खुदगर्ज़ राजनीति, जुमलोंमें तब्दील होती भाषा और उनका सामना करता आख्यान
नित्यानंद तिवारी
जिस घटना पर आखिरी कलाम नामक उपन्यास लिखा गया है, उस घटना के समय बीजेपी की सरकार थी। जिस समयः यानी 2003 में लिखा गया, उस समय भी केंद्र में बीजेपी की सरकार थी। आज जब मैं उस रचना पर बात कर रहा हूं, तब भी केंद्र में बीजेपी की सरकार है। यह उल्लेख मैं एक विशेष अभिप्राय से कर रहा हूं। बीजेपी (आरएसएस समर्थित) सरकार ने जुमलों वाली ऐसी राजनीतिक भाषा ईजाद की है, जैसी कभी भी राजनीतिक क्षेत्र और भारतीय समाज में संभवत कुछ अपवादों के अतिरिक देखी-सुनी नहीं गई। कहते हैं यह भाषा उस राजनीति की उत्तराधिकारी है जिसमें कहा जाता है कि सौ बार एक ही झूठ बोलो तो वह सच हो जाता है। इधर, हाल की राजनीति ने एक ऐसा उप चेतन अप राजनीतिक हलका खोजा या पैदा किया है जिसमें छाती ठोक कर झूठ को सच और सच को झूठ बनाया जा सकता है। या फिर विभ्रम तो फैलाया ही जा सकता है। इसी स्रोत से अप राजनीतिक उप चेतन से जुमलों की राजनीति पैदा होती है। इस भाषा की विभ्रम पूर्ण चमक में वास्तविकता को ढकने-तोपने की साहसिक तार्किकता होती है। इस तरह की भाषा में हमारी राजनीति आज के पहले प्रवीण नहीं हो पाई थी। इस नई राजनीतिक भाषा ने आखिरी कलाम उपन्यास पर लिखने की प्रेरणा दी है।
सन 1992 में उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री कल्याण सिंह थे। उन्होंने प्रधानमंत्री नरसिंह राव और भारत के सर्वोच्च न्यायालय को यह वचन दिया था कि वह बाबरी मस्जिद के ढांचे की रक्षा करेंगे। इस कारण आरएसएस की भयोत्पादक और हिंसक भीड़ के होते हुए भी भारत की जनता को यह भरोसा था कि ढांचे की रक्षा की जाएगी। लेकिन उस दिन भाषा के भीतर बहुत तेज बहुत गहरी और लबालब खून से भरी कटार भोंकी गई। प्रधानमंत्री, संसद, भारत की जनता और सुप्रीम कोर्ट के सामने राजनीतिक संस्थाएं, न्यायिक संस्थान सरेआम खंडित हुई। जनता के विश्वास के साथ सबसे बड़ा धोखा किया गया। माननीय कल्याण सिंह जी ने अपने कथन पर कामम न रहने के लिए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और विडंबना यह कि गर्व से ना केवल उनका सीना उन्नत हुआ, उनकी पार्टी और उसके बड़े-बड़े नेता अद्भुत प्रसनता और विजय गर्व से भरे हुए देखे गए। कितनी बड़ी विडंबना है कि जिस कृत्य और घटना से पूरी भारतीय जनता विचलित और शर्मसार हुई, संसद से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक निरर्थक हुआ, इस राजनीतिक पार्टी और विचारधारा के लिए सबसे बड़े गर्व और विजय की अनुभूति हुई। ऐसी दुर्घटना आधुनिक भारत के इतिहास में कोई दूसरी नहीं है।
लेकिन उसी पार्टी की सरकार देश में है और कोई नहीं कह सकता कि दुबारा वैसी या उससे भी भयावह घटना नहीं घट सकती। सांस्कृतिक गर्व, सांस्कृतिक कर्म और सांस्कृतिक भाषा का यह अद्भुत मॉडल। इसी मॉडल पर यह उपन्यास लिखा गया है। इस राजनीति के बारे में दूधनाथ व्यंजनाओं के सहारे या बिना उसके लिखते हैं कि लोग एक साथ सार्थक और निरर्थक को जिए। कुछ लोग उल्लास और कुछ लोग दुख का उत्सव मनाएं। इस बेनतीजा राजनीति से अब वो जनता को थका देंगे। बेनतीजा राजनीति बिना अर्थ वाली चकमक भाषा भी पैदा करती है। उससे पैदा या उसका प्रतिनिधित्व करने वाला अध्यात्मिक पुरुष मूर्खता से किसी और उत्तेजक मूर्खता तक, घमंड से किसी दूसरे मारक घमंड तक, सर्वनाश से महाविनाश तक निजी और सामूहिक यातनाओं के बीच निजी और सामूहिक लूटपाट नोंच खसीट करता यह वीतराग बगुला भगत सार्थक और निरर्थक एक साथ…। वह जिएगा।
