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काव्य कोना

मोबाइल : मित्र अथवा शत्रु ?

गौरी तिवारी

 

ज्ञान का दीप लिए जब विज्ञान का युग आया,
मानव ने अपनी प्रतिभा से नव इतिहास रचाया
अनंत क्षितिज की हर दूरी को पल में लांघा,
हथेली पर ही जैसे संपूर्ण जग ले आया।

पर्वत, सागर, देश, दिशाएँ, सब सीमाएँ हार जाएं,
बिछड़े साथी एक स्पर्श से फिर से मिल जाएं।
विद्या के विस्तृत प्रांगण का खुला सहज प्रत्येक द्वार,
जिज्ञासा को मिल गया जैसे अनेक दीपों का संसार।

विपदा में यह संबल बनकर आशा का आलोक जगाये,
शोध, चिकित्सा, उद्योगों के नव पथ प्रतिदिन आगे बढ़ाए
यदि संयम के साथ चले तो जीवन का उपकार बने,
मानव के परिश्रम और बुद्धि का अनुपम यह पुरस्कार बने।

पर जब साधन बन बैठा स्वामी, बन गया मानव दास
असत्य समाचारों की आँधी और अफवाहों के वेग से,
खोयी संवेदना, डगमगाया विवेक और मन हुआ उदास
बच्चों तक का बचपन स्क्रीनों में कैद हुआ
प्रकृति का सौंदर्य, मिट्टी की खुशबू, सबसे वह दूर हुआ

दोष न इसका, दोष हमारा, यदि संयम को भूल चलें,
दीपक से घर भी जगमग हो, दीपक से ही हाथ भी जले।
यंत्र सदा सेवक ही शोभता, स्वामी बने तो उचित नहीं,
विवेक-विहीन प्रगति कभी भी मानवता के लिए हित नहीं।

मोबाइल यदि बने सहायक, ज्ञान-पथ का सारथि,
तो यह युग का श्रेष्ठ साधन, प्रगति-पथ का पथिक।
यदि वह बन जाए स्वामी, हर क्षण पर जिसका हो अधिकार,
तब जीवन का स्वछंद गगन भी लगने लगे कारागार।

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