बाजार ने बदल दिया गुरुओं का स्वरूप
अनिल तिवारी
गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़े खोट। अंदर हाथ सहार दे, बाहर-बाहर चोट।
आज शिक्षक दिवस है। हमारे देश में हर साल 5 सितंबर का दिन गुरुओं को समर्पित है। मां-बाप के बाद जीवन को सबसे अधिक प्रभावित करने वाला गुरु ही होता है। गुरु का दर्जा गोविंद (भगवान) से भी ऊपर बताया गया है। गुरु शिष्य को गढ़ता है। शिष्य की मेधा को पहचान कर उसमें चमक पैदा करता है। गुरु शिष्य को कामयाब बनाने के लिए हर संभव जतन करता है, जरूरत के मुताबिक ठोक पीट कर रास्ते पर लाता है और शिष्य की कामयाबी पर आत्मा से प्रसन्न होता है।
आज की शिक्षा व्यवस्था और तथाकथित गुरुओं का ढकोसला संत कबीर के इस शाश्वत सत्य—“गुरु कुम्हार है और शिष्य घड़ा है। गुरु ही हैं जो भीतर से हाथ का सहारा देकर, बाहर से चोट मार-मारकर और गढ़-गढ़ कर शिष्य की बुराई को निकालते हैं।”—की सरेआम धज्जियां उड़ा रहा है।आज का तथाकथित ‘गुरु’ कुम्हार नहीं, बल्कि एक डरपोक व्यापारी बन चुका है, जो ग्राहक (शिष्य/अभिभावक) के टूट जाने या नाराज हो जाने के खौफ से उसे भीतर से सहारा देना तो दूर, बाहर से हल्की सी खरोंच तक नहीं मारना चाहता! कबीर ने स्पष्ट कहा था कि कुम्हार बाहर से प्रहार करता है ताकि घड़े का कच्चापन और खोट निकल जाए, लेकिन भीतर से हाथ का मजबूत सहारा भी रखता है ताकि घड़ा बिखर न जाए। आज की शिक्षा में ‘सहार’ तो बचा नहीं, और ‘चोट’ मारने की रीढ़ इन सौदागरों में खत्म हो चुकी है। हर गलती पर पर्दा डाला जा रहा है, पीठ थपथपाई जा रही है और बच्चों को नाजों में पालकर उनके भविष्य का कबाड़ा किया जा रहा है।
यह कैसी विडंबना है कि आज अनुशासन के नाम पर डरता हुआ समाज, बच्चों को हर आलोचना से बचाने की बीमारी से ग्रस्त है। क्या बिना कड़े प्रहार के सोना कुंदन बनता है? आज के शिक्षण संस्थान ज्ञान के मंदिर नहीं, बल्कि डिग्रियां बांटने वाली फैक्ट्रियां हैं, जहाँ सच बोलने की, गलती पर फटकार लगाने की और छात्र के अहंकार को चूर-चूर कर उसे एक बेहतर इंसान बनाने की हिम्मत किसी शिक्षक में नहीं बची है।
गुरु केवल किताबी ज्ञान नहीं देता। गुरु जीने की बेहतर कला सिखाता है। हर परिस्थिति का सामना करने के लिए विश्वास पैदा करता है। जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। साहस के साथ नेतृत्व का गुण विकसित करता है। अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान का प्रकाश देता है। गुरु अपने समर्पण से एक अबोध बच्चे को बहादुर नागरिक में तब्दील कर देता है।
हमारी खुद की स्मृति में (स्वर्गीय रमाकांत पांडे और स्वर्गीय राम लखन कुंवर) दो ऐसे अध्यापक रहे हैं जिन्होंने हजारों विद्यार्थियों को ठोक पीट कर जीवन में कामयाब बनाया। दोनों का स्वभाव नारियल की तरह था, ऊपर से बिलकुल सख्त लेकिन नीचे से अत्यंत मुलायम। इन दोनों अध्यापकों का विद्यार्थियों में खौफ रहता था, लेकिन अभिभावकों का इन पर आला दर्जे का भरोसा था। मैं कह सकता हूं कि यह दोनों अध्यापक कबीर के कथन को सत प्रतिशत चरितार्थ करते थे।
अब ऐसे अध्यापक खोजने से भी नहीं मिलते। जमाना बदल गया है। शिक्षा पूरी तरह से बाजार के हवाले हो चुकी है। शिक्षालयों का हर काम मुनाफे को ध्यान में रखकर हो रहा है।
समाज में शिक्षा की प्राथमिकता के पैमाने भी बदल गए हैं। शिक्षा खाना पूर्ति से अधिक चापलूसी तक पहुंच चुकी है। जब तक शिक्षा के नाम पर यह चापलूसी बंद नहीं होगी और उस ‘अंदरूनी स्नेह’ के साथ ‘बाहरी कड़े प्रहार’ का संतुलन वापस नहीं आएगा, तब तक समाज में सिर्फ कमजोर, भ्रमित और दिशाहीन ‘कच्चे घड़े’ ही पैदा होते रहेंगे जो ज़रा सा दबाव पड़ते ही चकनाचूर हो जाएंगे।
