उन्हें प्रोत्साहित किया जाए। हिंदी की सरलता ही उसकी अनुकूलता है। इसका सारलय्य ही इसका सील है।
9- इन पर, उन पर या दूसरों पर उंगली उठाने से पहले आप स्वयं से आत्मावलोकन करते हुए एक बहुत सा छोटा सवाल पूछे कि, क्या आप स्वयं, आपके परिजन, आपके बाल बच्चे अपना काम हिंदी में करते हैं, यदि इस प्रश्न का उत्तर “हां” में है तो आपको बधाई, और यदि उतर “ना” में है तो आप भारत माता और हिंदी माता पर कृपा करना कब से शुरू करेंगे?
10- क्या हिंदी की प्रतिष्ठा के अनुकूल आपके पास कोई व्रत, संकल्प या अनुष्ठान है? सरकारों में बैठे आपके भाई, बेटे, बेटियां, बहुएं अपना काम विदेशी भाषा में क्यों करते हैं? क्या आपने कभी उनसे पूछा? विदेशी भाषाओं के द्वारा आप किस पर रोब या रूतवा ग़ालिब कर रहे हैं, क्या आपने कभी सोचा? प्रश्न सरकारी और सामाजिक कार्यों का है। जो हाथ हिंदी में हस्ताक्षर करने तक में कापते हैं वह हाथ हिंदी के विकास और हिंदी की समृद्धि का झंडा कैसे थामेंगे?
11- आज सारे संसार के नक्शे को इधर से देखो या उधर से, हिंदी का सूरज पूरे आकाश को रोशनी दे रहा है। दुनिया के लगभग 200 देशों के विश्वविद्यालयों में हिंदी की उपस्थिति इसका प्रमाण है।भाषा का औपनिवेशिक किला लगातार ढह रहा है।
12-हिंदी किसी भी विदेशी भाषा की प्रभुता स्वीकार नहीं करेगी और ना ही कभी अपनी प्रभुता किसी दूसरी भाषा पर थोपेगी। आधुनिकता और विकसित विज्ञान को बहाना बनाकर हिंदी को अपमानित करना बंद होना चाहिए।
हिंदी के महासागर में अब लहर पर लहर उठती है। ज्ञात अज्ञात चट्टानों से टकराती है और अपनी मिठास से हर तट और तटीय भूगोल को तर रख रही है। आप यदि हिंदी भाषी है या फिर राष्ट्रभाषा और राजभाषा के हिमायती हैं, तो क्या आप इस महासागर के किनारे एक पर्यटक के रूप में बैठे हैं या और कोई दूसरा निमित्त भी आपके पास है? आत्मावलोकन के लिए आपके जीवन का प्रत्येक क्षण एकदम खुला और बिल्कुल व्यक्तिक है। न उसमें कोई भूगोल बाधा है ना कोई इतिहास ही उसे रोकता है।
खींझने, झल्ललाने या किसी के कोसने से हम हिंदी के निश्चल चरित्र को कोई नया आयाम नहीं दे पाएंगे। हम खुद पहले हिंदी के हो जाएं और हिंदी में हो जाएं। हिंदी में सोचे और हिंदी पर अवश्य सोचें। हिंदी के संदर्भ में यह युग और यह शताब्दी चिंता की नहीं है। यह हमारी चेतना का युग है। आत्ममंथन और पूर्ण समर्पण का युग है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम और आप अंतरराष्ट्रीय बनने के जुगाड़ में राष्ट्रीय भी न बचे हो। राष्ट्रीयता हमारी भाषा है और यही हमारा भारत है। हिंदी के बिना भारत और कुछ हो जाएगा। बस, हम भारत को भारत ही रखें और भारत ही रहने दें। भारत बढ़ेगा तो हिंदी भी बढ़ेगी। हिंदी बढ़ेगी तो भारतीयता राष्ट्रीयता अक्षुण्ण रहेगी।
