अशोक त्रिपाठी
नेपाल में तिब्बत से आई महाविनाशकारी बाढ़ की विभीषिका का सही आकलन अब तक नहीं हो पाया है लेकिन प्रकृति के साथ हमने जो छेड़छाड़ की है, उसका नतीजा बहुत गंभीर नजर आ रहा है। नेपाल से सटे उत्तराखण्ड में भी तबाही की आशंकाएं जतायी जा रही हैं। एक शोध पत्र के अनुसार उत्तराखण्ड में 219 ग्लैशियर बहुत ही नाजुक हालत में हैं और इनके फटने से जो विनाशलीला हो सकती है, उसकी कल्पना से ही रूह कांप जाती है।
उत्तराखंड के अलकनंदा बेसिन में क्लाइमेट चेंज की वजह से खड़ी ढलानों पर 219 ग्लेशियर बहुत ही नाजुक हालत में टिके हुए हैं। नेचुरल हेजार्ड जर्नल में अप्रैल 2026 में छपे एक शोध पत्र “बेसिन स्केल इन्वेंटरी एण्ड एक्सपोजर एसेसमेंट आफ हैंगिंग ग्लैशियर्स, सेन्ट्रल हिमालय” में ये खुलासा हुआ है। इस ग्लोबल स्टडी में चेतावनी दी गई है कि इस इलाके में तापमान ग्लोबल औसत से ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है, जिससे अचानक बर्फ के टूटने का खतरा है।
इस शोध पत्र में छपे वैज्ञानिक तथ्यों के मुताबिक, तेजी से बढ़ती गर्मी और जलवायु में बदलाव के कारण हिमालय के ग्लेशियरों में अस्थिरता बढ़ रही है। इस अस्थिरता के कारण खड़ी ढलानों पर हैंगिंग लेशियर (टूटने के कगार पर) बन गए हैं, जिनसे बर्फ के टूटने और नीचे के इलाकों पर गंभीर असर पड़ने का बड़ा खतरा रहता है। हालांकि आल्पस में इन ग्लेशियरों का बड़े पैमाने पर अध्ययन किया गया है, लेकिन हिमालय में बेसिन स्तर पर इनका आकलन अभी भी सीमित है।
इस शोध पत्र में गढ़वाल हिमालय के अलकनंदा बेसिन में हैंगिंग ग्लेशियरों की एक विस्तृत लिस्ट पेश की गई है। इसमें गढ़वाल हिमालय के अलकनंदा बेसिन में ग्लैब टाप-2 मॉडल का उपयोग करके कुल 219 हैंगिंग ग्लेशियरों की पहचान की गई है, जो 71.7 प्लस-माइनस 3.5 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैले हैं और जिनका अनुमानित आईस वाल्यूम् 2.39 प्लस-माइनस 0. 42 घन किमी. है। इसमें 0.74 प्लस-माइनस 0.14 घन किमी. हैंगिंग आईस मास शामिल है। यानी इसका लगभग एक-तिहाई हिस्सा अस्थिर है। मीडिया से विस्तृत बातचीत में इस शोधपत्र के लेखक और आईआईटी भुवनेश्वर में असिस्टेंट प्रोफेसर आशिम सत्तार ने कहा, क्लाइमेट चेंज का हिमालय क्षेत्र के एक बड़े हिस्से पर काफी असर पड़ रहा है। हमने अपनी स्टडी में कहा है कि उत्तराखंड में 219 हैंगिंग ग्लेशियर (लटकते हुए ग्लेशियर) बन गए हैं। यह उत्तराखंड में लटकते हुए ग्लेशियरों की पहली इन्वेंट्री में से एक है। जाहिर है, शोध पत्र में छपे इन नतीजों के बाद उत्तराखंड में पिघलते ग्लेशियर की निगरानी बढ़ाने और बढ़ते जोखिम को ध्यान में रखकर आपदा प्रबंधन की व्यावहारिक योजना बनाना बेहद जरूरी हो गया है।