सार्थक और निरर्थक भाषा बोलने वाले नेता के व्यक्तित्व के बारे में आखिरी कलाम में दूधनाथ सिंह ने लिखा है… वह एक बहुत सख्त और निर्मम आदमी है.. बहुत कठोर लगभग एक पत्थर की तरह जिसमें कोई सुराख नहीं है, जिसके आर पार देखा जा सके। और जितने शख्त उतने ही निडर। यह अंश लगता है गांधीजी के बारे में लिखा गया है। लेकिन इतिहास और परिस्थिति के दबाव से इसमें अद्भुत अर्थ विस्तार हुआ है। यह आज के दिन सांस्कृतिक महापुरुषों, राजनीतिक नेताओं और धर्म रक्षकों के विभित्र प्रकार के नेतृत्व जमात का अर्थ देता है। आखिरी कलाम का पहला वाक्य है ‘किताबें शक पैदा करती है’। किताबें क्या-क्या करती है, इसकी अपेक्षा लंबा ब्योरा दूधनाथ ने दिया है, लेकिन उसे पार करके आज के भारतीय राजनीति का नया टेक्सट आंख में उंगली डालकर दिखा रहा है कि देखो भाषा कितनी अविश्वसनीय हो गई है। कहती संस्कृति है, करती हिंसा है। सारी जनता के कल्याण की कथा कहती है, लेकिन उसे जुमला मानकर सार्थक को निरर्थक बना देने में उसकी जुबान नहीं कांपती। यह उपन्यास जुमलों से भरा हुआ है, लेकिन उन जुमलों को वह परिस्थितियों के सामने भी रखता है। सबसे बड़ी बात है कि वह जुमलों को लिखकर व्यंग नहीं करता जैसा राग दरबारी में था। जुमले और तत्सम पांडे दोनों एक दूसरे के संपर्क में संताप पैदा करते हैं। इस स्तर पर उपन्यास की भाषा अद्भुत है। उसे समझने के लिए एनडीटीवी इंडिया को उद्धत करना चाहता हूँ। एनडीटीवी द्वारा अपने चैनल पर अपने प्रसारण के उद्देश्य के संदर्भ में कुछ वाक्य कहे जाते हैं। देखिए … खुदगर्जी खोखला न बना दे सोचने का तरीका… सच दिखाते हैं हम?
इस वाक्य की ताकत बड़ी तीव्रता से तब महसूस हुई जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बड़ा नैतिक सा लगता हुआ बयान दिया। वे सुशासन बाबू भी कहे जाते है। उनका कहना था कि अब वे भ्रष्टाचार को और अधिक बर्दाश्त नहीं कर सकते। वह मोदी की गोदी में गिर पड़े। उसी मोदी की गोदी में जिसके साथ उन्हें बैठना भी गंवारा नहीं था। इसका सिर्फ एक ही कारण है कि यह परम नैतिक मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार के विरोध की आड़ लेकर सत्ता लोभ नहीं छोड़ सका। यानि खुदगर्जीने उस नेता के सोचने के तरीके को खोखला बना दिया।
एक दूसरा उदाहरण है। कर्नाटक में चुनाव प्रचार
करते समय राहुल गांधी पर हमला करते हुए प्रधानमंत्री जी ने कहा कि वे नामदार हैं, हम कामदार हैं। दाएं हाथ पर बाएं हाथ से ताली बजाते हुए कहते हैं कि हमारे पास तो पहनने के लिए ठीक-ठाक कपड़े भी नहीं है। पूरी दुनिया में अपने कपड़ों के लिए जो प्रधानमंत्री मशहूर हो चुका हो, वह ऐसी भाषा बोलने का अधिकारी कैसे हो सकता है? लेकिन पार्टी वादी स्वार्थ में अंधा एक बड़ा मानव समुदाय उसके पीछे छिपे अनर्थकारी भाषिक घटना को देखता ही नहीं है। वह प्रधानमंत्री के कथन में उभरी वह स्वर भंगिमा जो अपमान पूर्ण है, उसी को सच मानता है। अर्थ और भंगिमा दोनों में अर्थ कहां है? वह जो भगिमा में है या वह जो तथ्य से उभरता है? ऐसे में एनडीटीवी का वाक्य बार-बार रखा जाना चाहिए कि खुदगर्जी खोखला न बना दे सोचने का तरीका। लेकिन विडंबना यह है कि खुद राजनीति के समर्थन में मीडिया जिसमें प्रिंट मीडिया भी शामिल है, एक अलग तरह की बहादुरी दिखा रहा है। राजनेता और उनके भाषण की प्रकृति ऐसे विज्ञापनों की भाषा की तरह हो चुके हैं जो विज्ञापित वस्तु की असलियत की जिम्मेदारी नहीं लेता। उसी तरह राजनेता भी अपने भाषणों में निहित राजनीतिक कार्यक्रमों और जनता की भलाई की जिम्मेदारी नहीं लेता। उन्हें जुमला कह कर अपनी जिम्मेदारी को नकार देता है।
