असम भाजपा का हैट्रिक का दावा !

हकीकत कम, फसाना ज्यादा

अनिल तिवारी

असम विधानसभा चुनाव में मतदान की तारीख जैसे-जैसे करीब आ रही है राजनीतिक दलों की गतिविधियां तो तेज हो ही गई है बयानों में तल्ख़ियां भी बढ़ती जा रही है। भारतीय जनता पार्टी और उसके अलबेले मुख्यमंत्री राज्य में तीसरी बार चुनाव जीतने का दावा कर रहे हैं वही प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस मजबूत गठबंधन के सहारे राज्य की सत्ता पलटने के लिए ताबड़तोड़ बैठकों और सघन संपर्क अभियान चला रही है। राज्य में कांग्रेस गठबंधन से अलग होकर 18 सीटों पर चुनाव लड़ रहे झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रमुख आदिवासी इलाकों को साधने में लगे हैं। एआइएमआइएम के नेता ओवैसी भी अपने हिसाब से मुस्लिम मतदाताओं का मिजाज पहचानने में मशगूल हैं।
गुवाहाटी की जलकुबरी सीट से चुनाव लड़ रहे राज्य के मुख्यमंत्री हर हाल में अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। वही इस सीट से कांग्रेस प्रत्याशी का नामांकन खारिज होने के बाद कांग्रेस ने गठबंधन के प्रत्याशी को समर्थन देते हुए दावा किया है की जलकुबरी विधानसभा का परिणाम चौंकाने वाला होगा और यहां अमेठी की पुनरावृत्ति होगी।
असम चुनाव के ठीक पहले कांग्रेस सहित 6 विपक्षी दलों ने मिलकर जो गठबंधन तैयार किया है वह रणनीतिक तौर पर प्रथम दृष्टि या मजबूत दिखता है हालांकि इसकी परीक्षा राज्य के अलग-अलग सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों के बीच ही होनी है। कांग्रेसनीत गठबंधन सामाजिक समीकरणों को अपने पक्ष में करने के लिए प्रयासरत है। वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव के आंकड़े कांग्रेस के लिए उम्मीद तो हैं लेकिन लगे हाथ चुनौतियों का भी संकेत देते हैं। पिछले चुनाव में असम जातीय परिषद और रेजर दल ने अलग चुनाव लड़कर करीब 5.5 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। इस बार इन दोनों दलों का गठबंधन में शामिल होना कांग्रेस के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकता है। जमीनी दौरा करने वाले राजनीतिक जानकारों की भी राय यही है।
क्षेत्रीय आंकड़ों पर गौर करें तो तस्वीर कुछ और अधिक स्पष्ट होती है। पिछले चुनाव में ऊपरी असम की 28 सीटों में से भाजपा और उसके सहयोगियों ने 23 सीट पर जीत दर्ज की थी वहीं कांग्रेस गठबंधन को केवल तीन सीटों पर ही जीत मिली थी। पिछले चुनाव में यह क्षेत्र भाजपा का मजबूत गढ़ बनकर उभरा था। इसके ठीक उलट निचले असम में कांग्रेस और सहयोगियों का प्रदर्शन बेहतर रहा था जहां उसने 43 में से 25 सीटें जीत कर अपने नाम की थी।
