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दलों की बैसाखी बनने से जेन अल्फा का इनकार

अनिल तिवारी

 

 

15 अगस्त, 1947 को मिली आज़ादी से अब तक भारत की चार पीढ़ियाँ तैयार हो गयी हैं। पहली पीढ़ी शारीरिक रूप से जर्जर और बूढ़ी हो चुकी है। दूसरी वृद्धावस्था की देहरी पर दस्तक देने वाली है। तीसरी अधेड़ हो चुकी है। चौथी किशोरावस्था पारकर जवानी का चौखट लांघने की दहलीज पर है। आज की भाषा में इस चौथी पीढ़ी को जेन जी से संबोधित किया जा रहा है। उल्लास की बात है इसके आगे की पांचवीं पीढ़ी पूर्व की सभी पीढ़ियों से अलग हटकर अत्यंत गतिशील और उत्साहित है। इस पांचवीं पीढ़ी को जेन अल्फा की संज्ञा दी जा रही है। यह पीढ़ी 21वीं सदी के पहले दशक की उन्नत पौध है। इसके हाथ में संचार के अति आधुनिक औजार है। चुटकी बजाकर हथेली पर सरसों उगाने की तमन्ना लिए या पीढ़ी पलक झपकते सब कुछ हासिल कर लेने की फितरत से लैस है। इनमें समर्पण की इंतहा है। यह पीढ़ी जिसे भी चाहती है टूट कर चाहती है और मुंह मोड़ने पर आ जाए तो मां-बाप की भी नहीं सुनती। किसी भी सूरते हाल में यह किसी की बैसाखी बनने को कतई तैयार नहीं है। इसका फंडा पानी की तरह बिल्कुल साफ है। अंदर बाहर सब कुछ स्पष्ट है। छिपाव और दुराव इसके शब्दकोश में नहीं है। उसे यह जानने का हक़ है कि राष्ट्रीय आन्दोलन को जिन उपादानों से बल और सम्बल मिला, उसमें उसका क्या योगदान है, उसका स्थान कहाँ है और उसके अतीत का मूल्यांकन किस स्तर पर हुआ है? नयी पीढ़ी को आज तक यह नहीं बताया गया कि 1848 ई० में छात्र दादाभाई नौरोजी और माण्डेक ने ‘दि स्टूडेण्ट्स लिटरेरी एण्ड साइण्टिफिक सोसाइटी’ की स्थापना कर भारत के छात्रों के प्राथमिक संगठन को जन्म दिया था। 1874 ई० में आनन्दमोहन बोस ने ‘कलकत्ता स्टूडेण्ट्स एसोसिएशन’ की स्थापना कर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के साथ भारतीय छात्र आन्दोलन की आधारशिला रखी थी। इन्हीं छात्र नेता-द्वय ने 1876 ई० में ‘इण्डियन एसोसिएशन’ का गठन कर इण्डियन (भारतीय) शब्द से ही अपने राष्ट्रवादी स्वरूप को प्रथमतः उजागर करके भारत के युवकों का विशाल संगठन खड़ा किया था। 1874 ई० में छात्र संगठन बना और उसके कहीं 11 वर्षों बाद ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की स्थापना हुई, जिसमें इन छात्र-युवा नेताओं का राष्ट्रस्तरीय युवा संगठन शामिल हुआ। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना करनेवाले ए० ओ० ह्यूम ने राष्ट्रीय संगठन बनाने के प्रयास में कलकत्ता यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएटों के नाम पत्र प्रकाशित कर अपील की कि ‘यदि आपमें से 50 समर्पित शिक्षित छात्र मिल जायँ तो राष्ट्रीय स्तर पर संगठन कायम किया जा सकता है।’

भारत के छात्रों को यह जानने का अधिकार है कि 1900 ई० में भारत में छात्र संगठनों के गठन की प्रक्रिया जोर-शोर के साथ प्रारम्भ हो गयी थी। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के प्रथम बंग-भंग और स्वदेशी आन्दोलन 1905 का सूत्रपात कलकत्ता के ‘ईडेन हिन्दू कालेज’ के छात्रों ने प्रथम जुलूस निकाल कर किया था। वही बंग-भंग आन्दोलन 1857 ई० के महासंग्राम के बाद भारतीय स्वतन्त्रता-संघर्ष का आधार-आन्दोलन था। स्वतन्त्रता आन्दोलन के प्रारम्भिक जुझारू नेता-लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, विपिनचन्द्र पाल, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और एनी बेसेण्ट आदि ने स्कूल-कॉलेजों के छात्रों के माध्यम से ही जनशक्ति को उभारने का काम किया था, जिसके फलस्वरूप भारत में जन आन्दोलनों और क्रान्तिकारी संघर्षों की शुरुआत हुई।

