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“जिसके मुंह से सुनो, चारों तरफ यही हवा है, गैस सिलेंडर नहीं मिल रहा!, गैस सिलेंडर नहीं मिल रहा!, लोगों का यह दावा है।, महंगाई छेड़ रही है तान,, आम आदमी है परेशान।, रुपया गर्त में जा रहा,, डॉलर मस्ती में झूम रहा।, सत्ता का डंडा गरीबों पर चल रहा,, पूंजीपति खिलखिलाकर हंस रहा, सात वाली कटिंग चाय दस की हो गई है,, दुकानदार कहता है-गैस की कीमत बढ़ गई है।, “सखी सइयां तो रोज ही कमात है… महंगाई डायन खाए जात है।”
साल 2010 में जन्मी ‘महंगाई डायन’ अब जवान हो गई है और पहले से ज्यादा कातिल भी। आपको याद होगा, साल 2010 में फिल्म ‘पीपली लाइव’ आई थी, उसी फिल्म का यह गाना है। इस गीत ने उस वक्त देश की सत्ता को हिलाकर रख दिया था। फिल्म के निर्माता, निर्देशक, लेखक, गीतकार, गायक और कलाकारों ने खूब वाह-वाही लूटी थी। फिल्म इंडस्ट्री से इतर उस समय के कथित बुद्धिजीवी महंगाई से कुछ ज्यादा ही त्रस्त थे !
लेकिन अब साल 2026 में, वही बुद्धिजीवी ‘महंगाई डायन’ को लोकल नहीं, ‘ग्लोबल’ बता रहे हैं। पता नहीं, महंगाई डायन अभी ग्लोबल हुई है या पहले भी थी। महंगाई डायन ग्लोबल हो या न हो, वॉट्सऐप-जीवी और कथित बुद्धिजीवी ग्लोबल जरूर हो गए हैं।
दिल्ली-NCR में सात रुपये वाली कटिंग चाय दस रुपये में ऐसे बिक रही है, मानो वह चाय नहीं ‘लक्ज़री आइटम’ हो ! बात सिर्फ चाय की नहीं, बल्कि अन्य खाद्य पदार्थों का भी यही हाल है। लेकिन वॉट्सऐप-जीवियों को यह दिखाई नहीं दे रहा। हो सकता है उन्हें चीजों की कीमत बढ़ने में देश का विकास दिख रहा हो, जिसे आम आदमी समझ नहीं पा रहा।
सवाल यह नहीं है कि महंगाई कितनी है, बल्कि सवाल यह है कि वे ‘संवेदनशील’ कलाकार, प्रोड्यूसर, डायरेक्टर, लेखक और गीतकार-जो कभी महंगाई के नाम पर छाती पीट-पीटकर ऑस्कर की उम्मीद में ‘महंगाई डायन’ को पैदा किए थे-अब कहां दुबके बैठे हैं? क्या अब उन्हें महंगाई नहीं दिखती? क्या अब उन्हें ‘महंगाई डायन’ नहीं खा रही?
वह भारतीय प्रिंट मीडिया, जो सरकार की नाकामी और महंगाई डायन के आतंक पर अखबारों में रोजाना व्यंग्यात्मक लेख पेला करते थे, अब कहां हैं? कहीं वे सुपुर्द-ए-खाक तो नहीं हो गए?
वह भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, जो दिन भर फिल्म ‘पीपली लाइव’ की क्लिप चला-चलाकर आम जनमानस को सत्ता परिवर्तन का बारूद बना रहा था ताकि सत्तासीनों को उखाड़ फेंका जा सके, अब वह कहां है? क्या वे जल-समाधि ले चुके हैं?
मार्केट में निकलो तो दाम सुनकर कलेजा मुंह में आ जाता है। सब्जी मंडी अब ‘म्यूजियम’ बन चुकी है, जहां लोग सब्जियां खरीदने नहीं, उन्हें देखने जाते हैं। वह परवल और भिंडी जो कभी थाली की शान थे, आज ‘स्टेटस सिंबल’ बन गए हैं। पालक और टमाटर का भाव सुनकर लगता है जैसे किसी शेयर बाजार का सूचकांक देख रहे हों।
बड़ा ताज्जुब होता है। जिन कलमकारों की स्याही महंगाई के दर्द में गीली हो जाती थी, आज लगता है उनकी कलम में सूखा और अकाल पड़ गया है। जो गायक ‘महंगाई डायन’ का नाम ले-लेकर महफिलें लूटते थे, आज शायद उन्हें ‘मौन व्रत’ रखने की आदत पड़ गई है। क्या महंगाई अब ‘ग्लैमरस’ नहीं रही? या फिर उनकी ‘संवेदना’ मौसम के हिसाब से बदलती है? जब महंगाई पर बात करना ‘फायदे का सौदा’ था, तब सब साथ थे। आज जब हकीकत में ‘महंगाई डायन’ घर के चूल्हे पर बैठी है, वे सब ‘फ्लाइट मोड’ में चले गए हैं या फिर एसी कमरों में ‘निर्वाण’ प्राप्त कर रहे हैं।
सच्चाई यह है कि पर्दे की महंगाई और पेट की महंगाई में बहुत फर्क होता है। जो गीत गाते थे, उनके लिए ‘महंगाई डायन’ शायद मनोरंजन और रुपए कमाने की एक ‘कांसेप्ट’ थी। लेकिन हमारे और आपके लिए ‘महंगाई डायन’ हकीकत है, जो बढ़ते डॉलर और गिरते रुपये के साथ हमारे बच्चों के निवाले को छोटा कर रही है। सबसे ताज्जुब की बात तो यह है कि अंधभक्तों और गोदी मीडिया का अपना अलग ही तर्क है- “महंगाई देखनी है तो पाकिस्तान जाकर देखो। महंगाई हिंदुस्तान की लोकल समस्या थोड़े ही है, यह तो ग्लोबल है!”
क्या आपको लगता है कि कलमकारों को अब भी महंगाई, भ्रष्टाचार, शोषण, नफरत और अलगाववाद की राजनीति पर बोलना चाहिए? क्या ‘पीपली लाइव’ सिर्फ एक दौर का मजाक था? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।

One Comment
महंगाई डायन नाचे गली-गली,
थाली से रोटी छीन चली।
सब्ज़ी, दाल हुई अब महंगी,
आम आदमी की हालत तंग ही।
तेल, पेट्रोल छूए आसमान,
जेब में बचा ना कोई अरमान।
पसीने की कमाई रोए हर दिन,
खर्चों का बोझ बने संगीन।
बच्चों की हंसी भी हो गई कम,
घर का बजट हुआ बेदम।
फिर भी उम्मीद का दीप जलाए,
इंसान हर मुश्किल से लड़ जाए।
महंगाई डायन चाहे जितना डराए,
हौसला हमारा कभी न झुक पाए।