अच्छा विपक्षी दलों के गठबंधन से इस बार ऊपरी असम के क्षेत्र में भी कांग्रेस की उम्मीद बढ़ी है। इस क्षेत्र में अहोम समुदाय का प्रभाव है और गठबंधन के तीन प्रमुख नेता गौरव गोगोई, अखिल गोगोई और लुरिन ज्योति गोगोई इसी समुदाय से आते हैं। इन नेताओं के धुआंधार सघन संपर्क के कारण कांग्रेस को सामाजिक आधार मजबूत करने में मदद मिल रही है और मतदाता सीधे जुड़ रहे हैं। निचले असम में कांग्रेस पारंपरिक रूप से हमेशा मजबूत रही है खासकर मुस्लिम बहुल इलाकों में। इस क्षेत्र से कांग्रेस पार्टी को इस बार भी निर्णायक जीत मिलने की संभावना अधिक है लेकिन भाजपा इस क्षेत्र में ध्रुवीकरण की राजनीति के जरिए हमेशा से चुनौती प्रस्तुत करती रही है। राज्य के मुख्यमंत्री द्वारा कांग्रेसी नेताओं के खिलाफ मानहानि का मुकदमा करने, धर्म, भाषा रहन-सहन पर अलग-अलग बोल बोलने से ध्रुवीकरण की प्रक्रिया इन क्षेत्रों में तेज होने लगी है। कांग्रेस के नेतृत्व में गठबंधन अपनी बढ़त बनाए रखने के लिए इन क्षेत्रों में सामाजिक संतुलन को अपने पाले में बनाए रखने के लिए इस बार एड़ी चोटी का जोर लगा रहा है। मालूम हो कि इस बार के चुनाव में बराक घाटी भी अहम भूमिका निभाएगी। यहां बंगाली भाषी हिंदू और मुस्लिम मतदाता चुनावी नतीजों को प्रभावित करते हैं। नागरिकता संशोधन अधिनियम जैसे मुद्दे यहां पहले भी असर डाल चुके हैं। कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे को किसी न किसी तरह इस बार भी जिलाए रखने की नीति पर चल रही है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि विकास का मुद्दा एक तरफा बीजेपी की तरफ जाता दिखाई दे रहा है। पिछले 10 वर्षों में सड़कों फूलों और बुनियादी ढांचे में सुधारने खासकर के ग्रामीण क्षेत्रों में सकारात्मक प्रभाव डाला है। कांग्रेस शासन में जिन योजनाओं को शुरू किया गया था उसका भी आधिकारिक लाभ भाजपा को मिल रहा है। चाय बागान के श्रमिकों को पत्ता पर भूमि देने का फैसला भी भाजपा के लिए एक बड़े चुनावी हथियार के रूप में सामने आया है। देश के प्रधानमंत्री और भाजपा के स्टार प्रचारक द्वारा चाय बागान में काम करने वाली श्रमिक महिलाओं के साथ खड़े होकर सेल्फी खिंचवाना तथा खुद को चाय वाला कहकर उनके अपने होने का एहसास करना सोने में सुगंध का काम कर सकता है। कांग्रेस की राज्य इकाई ने इसका अंदेशा भी जताया हैं।
एक पेंच झारखंड मुक्ति मोर्चा का भी है। राज्य की आदिवासी बहुल 18 सीटों पर चुनाव लड़ रहे झामुमो कांग्रेस और भाजपा दोनों का खेल बिगाड़ सकता है। झामुमो अगर वोटो का ठीक-ठाक बटवारा कर ले जाता है तो दोनों बड़े दलों के समीकरण अच्छे खासे ढंग से प्रभावित हो सकते हैं।
राज्य की कुल 126 सीटों में से कांग्रेस सीट बंटवारे के तहत 100 सीटों पर चुनाव लड़ रही है जबकि बाकी सिम सहयोगी दलों को दी गई है। कांग्रेस के तीन उम्मीदवारों का नामांकन पत्र खारिज हो चुका है। बावजूद कांग्रेस पार्टी राज्य में प्रमुख भूमिका में है। कांग्रेस पार्टी के सभी बड़े नेताओं की नजर असम के चुनाव पर लगी है और वह लगातार हाथ पैर मार रहे हैं। असम की जमीनी राजनीति को समझने वाले यह संकेत दे रहे हैं कि अगर गठबंधन के सभी दल मिलजुल कर सामूहिक प्रयास से मतदाताओं को मत केदो तक पहुंचने में सक्षम होते हैं तो निश्चित ही कुछ उलट फेर की संभावना बढ़ती है। सबका साथ सबका विकास का नारा देते हुए अपने कोर मुद्दों को आगे कर कांग्रेस छोड़ भाजपा में आए राज्य के अलबेले मुख्यमंत्री जीत की हैट्रिक का दावा कर रहे हैं।

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