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प्रिंट ने दी गद्य को शक्ति

गौरी तिवारी

 

भाषा को बोलचाल के दायरे से बाहर निकालकर स्थायित्व देने, ज्ञान को संचित करने और उसे जन-जन तक पहुँचाने का श्रेय मुद्रण कला (प्रिंट) को जाता है।भारत जैसे बहुभाषी देश में, जहाँ ‘कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर बानी’ की कहावत चरितार्थ होती है, मुद्रण कला का आगमन एक युगांतकारी घटना थी। प्रिंट तकनीक ने न केवल भारतीय भाषाओं को एक नया जीवन दिया, बल्कि ज्ञान के लोकतांत्रीकरण, राष्ट्रीय चेतना के उदय और सामाजिक सुधार आंदोलनों में रीढ़ की हड्डी का काम किया। लिपि के मानकीकरण से लेकर आधुनिक साहित्य के सृजन तक, प्रिंट और भारतीय भाषाओं का संबंध बेहद गहरा और ऐतिहासिक रहा है।
भारत में मुद्रण कला का इतिहास लगभग साढ़े चार सौ साल पुराना है। भारत में प्रिंटिंग प्रेस लाने का श्रेय पुर्तगाली मिशनरियों को जाता है। उन्होंने 1556 में गोवा में पहला प्रिंटिंग प्रेस स्थापित किया। इसका मुख्य उद्देश्य ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार करना था। शुरुआती दौर में लैटिन और पुर्तगाली भाषाओं में किताबें छपीं। लेकिन जल्द ही मिशनरियों को यह समझ आ गया कि भारतीय जनमानस तक पहुँचने के लिए स्थानीय भाषाओं को अपनाना अनिवार्य है। इसके बाद कोंकणी, तमिल, मलयालम और कन्नड़ जैसी दक्षिण भारतीय भाषाओं में धार्मिक ग्रंथों का अनुवाद और छपाई शुरू हुई। 1578 में तमिल भाषा में छपी पहली किताब ‘तम्बिरान वणक्कम’ को भारतीय भाषाओं में मुद्रण की शुरुआत माना जा सकता है।
अठारहवीं सदी के अंत और उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में उत्तर भारत और पूर्वी भारत में प्रिंट का वास्तविक विस्तार हुआ। पश्चिम बंगाल का श्रीरामपुर (सेरामपुर) मिशन इस क्रांति का केंद्र बना। विलियम केरी के नेतृत्व में भारतीय कारीगर पंचानन कर्माकार के तकनीकी सहयोग से बंगाली, हिंदी, संस्कृत, उड़िया, असमिया और मराठी जैसी कई भाषाओं के लिए सुंदर और स्पष्ट ‘मूवेबल टाइप्स’ (धातु के अक्षर) तैयार किए गए। श्रीरामपुर प्रेस ने न केवल बाइबिल का भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया, बल्कि रामायण, महाभारत और अन्य प्राचीन ग्रंथों को भी छापा। इसने भारतीय भाषाओं को एक नया व्याकरणिक ढांचा और स्थिरता प्रदान की।
प्रिंट तकनीक के आने से भारतीय भाषाओं के स्वरूप और समाज में व्यापक बदलाव आए,(क) लिपियों का मानकीकरण संभव हुआ। (ख) ज्ञान का लोकतांत्रिकरण हुआ।
प्रिंट के आने से पहले पुस्तकें हस्तलिखित (पांडुलिपियां) होती थीं। हर लेखक की लिखावट और शैली अलग होती थी, जिससे शब्दों के स्वरूप में भिन्नता आ जाती थी। प्रिंटिंग प्रेस के आने के बाद अक्षरों के सांचे (फांट) बने। इससे देवनागरी, बंगाली, गुरुमुखी, तमिल आदि लिपियों का मानकीकरण हुआ। शब्दों की वर्तनी में एकरूपता आई, जिससे भाषा को पढ़ना और समझना अधिक सुगम हो गया।
इसी प्रकार ज्ञान का लोकतांत्रीकरण और शिक्षा का प्रसार आधिकारिक लोगों के बीच होने लगा। प्रिंट के आने के पहले ज्ञान पर कुछ गिने-चुने विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों का नियंत्रण था क्योंकि हस्तलिखित पुस्तकें बहुत महंगी और दुर्लभ होती थीं। प्रिंट ने पुस्तकों को सस्ता और सुलभ बना दिया। आम जनता के लिए अपनी भाषा में इतिहास, विज्ञान, भूगोल और साहित्य पढ़ना संभव हुआ। इसके कारण भारत में आधुनिक शिक्षा प्रणाली की नींव मजबूत हुई।
उल्लेखनीय है कि मुद्रण के अस्तित्व में आने से पहले भारतीय भाषाओं का अधिकांश साहित्य पद्य (कविता) के रूप में था। प्रिंटिंग प्रेस के आने के बाद समाचार पत्र, पत्रिकाएं, निबंध और उपन्यासों की मांग बढ़ी। विचारों की अभिव्यक्ति के लिए तार्किक और स्पष्ट भाषा की आवश्यकता थी, जिसने आधुनिक गद्य को जन्म दिया। हिंदी में भारतेंदु हरिश्चंद्र और महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे विचारकों ने प्रिंट के माध्यम से ही हिंदी गद्य को परिष्कृत किया।
गौरवपूर्ण है कि भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों ने देश की आजादी की लड़ाई में बारूद का काम किया। राजा राममोहन राय से लेकर महात्मा गांधी तक, हर बड़े नेता ने प्रिंट को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया।
