गौरी तिवारी
पशुओं पर दोष मढ़कर
मानव बचता आया है,
अपने मन का हर अँधियारा
उनके सिर पर थोपता आया है।
गधा बना आलस्य का प्रतीक,
बैल कहा गया जड़ बुद्धि,
लोमड़ियों पर छल का आरोप,
बताई भेड़िए की क्रूर प्रवृति।
किन्तु कभी क्या किसी पशु ने
लाभ हेतु संबंध गढ़े?
मीठे वचनों की चादर ओढ़े
पीठ पीछे विष जड़े?
गधा कहकर जिसको जग ने
मूर्खता का नाम दिया,
उसने श्रम को कर्म मान
अपने जीवन में थाम लिया।
धूप जले या बरसे सावन,
नित्य उठाए भारी भार,
मौन साधकर कर्म करता,
नहीं करे अधिकार की पुकार।
बैल हल से जीवन बोता,
करता धरती का श्रृंगार
स्वेद की बूंदों से अन्न उगाकर
जग का प्रत्येक उदर भरता।
सिंह न करता व्यर्थ हिंसा,
भूख मिटे तो लौट भी जाए
गिद्ध मृत देह का भक्षण करके
प्रकृति का संतुलन निभाए।
सर्प कभी करता न पहले आघात,
व्यर्थ न देता प्राण-दंड
केवल भय या आत्मरक्षा में
उठता उसका विषमय फण।
किन्तु इधर दो पैरों वाला
कैसा अद्भुत प्राणी है
मुख पर मीठी बातें जिसके,
मन में सिर्फ धूर्तता है
तृप्ति जिसे स्वीकार नहीं
धरती, जल, आकाश निगलकर
कहता, “अब भी पर्याप्त नहीं।”
मुख पर मधु की मधुर परत है,
अंतर विष का अथाह सागर
करुणा का अभिनय करता है,
रखता मन में द्वेष अपार है।
पशु न धर्म के नाम लड़ें,
न जाति-भेद की ज्वाला दें;
मानव ही सीमाएँ खींचे,
मानव ही फिर रक्त बहाए।
मन में उठते प्रश्न अनेक,
श्रेष्ठ किसे स्वीकार करें?
मौन खड़े उन जीवों को या
चुने छल के शिखर पर चढ़े नर अनेक?
पशु होना अपमान नहीं है,
सरल हृदय का दोष नहीं
सबसे बड़ा पतन वही है,
जब मानव में मानवता न रहे।