1920 ई० में मोहनदास करमचन्द गाँधी ने राष्ट्रीय आन्दोलन की कमान सँभालते ही भारत के छात्रों से पढ़ाई छोड़कर असहयोग आन्दोलन में शामिल होने का आह्वान किया था। जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचन्द्र बोस के सम्पूर्ण ध्यान केन्द्र छात्र ही थे और वे ही उनके संघर्ष की शक्ति थे। जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया आदि तत्कालीन युवा समाजवादी नेताओं के समर्थक, रक्षक और आन्दोलन-विस्तारक छात्र ही थे। तब आन्दोलन का लक्ष्य धुँधला स्वराज्य था, जिसकी व्याख्या स्पष्ट न थी। 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन में छात्रों ने जेलें भर दी थीं। कॉलेज के विद्यार्थी और स्कूली बच्चे पुलिस की लारियों के भीतर घुस जाते थे और बाहर निकलने से इन्कार कर देते थे। छात्रों और पुरा छात्र-युवकों ने 1930-31 के साल को आश्चर्यजनक परिस्थितियों और स्फूर्तिदायक घटनाओं से भर दिया था। क्रान्तिकारी युवकों की शहादतों और राष्ट्रव्यापी छात्र आन्दोलन ने सारे राष्ट्र में स्फूर्ति और उत्साह का संचार करने की अद्भुत शक्ति दिखा दी थी।

1942 का भारत छोड़ो आन्दोलन पूर्ण रूप से भारतीय छात्रों और युवकों के नेतृत्व में चला। राष्ट्रीय नेताओं तथा प्रान्त और जिला-स्तर के नेताओं की गिरफ्तारी होते ही भारत के एक-एक प्रान्त, शहर, कस्बों और गाँवों में छात्रों और युवकों ने आन्दोलन की कमान सँभाल ली थी। बम्बई से शुरू होकर दिल्ली, इलाहाबाद, कानपुर, पटना और तमाम स्थानों पर छात्रों के जुलूसों पर गोलियाँ चलीं, बनारस यूनिवर्सिटी में सेना का प्रवेश हुआ। अहिंसा पर आधारित आन्दोलन के स्वरूप को बदलकर वे हजारों छात्र अपने प्रदेशों में फैल गये और ‘अगस्त-आन्दोलन’ ने जन विद्रोह का रूप धारण कर लिया। छात्रों के नेतृत्व में चला यही अन्तिम आन्दोलन था, जो ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत की आखिरी कील बना। आज भी भारत के सभी राजनीतिक दलों के नेताओं की बैसाखी छात्र और युवक ही हैं।

वर्ष 1900 ई० से 1947 ई० के दौर के तमाम अग्रणी छात्र आज़ादी के बाद देश और प्रदेशों के राजनेता बने। सत्ता और विपक्ष में रहकर उन्होंने अपनी बहुविध सेवाओं द्वारा भारतीय समाज और राजनीति का मार्गदर्शन किया। उनमें से तमाम अपनी व्यक्तिगत परिस्थितियों के कारण या स्वातन्त्र्य-उद्देश्य के पूरा होने के कारण अथवा स्वातन्त्र्योत्तर-काल की बदली परिस्थितियों में अपना समुचित स्थान न देख; राजनीति से अलग हो गये। कुछ ऐसे भी थे जो सत्ता-तन्त्र की जोड़-तोड़ में अपनी सपाटबयानी और कार्यपद्धति में बदलाव न ला पाने के कारण राजनीति की धारा से अलग होने को मज़बूर कर दिये गये।

