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कैसे रोशन हो यतीम बच्चों की जिन्दगी

मनोज कुमार अग्रवाल

दुनिया भर में अनाथ बच्चों की तादाद लगभग 14 करोड़ से अधिक हो गई है। इन यतीम बच्चों में से युद्ध, सशस्त्र संघर्ष और प्राकृतिक आपदाओं की वजह से प्रभावित हुए बच्चे शामिल हैं , क्योंकि कई वैश्विक संगठन युद्ध और आपदाओं से पीड़ित अनाथों को कुल आंकड़ों का एक बड़ा हिस्सा मानते हैं। दुनिया भर के लगभग 14 करोड़ से अधिक यह अनाथ बच्चे वह हैं जिनके माता या पिता दोनों में से किसी एक या दोनों का साया किसी भी कारण से सिर पर नहीं हैं। संयुक्त राष्टं और विभिन्न रिपोर्ट्स के अनुसार, दुनिया के संघर्ष-प्रभावित क्षेत्रों में करोड़ों बच्चे रहते हैं। अकेले युद्ध या आपदाओं के कारण संकट झेलने वाले और माता-पिता को खोने वाले बच्चों का आंकड़ा 14 करोड़ के आसपास है। एशिया में लगभग 6.1 करोड़ अफ्रीका में लगभग 5.2 करोड़ लैटिन अमेरिका और कैरिबियन में लगभग 1 करोड़ पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया में लगभग 73 लाख है।

आपको बता दें कि भारत में अनाथ बच्चों का संकट भी भयावह है। संयुक्त राष्टं बाल कोष  (यूनिसेफ) के अनुसार, भारत में 29.6 मिलियन से अधिक बच्चे सड़कों पर जीवन यापन कर रहे हैं। अनाथालय परित्यक्त बच्चों से भरे पड़े हैं और लाखों बच्चे सड़कों पर भटकते हुए किसी तरह अपना जीवन यापन कर रहे हैं। भारत में अनुमानित रूप से लगभग 2.5 से 3 करोड़ अनाथ और बेसहारा बच्चे हैं। इन बच्चों के अनाथ होने और परिवारों से बिछड़ने के मुख्य कारणों में अत्यधिक गरीबी, माता-पिता की असामयिक मृत्यु गंभीर बीमारियां या महामारी, घरेलू कलह, माता-पिता का अलगाव तलाक और बच्चों को लावारिस छोड़ देना शामिल है।मुख्य वजहेंगंभीर गरीबीरू संसाधनों की कमी और आर्थिक तंगी के कारण कई परिवार बच्चों का पालन-पोषण करने में असमर्थ हो जाते हैं। एचआईवी-एड्स, कोविड-19 जैसी महामारियों और अन्य घातक बीमारियों के कारण कम उम्र में माता-पिता का निधन। वहीं सामाजिक दबाव, अनचाही संतान या गरीबी के चलते कई नवजात शिशुओं को सड़कों या कचरे के डिब्बों में छोड़ दिया जाता है। घरेलू हिंसा, माता-पिता का तलाक या आपसी विवाद के कारण भी बच्चे अनाथ जीवन भोगने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

दुनिया भर में लाखों बच्चे संघर्ष, जलवायु परिवर्तन, विस्थापन और गरीबी के विनाशकारी प्रभावों को झेलते हैं, जिससे उन्हें उज्ज्वल भविष्य के लिए बुनियादी अधिकारों और अवसरों से वंचित होना पड़ता है।

यूनिसेफ के मुताबिक, दुनिया के लगभग एक चैथाई बच्चे संघर्ष या आपदाग्रस्त देशों में रहते हैं। माता-पिता को खोने वाले बच्चे की दुर्दशा केवल एक दिन तक सीमित नहीं रह सकती, लेकिन जब युद्ध आम बात हो जाती है, तो उत्पीड़ितों की पीड़ा पीछे छूट जातीहै। यूनिसेफ के अनुसार, अनाथ वह बच्चा है जिसकी आयु 18 वर्ष से कम है और जिसने अपने एक या दोनों माता-पिता को खो दिया है। युद्ध जैसी दुखद घटनाओं में अपने माता-पिता को खोने वाले बच्चों को अक्सर किसी जीवित परिवार के सदस्य के साथ रहना पड़ता है या उन्हें पालन-पोषण प्रणाली में जाना पड़ता है, जहां उन्हें कुपोषण और बीमारी जैसी खराब रहने की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। वे जिस भावनात्मक और मानसिक तनाव का अनुभव करते हैं, वह उन्हें बहुत परेशान करता है। यूनिसेफ के मुताबिक, वर्तमान में 46 करोड़ से अधिक बच्चे सूडान, यूक्रेन, म्यांमार, फिलिस्तीन जैसे देशों में संघर्ष क्षेत्रों में रह रहे हैं या वहां से भाग रहे हैं। इन बच्चों को न केवल शारीरिक खतरों का सामना करना पड़ता है, बल्कि अपने परिवारों को खोने के भावनात्मक आघात का भी सामना करना पड़ता है। यूनिसेफ की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 14 करोड़ से अधिक बच्चे अनाथ हैं, जिनमें से 5.2 करोड़अफ्रीका में, एक करोड़ कैरिबियन और लैटिन अमेरिका में, 6.1 करोड़ एशिया में और 73 लाख मध्य एशिया और पूर्वी यूरोप में हैं। ज्यादातर अनाथ बच्चे अपने दादा-दादी या परिवार के किसी दूसरे सदस्य के साथ रहते हैं।