प्रिंट की सुविधा उपलब्ध होने के बाद भाषाई पत्रकारिता को नए पंख लगे। हिंदी का पहला समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ (1826) पंडित जुगल किशोर शुक्ल के संपादन में कलकत्ता से निकला। इसके बाद बंगाली में ‘संवाद कौमुदी’, उर्दू में ‘जाम-ए-जहाँ नुमा’ और गुजराती में ‘मुंबई समाचार’ (जो आज भी जीवित है) जैसे पत्रों ने जन्म लिया। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बाल गंगाधर तिलक ने मराठी में ‘केसरी’, महात्मा गांधी ने ‘नवजीवन’ और ‘हरिजन’ के माध्यम से देशवासियों को जगाया। इन अखबारों ने क्षेत्रीय भाषाओं को राजनीतिक और सामाजिक विमर्श की भाषा बना दिया।भारतीय भाषाई प्रेस का प्रभाव इतना तीव्र था कि ब्रिटिश सरकार डर गई और उसने इन अखबारों को दबाने के लिए ‘वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट’ लागू किया। यह इस बात का प्रमाण था कि प्रिंट और स्थानीय भाषाएं मिलकर कितनी बड़ी ताकत बन चुकी थीं।
वर्ष 1947 में स्वतंत्रता मिलने के बाद माना जा रहा था कि अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ेगा, लेकिन भारतीय भाषाओं के प्रिंट मीडिया ने एक अभूतपूर्व उछाल देखा। जैसे-जैसे देश में साक्षरता बढ़ी, ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में अपनी भाषा में समाचार पढ़ने की ललक बढ़ी। दैनिक आज, जागरण, दैनिक भास्कर, आनंदबाजार पत्रिका, मलयला मनोरमा जैसे भाषाई अखबार प्रसार के मामले में दुनिया के सबसे बड़े अखबारों की सूची में शामिल हो गए। इसके साथ-साथ साहित्यिक पत्रिकाओं की पाठक संख्या भी बढ़ने लगी। हिंदी में ‘धर्मयुग’, ‘दिनमान’, ‘कादम्बिनी’, और अन्य भाषाओं में भी ऐसी ही पत्रिकाओं ने आम जनता में पढ़ने की संस्कृति को विकसित किया। हाल के वर्षों में एक के बाद एक की श्रृंखला में अनेक पत्रिकाओं का प्रकाशन विभिन्न कारणों से बंद हुआ तो लोगों में फिक्र भी बढ़ी। लेकिन फक्र की बात है की तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद अभी भी अनेक भाषाई पत्रिकाएं अपनी ठसक के साथ निरंतर प्रकाशित हो रही हैं तथा पाठकों के बीच पहुंच रहे हैं। अत्यंत सीमित संसाधन के साथ एक दूसरे के सहयोग से 20 साल पहले प्रारंभ हुई पत्रिका ‘कलरव’ तमाम आर्थिक झंझावातों को झेलते हुए भी अनवरत अपने पथ को तक पहुंच रही है।इसने क्षेत्रीय लेखकों, कवियों और विचारकों को एक बड़ा मंच दिया।
चुनौतियाँ
21वीं सदी में इंटरनेट, स्मार्टफोन और डिजिटल मीडिया के आगमन ने प्रिंट मीडिया के सामने एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। पश्चिमी देशों में कई बड़े अखबार बंद हो चुके हैं या पूरी तरह डिजिटल हो गए हैं। लेकिन भारत में स्थिति थोड़ी अलग और दिलचस्प है।यद्यपि कागज की बढ़ती कीमतों और डिजिटल स्क्रीन के बढ़ते चलन से प्रिंट पर दबाव है, लेकिन भारतीय भाषाई प्रिंट मीडिया ने खुद को समय के साथ ढाला है। आज हर बड़ा भाषाई अखबार प्रिंट संस्करण के साथ-साथ ई-पेपर, मोबाइल ऐप और वेबसाइट के रूप में उपलब्ध है। कलरव पत्रिका भी अपने पाठकों के लिए “kalrav.org”नामक वेबसाइट पर उपलब्ध है।
दुनिया भर में पढ़ने पढ़ाने के तरीकों में हो रहे बदलाव के बीच आज भी भारत के कस्बों और गांवों में और प्राय घरों में सुबह की चाय के साथ हाथ में अखबार लेने की परंपरा टूटी नहीं है। डिजिटल मीडिया पर ‘फर्जी खबरों’ के दौर में, प्रिंट को आज भी सबसे अधिक विश्वसनीय स्रोत माना जाता है।
कुल मिलाकर मुद्रण कला और भारतीय भाषाओं का अंतर्संबंध केवल तकनीक और अक्षरों का मिलन नहीं है, बल्कि यह भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक पुनर्जागरण की कहानी है। प्रिंट ने भारतीय भाषाओं को लुप्त होने से बचाया, उन्हें एक वैज्ञानिक स्वरूप दिया और औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ एक मजबूत ढाल बनाया।आज भले ही माध्यम बदल रहे हैं और कागज की जगह स्क्रीन ले रही है, लेकिन प्रिंट तकनीक ने भारतीय भाषाओं को जो सुदृढ़ आधारशिला, व्याकरणिक शुद्धता और गद्य की शक्ति दी है, उसी के बल पर आज हमारी भाषाएं डिजिटल स्पेस में भी सीना ताने खड़ी हैं। प्रिंट का इतिहास वास्तव में भारतीय भाषाओं के सशक्तिकरण और देश की प्रगति का इतिहास है।

 

(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज में हिंदी विशेष तृतीय वर्ष की छात्रा हैं)

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