गौरी तिवारी
वह ऐसा न था,
उसका मन निर्मल निर्झर था,
वह निष्कपट और निर्भय था
पर छल की धूल निरन्तर पड़ती रही,
निर्मल निर्झर भी धीरे-धीरे दूषित हो गया।
वह ऐसा न था,
दर्पण-सा उज्ज्वल उसका अन्तःकरण
न था उसमें कपट, न कोई आवरण
किन्तु प्रपंचों की धुँध जब छाने लगी,
उसकी असली छवि धूमिल होती गई।
वह ऐसा न था,
सबको अपना मानता था
हर पीड़ा स्वयं सहता था
पर जिनके लिए दीपक बन जलता रहा
वही उसकी लौ बुझाते रहे।
वह ऐसा न था,
विश्वास ही उसकी आशा थी
स्नेह ही उसका स्वभाव था
किन्तु प्रत्येक विश्वास जब टूटता गया
हृदय का प्रत्येक द्वार बंद होता गया।
वह ऐसा न था,
शब्दों में मधुरता, दृष्टि में करुणा
आचरण में केवल सरलता थी
पर कटु अनुभवों की अग्नि ने
उसकी वाणी में ज्वाला भर दिया।
वह ऐसा न था,
घृणा का अर्थ भी न जानता
क्षमा को ही अपनी शक्ति मानता
किन्तु बार-बार घायल होकर
उसने मौन को अपना शस्त्र बना लिया।
जो देखता वह कहता है,
“देखो, कितना बदल गया है!”
पर कौन बताए उन्हें
पत्थर जन्म से कठोर नहीं होता
अनगिनत चोटों का इतिहास
उसे शिला बनाता है।
किसी पर राय बनाने से पूर्व
उसके घावों और भावों की भाषा पढ़ लेना
क्योंकि कई बार
दोष व्यक्ति का नहीं होता,
दूसरों के व्यक्तित्व और व्यवहार का होता है।