इन कमजोर बच्चों को और अधिक नुकसान से बचाने की तत्काल जरूरत है, खासकर इसलिए क्योंकि उनमें से कई जलवायु परिवर्तन से गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्रों में रहते हैं। हर साल छह जनवरी को अन्तरराष्टंीय स्तर पर विश्व युद्ध अनाथ दिवस पर उनके जीवन को फिर से बनाने में मदद करने और यह सुनिश्चित करने के लिए वैश्विक समर्थन का आववान किया जाता है कि उन्हें वह देखभाल और अधिकार मिलें जिसके वे हकदार हैं। 95 प्रतिशत मामलों में सभी अनाथ बच्चे पांच साल से अधिक उम्र के होते हैं। अमीर देशों में अनाथों की संख्या कम है, लेकिन युद्ध या गंभीर बीमारियों से प्रभावित क्षेत्रों में यह संख्या बहुत अधिक है।

यूनिसेफ के अनुसार, युद्ध, प्राकृतिक आपदा, गरीबी, बीमारी, सामाजिक कलंक और चिकित्सा संबंधी जरूरतों के कारण प्रतिदिन लगभग 5700 बच्चे अनाथ हो जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 2017 में 5 वर्ष से कम आयु के 15,000 बच्चों की प्रतिदिन मृत्यु हुई यानी हर 17 सेकंड में 1 बच्चे की मृत्यु। जीवन के पहले महीने में ही प्रतिवर्ष 27 लाख बच्चों की मृत्यु हो जाती है। अफ्रीका में हर 15 सेकंड में एक और बच्चा एड्स के कारण अनाथ हो जाता है। रिपोर्ट के अनुसार 60 फीसद अनाथ लड़कियाँ यौन व्यापार का शिकार हो जाएँगी। 10-15 फीसद अनाथ बच्चे 18 वर्ष की आयु से पहले आत्महत्या कर लेंगे। पूर्वी यूरोप में 70 फीसद अनाथ लड़के अपराधी बन जाएँगे।

विश्वसनीय आंकड़े मिलना मुश्किल है, यहां तक कि स्रोतों में भी अक्सर केवल अनुमान ही दिए जाते हैं, और बेघर बच्चों को शायद ही कभी शामिल किया जाता है। लेकिन अगर ये आंकड़े दुगुने भी बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए हों, तब भी यह एक असहनीय त्रासदी है कि हर साल दस लाख से अधिक बच्चे अनाथ हो जाते हैंय और हर साल 70 लाख बच्चे अनाथ ही बड़े होते हैं, जिनका कोई अपना नहीं होता और न ही कोई घर होता है। ये जोखिम में पड़े बच्चे हैं जो पूरी तरह से असुरक्षित, जरूरतमंद और आमतौर पर दुनिया में उम्मीद से परे होते हैं। आपको बता दें कि हर साल 250,000 बच्चों को गोद लिया जाता है, लेकिन 14,050,000 अनाथ बच्चे बिना किसी प्यार भरे परिवार का हिस्सा बने ही अनाथालय से बाहर हो जाते हैं। इसका मतलब है कि हर दिन 38,493 बच्चे अनाथालय से बाहर हो जाते हैं। भारत सरकार अनाथ और बेसहारा बच्चों के लिए मिशन वात्सल्य और पीएम केयर्स फॉर चिल्ड्रन जैसी कई प्रमुख योजनाएं चला रही है। इसके तहत बच्चों को हर महीने आर्थिक मदद, मुफ्त शिक्षा, स्वास्थ्य बीमा और 18 से 23 वर्ष की आयु होने पर बड़ा वित्तीय फंड दिया जाता है। पीएम केयर्स फॉर चिल्ड्रन योजना कोविड-19 या अन्य कारणों से माता-पिता को खोने वाले बच्चों के लिए है। इसमें 18 साल की उम्र पर 10 लाख रुपये का फंड और 23 साल होने पर आर्थिक सहायता मिलती है। आयुष्मान भारत में बच्चों को 5 लाख रुपये तक का मुफ्त स्वास्थ्य बीमा कार्ड दिया जाताहै। मिशन वात्सल्य बच्चों की देखभाल और सुरक्षा के लिए है। इसके जरिए पात्र बच्चों को 4,000 रुपये प्रति माह की आर्थिक मदद दी जाती है।

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