गौरी तिवारी
दीन, दुःखी, निर्बलों, विकलों की आस,
गोकुल के ग्वाले, तुम कहाँ हो?
अधरों पर रखकर मौन मुरली,
मुरलीधर क्यों आज खड़े तुम मौन उदास हो?
धरती के झंझावातों से थककर क्या तुम गोलोक चले गए हो?
कहो कन्हैया, क्या गोलोक में उत्सव मन रहा है?
क्या उत्सव के शोर में बाढ़ पीड़ितों का आवाहन तुम तक नहीं पहुंच रहा?
या वहां सिर्फ पूंजीपतियों का ही स्वागत हो रहा?
आज बरस रही है घनघोर घटा
बर्बाद हो रही हैं फसलें, हो रहे हैं लोग बेघर
तुमने पर्वत उठाकर तब गोकुल की रक्षा की थी
इंद्र के प्रहारों से जनता की रक्षा की थी
अब नहीं कोई अहंकार में उन्मत इंद्र है
पर शेष वह अभिमान बाज़ार और व्यवस्था की ताकत में है
हे गोवर्धनधारी, कृषकों बेघरों की पीड़ा का भार उठाओ
अपनी संतानों की निराश आंखों में आशा की लौ जलाओ
जनता का धन सत्ताधारियों की जेब में जा रहा
तानाशाही के विरुद्ध जाने पर उनपर अत्याचार हो रहा
तुमने कंस के अत्याचार का अंत किया,
मथुरा के भयभीत जनों को
भयमुक्त जीवन दिया
एक बार फिर कंस सत्ताधारी पूंजीपतियों का रूप लिए आया लौट
हे कृष्ण एक बार फिर तुम भी लौटो
हे पार्थसारथी, लौटो,
युवाओं का रथ थामो,
कर्म का महत्व बताकर विद्यार्थियों को पथ दिखाओ
प्रतिभाशाली के लिए अवसर के द्वार खोलो
निराशा मनो में विश्वास के स्वर घोलो।