दूधनाथ ने अपने उपन्यास में बेनतीजा राजनीति जो शब्दों और जुमलों पर चलती है और वह जनता जो शब्दों और जुमलों की राजनीति पर भरोसा करती है, उनमें शामिल होकर जैसे अंतर्दृष्टि प्राप्त कर दूधनाथ लिखते हैं, ‘कितनी आसानी से हमें नष्ट किया जा सकता है। जो भी हो शब्दों के भरोसे जो रहता है, एक ठेस ही काफी है उसे खत्म करने के लिए। बेनतीजा राजनीति तब होती है, जब वह जनता और समाज में परिवर्तन के मुकाबले सत्तावादी हो जाती है। तभी वह जुमलेबादी भी से जाती है… दुनिया के सारे धर्म शास्त्र अधों के लिए हैं। प्रश्न मत करो, उनका अनुगमन करो। ऐसा लगता है बीजेपी सांसद नाना पटोले से मान्यवर मोदी जी कह रहे हैं। अखबारों ने इसकी रिपोटिंग की है। जब तत्सत पांडे कार से फैजाबाद की यात्रा कर रहे थे, तब उन्होंने देखा था ‘राम जी के धनुष पर किसी आभूषण विक्रेता का विज्ञापन लगा हुआ था’। मार्केट+ धर्म+ विज्ञापन+ राजनीतिक =अद्भुत राजनीति। समाज में इन चारों के गठजोड़ की जो संरचना पैदा हुई थी, दूधनाथ ने अपनी प्रतिभा से उसे बहुत पहले देख लिया था और उनका आखिरी कलाम संभवतः उसी राजनीति का साहित्यिक रूपक है। फैजाबाद के लिए जो तत्सत पांडे की यात्रा है. उस रास्ते में जिस तरह के अवरोध खड़े किए गए हैं. वह भी अभूतपूर्व है। उसका वर्णन भी अभूतपूर्व है। कुछ लोगों के लिए वह वर्णन समानुपातिक नहीं है, उबाऊ है। लेकिन दूधनाथ का उद्देश्य उसे अनुपात में रखने का है ही नहीं। अनुपात में रखना साहित्यिक दृष्टि है। लेखक उस वर्णन को यथार्थ के अनुकूल प्रभाव पैदा करना चाहता था। इसका महत्व तब पता चलता है जब केजरीवाल की सरकार और पुडुचेरी की सरकार को ना चलने देने के लिए अद्भुत बाधाएं और अवरोध पैदा करती केंद्र की ताकतवर सरकार के कारनामों को हम पूर्वाग्रह मुक्त होकर देख ले। कह अनुपातहीन अतिरिक्त सा लगता वर्णन राजनीतिक व्यवहार में अतिरिक्त ग्रोथ की साहित्यिक अभिव्यक्ति है।
आचार्य जी को उतारकर लिटाया। वह लगातार बीच-बीच में बड़बड़ रहे थे। वह नींद में बर्राने जैसा था। इतने सारे प्रेत। इतने सारे बधिक। पूरी अयोध्या इनसे भरी पड़ी है। आचार्य जी ने अपना एक हाथ ऊपर उठाया और जोर-जोर से बड़बड़ाना शुरू किया। सारी संरचनाएं ढहती है सर्वात्मन। थोड़ी देर बाद आचार्य जी ने कहा, ना जाने कब और किधर से उतरे और देश के गांव, कस्बों शहरों, घरों, गलियों, सड़कों, बगीचों, बस्तियों, जंगलों नदियों और पूरे वातावरण में बिखर कर गुम हो गए। और फिलहाल अब रात थी।
यह किताब एक राजनीतिक छल को राजनीतिक अवचेतन में बदलती दिखती है। अगर इससे लड़ा नहीं गया तो अंततः तैयार रहें एक वृद्ध, बंजर, अपाहिज और दैत्याकार किताब से लड़ने के लिए, सदा तैयार रहे अपनी जीवित मृत्यु से बचने के लिए। अपनी अंतरमेधा को मथो। यह किताब जनता की अपेक्षा सत्ता पार्टी और ताकत के पक्ष में खुदगर्ज होकर खोखला बनाती सोच और भाषा का सामना करने का आख्यान रचती है।
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापक रहे हैं)

One Comment
बहुत ही दमदार लेख। इस लेख के लिए साधुवाद।