आज़ादी मिले 79 वर्ष बीत गये। किसी देश के इतिहास में 79 वर्ष का समय कोई छोटा काल खण्ड नहीं होता। इन दशकों में देश के छात्रों के सामने धुंध-सी छायी है। अपनी दिशा और मञ्जिल को लेकर उनके मनों में असमञ्जस है। परिवार, समाज, देश, राष्ट्रीयता सब-कुछ सन्दिग्ध स्थिति में हैं। संस्कृति, सभ्यता, राजनीति, अर्थव्यवस्था और चरित्र कुछ-न-कुछ अंशों तक खण्डित हैं। व्यक्तिगत, दलीय और संकुचित जातीय भावनाएँ, भ्रष्टाचार और स्वार्थपरता अनेक रूपों में सबके सामने उजागर हैं। सामूहिक मन, सामूहिक सोच और दायित्व-बोध शंकाग्रस्त हैं। सामाजिक न्याय के नाम पर समाज में जाति को ही प्रतिष्ठित किया जा रहा है। भूमण्डलीकरण के रूप में आर्थिक विकास का लबादा ओढ़े आर्थिक साम्राज्यवाद अग्रसर है।

भारतीय समाज की वर्तमान स्थिति देश की युवा शक्ति को तरह-तरह की चुनौती दे रही है। एक ओर साम्प्रदायिकता, अलगाववाद, आतंकवाद, शोषण, गरीबी, भुखमरी, बेरोज़गारी, महँगाई, निरक्षरता, उद्देश्यहीन शिक्षा आदि के रोग से जन-जीवन ग्रस्त-संत्रस्त है और दूसरी ओर वह बाज़ारवाद तथा पश्चिमी संस्कृति के घटाघोप से आशंकित है। समाज-व्यवस्था एक ज्वालामुखी के मुख पर बैठी आनन्द मना रही है और करोड़ों शिक्षित-अशिक्षित नौजवान एक ख़तरनाक दरार के कगार पर खड़े हैं। दो संस्कृतियों की टकराहट हो रही है। शानदार अतीत धूमिल पड़ रहा है, वर्तमान दिग्भ्रान्त है और भविष्य अनजाने-अनचाहे का संकेत दे रहा है।

“यह नाउम्मेदी, यह बेयक़ीनी, यक़ीनो-उम्मीद की झलक है।इन्हीं अँधेरों को पार करके, यक़ीन की रोशनी मिलेगी।”

परीक्षा प्रणाली में धांधली पर सरकार की जवाबदेही को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी के आह्वान पर देशभर में छात्र आंदोलन हुए हैं। छात्र और राजनीति के विषय पर इन दोनों फिर से बहस-विमर्श जीवित हो उठे हैं है। 1920 ई० में जब गांधी जी ने छात्रों को शिक्षण संस्थाएँ छोड़कर भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में कूद पड़ने का आह्वान किया था, तब यह बहस राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार मुखर हुई थी। महामना मदनमोहन मालवीय और रवीन्द्रनाथ टैगोर-जैसे महान् चिन्तकों की राय थी कि छात्र पूरी तरह पढ़-लिखकर, परिपक्व नागरिक के रूप में भारतीय राजनीति में उतरें। जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस से लेकर जयप्रकाश नारायण तक ने स्वतन्त्रता संग्राम में सब-कुछ न्योछावर करने के लिए छात्रों की पुकार की थी और कहा था कि बिना युवक-शक्ति के शामिल हुए कोई भी क्रान्ति सफल हो ही नहीं सकती। तत्कालीन भारत के लाखों छात्रों ने अपने को स्वतन्त्रता की यज्ञवेदी में झोंक दिया था और भारतीय राजनीति के अँधेरे को शमा जलाकर रौशन किया था। स्वतन्त्रता प्राप्त होते ही छात्रों से साफ़ शब्दों में कहा गया कि उनका रोल समाप्त हो गया है, अब वे अपने परिसरों में वापस चले जाएं और अनुशासन में रहें।

