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धूमिल हुए सपने

गौरी तिवारी

 

कभी-कभी बरसात प्रेम, शांति तथा सकारात्मकता की जगह काले बादलों की नकारात्मकता और उदासी लेकर आती है। उस दिन भी शाम का समय था, सूरज अस्त होने की ओर बढ़ चला था। कहते हैं क्वार के बादल गरजते हैं बरसते नहीं, शायद इसलिए ही निर्बलों का उपहास करते एक अहंकारी, शोषणकर्ता तथा अत्याचारी व्यक्ति के अट्टहास की भांति मेघ गरजने लगे मानो कुछ ही क्षणों में घनघोर घटा बरसेगी और सबकी आशाओं को कुचल उनका नामोनिशान मिटा देगी जैसे बारिश की बूंदे धूल को भिगोकर उन्हें गायब कर देती हैं। पर ठहरिए, मेघों की इस गर्जना से भयभीत होकर भी वर्षा नहीं हुई, न ही पानी की बूंदे बादलों का अपना घर छोड़ धरती पर आयी। उस दिन आकाश से पानी की बूंदे नहीं अपितु शिक्षा और कामयाबी की अभिलाषा लेकर आये विद्यार्थियों के सपने, उनकी उमंग तथा उनका भविष्य, एक 5 मंजिला इमारत के रूप में ढह गया। कभी-कभी जैसे बरसात के पहले बादल गड़गड़ाहट करते हैं , वैसे ही एक बहुत ज़ोर से गड़गड़ाहट की ध्वनि सुनाई दी लेकिन यह गड़गड़ाहट बादलों के गरजने की नहीं अपितु चंद मिनटों में एक इमारत के ढह जाने की थी। अगले ही पल जिस तरह बरसात में बादलों को छोड़ पानी की बूंदे धरती से आ मिलती हैं ठीक वैसे ही बादलों को छूती इमारत ढह कर धरती की मिट्टी में मिल, मलबा बन जाती है और अपना अस्तित्व इस प्रकार खो देती है जैसे कभी थी ही नहीं। इस गिरने के क्रम में तुरंत नहीं आई वर्षा, पहले आई छीटों की फुहार जिसे हर किसी ने सामान्य मानकर नजरअंदाज कर दिया और उसके बाद जब आयी घनघोर वर्षा तो लोगों को अपनी सुरक्षा के लिए खरीदने पड़े कुटिल व्यापारियों द्वारा अधिक पैसों में बेचे गए तिरपाल, खरीदने पड़े महंगे गारंटी वाले पेवन लगे छाते पर वह भी काम नहीं आये और हवा की रफ्तार में उनके छाते उड़ गए और पानी की बौछार से फट गए उनके कभी न खराब होने वाले तिरपाल। अचंभे की बात यह है कि वो व्यापारी नहीं थे अपने छतों और तिरपालों की शरण में, उन्होंने अपने बेचे सामान से कमा लिया था काफी मुनाफा और बना लिया इस तूफान से बचने के लिए कहीं बहुत दूर एक आलीशान वाटरप्रूफ घर। भयंकर गर्जना के साथ आया यह तूफान कुछ ही मिनटों में हो गया इतना शांत मानो धरती पर जीवन ही न बचा हो, समाप्त हो गया हो सबका अस्तित्व। फिर उस मौन सन्नाटे को चीरती हुई सुनाई दी भविष्य के अफसरों, डॉक्टरों, इंजीनियरों की चीखें और मच गया एक बार फिर कोहराम। आसपास के संवेदनशील लोगों ने सहायता की उन मासूमों की, फोन किया जनता की सहायता करने वाली पुलिस, एम्बुलेंस और सरकारी अफसरों की टीम को लेकिन अपने स्वभाव के अनुसार सब आराम से पहुंचे, आकर उन्होंने रोती, घबराई, बिलखती जनता को उस इमारत के मलबे से 20 फीट दूर खड़े होकर देखा और घटना का मुआयना किया। लेकिन जब तक वो सबको बचा पाते उनमें से छोटे-बड़े कई सपने लेकर आये लोग अपनी आँखों में असंख्य अधूरी अभिलाषाएं लेकर इस संसार से चले गए।

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