Sunday , 18 October 2026
साहित्य

स्त्री

वह भोली थी जब तक गलतियां माफ करती गई

वह बुरी हो गई जब स्वाभिमानी बन गई

वह अच्छी थी जब तक सब सहती गई

वह बदतमीज हो गई जब अपने हक के लिए बोल गई

वह संस्कारी थी जब तक दूसरों के लिए जीती गई

वह बिगड़ गई जब खुद के लिए जीना सीख गई

वह सही थी जब तक चार दिवारी में कैद रहती गई

वह गलत हो गई जब अपने सपने पूरे करने सारे पिंजरे तोड़ गई

वह सीता थी जब तक अग्नि परीक्षा देती गई

वह कलंक हो गई जब अपने आत्म सम्मान के लिए सबके विरुद्ध चली गई

वह वरदान थी जब तक देवी स्वरूपा नवरात्र में पूजी गई

वह अभिशाप हो गई जब बेटी रूप में घर में पैदा हो गई

वह इज्जत थी जब तक पर्दे को स्वीकारती गई

वह तिरस्कार हो गई जब उसी पर्दे पर सवाल कर गई

वह राजकुमारी थी जब तक शालीनता के बंधन में जीती गई

वह रजिया देशद्रोही हो गई जब राज्य बचाने सिंहासन पर बैठ गई

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