इतिहास का शाश्वत सत्य है कि सारी दुनिया में राष्ट्रवाद, आदर्श समाज-संरचना और नवजागरण आन्दोलन का जन्म और विकास बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा ही किया गया है। स्वातन्त्र्योत्तर काल में सामाजिक क्रान्ति को देश-काल की स्थिति के अनुसार ढालने के अति महत्त्वपूर्ण दाायित्व से भारत के करोड़ों छात्रों को विलग कर दिया गया, परिणामतः उनके प्रेरणा-स्रोत सूख गये। जिस छात्र समुदाय ने भारत की स्वतन्त्रता के लिए अपना सब-कुछ होम कर दिया था, आज उसी के उत्तराधिकारी विस्थापित मानसिक दशा में अपनी ज़िन्दगी के चौराहे पर खड़े होकर तय नहीं कर पा रहे हैं कि उनका गन्तव्य किस दिशा में है। जिस छात्र-जमात ने सारे युग पर अपना प्रभाव डाला था, उससे यह अपेक्षा अवश्य की जा रही है कि वह यदि राजनीति में रहे तो राजनेताओं द्वारा इच्छित दल-विशेष की बैसाखी बनकर रहे, न कि सामाजिक क्रान्ति का संवाहक बनकर। ऐसे में एक सवाल खड़ा होता है कि भारत की तरुणाई अपनी अदम्य इच्छा शक्ति के द्वारा इतिहास-क्रम को नया मोड़ देकर एक नये भारत की संरचना कर सकती है?

आजादी के बाद भारत के राजनीतिक दलों ने छात्रों के संगठन बनाए। छात्र हित के लिए ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन, स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ़ इंडिया, एनएसयूआई, समाजवादी युवजन सभा, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसे अनेक संगठन अस्तित्व में आए। उल्लेखनीय तथ्य है कि जनसंघ के कोख से उपजी भारतीय जनता पार्टी के छात्र संगठन एबीवीपी का उदय जनसंघ के गठन के पूर्व ही हो चुका था। वर्तमान में एबीवीपी का दायरा और विस्तार सर्वाधिक है। लेकिन ताजुब की बात है शिक्षा और परीक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर देश स्तर पर फैले हालिया छात्र आंदोलन से यह संगठन वैसे ही नदारत रहा जैसे गधे के सिर से सिंग।

पूर्व के आंदोलनों की तुलना में लगभग डेढ़ महीने तक चला यह छात्र आंदोलन हल्के बल प्रयोग, छिटपुट झड़पों , कुछ प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी के अलावा लगभग शांतिपूर्ण ही रहा। जंतर मंतर पर वाम दलों के छात्र संगठन अंत तक जुटे रहे। शिक्षा परीक्षा में जवाबदेही को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में एनएसयूआई के कार्यकर्ता पहले से ही धरना प्रदर्शन जुलूस निकालते रहे। आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी सहित तमाम सामाजिक संगठनों ने भी जंतर मंतर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। लेकिन छात्रों का सबसे बड़ा संगठन होने का दावा करने वाला अखिल विद्यार्थी परिषद अंत तक उदासीन ही रहा। इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर एबीवीपी के समर्पित पदाधिकारी छात्रों की भावनाओं को समझ कर सही समय पर मोर्चा संभालते तो इसकी भी नौबत नहीं आती।

दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारतीय छात्र-समाज के सामने पहले की तरह नायकत्व का एक भी कीर्ति स्तम्भ मौजूद नहीं है-जो उनके दिल में उल्लास भर कर जीवन को भव्य बनाये, लक्ष्य को प्राप्त करने की प्रेरणा प्रदान करे और राष्ट्रीय स्तर पर उनका मार्गदर्शन करके उन्हें अपने साथ लेकर चले। लेकिन हमें भरोसा रखना चाहिए यह स्थिति हमेशा नहीं रहेगी। शानदार अतीत की प्रेरणादायक घटनाएँ, शिक्षाएँ, दिशाएँ और बलिदानी स्मृतियाँ उसके साथ हैं। इन परिस्थितियों में भारत के छात्रों को ऐसा पथिक बनना होगा जो हर सफ़र को अपनी मञ्जिल और हर मञ्जिल को अपना सफ़र समझे। उसे सीढ़ियों और सहारों की आवश्यकता न रहे, वह फिर से जान और मान ले कि छात्र किसी मनुष्य का नहीं वरन् इंकलाब का नाम है। एक प्रसिद्ध लोक नारा है “संघर्षों के साए में इतिहास हमारा पलता है ,जिस ओर जवानी चलती है उसे और जमाना चलता है”। अंत में डॉक्टर वीरमाल की प्रसिद्ध कविता के कुछ अंश

“भूगोल बने, इतिहास जगे, ऐसा कुछ परिवर्तन कर दो, रत्नों का फिर वरदान मिले, सागर का वह मन्थन कर दो, ऐ तरुण देश के यों महको, घर-आँगन को चन्दन कर दो।”

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