किसी व्यक्ति के अस्तित्व के पहचान की यात्रा या उसके जीवन की कथा वहीं से आरम्भ होती है जहां से उसका संघर्ष शुरू होता है। जब परिस्थितियाँ उसके संकल्प की परीक्षा लेने लगती हैं, जब अनगिनत बाधाओं के बीच भी उसकी आँखों में स्वप्न जीवित रहते हैं और जब मंजिल की ओर बढ़ते उसके कदम समय के प्रतिकूल प्रवाह से टकराते हैं, तब उसके जीवन की वास्तविक यात्रा प्रारंभ होती है। जीवन की सार्थकता सिर्फ सफलता के शिखरों पर पहुँचने में नहीं, बल्कि उन कठिन रास्तों पर चलने के साहस में भी निहित है जिनकी यात्रा का अंत अनिश्चित होता है। परंतु विडंबना यह है कि संसार प्रायः मंजिल तक पहुँचने वालों का अभिनंदन करता है, किंतु उन पथिकों के संघर्ष को विस्मृत कर देता है, जो अपनी समस्त निष्ठा और प्रयास के बावजूद लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पाते। क्या किसी प्रयास का मूल्य सिर्फ उसकी सफलता से निर्धारित किया जाना चाहिए? हिंदी के जनकवि नागार्जुन की कविता ‘उनको प्रणाम’ ऐसे ही सफलता और महानता से परे असफल, उपेक्षित और विज्ञापन से दूर लोगों के महत्व को जो मानवता के विकास के लिए सबसे जरूरी हैं, स्थापित करती है।
‘हज़ार हज़ार बाहों वाली’ काव्य संग्रह में संकलित यह कविता इतिहास के उन नायकों को समर्पित है जिन्होंने युगांतकारी कार्य किए लेकिन उनमें से अधिकांश असफल और मृत्यु को प्राप्त हुए। सन् 1980 के दशक में निम्न वर्गीय को महत्व देते हुए ‘हिस्ट्री फ्रॉम बिलो’ का नारा दिया गया जिसमें दलित, आदिवासी, स्त्री, मजदूर, और किसान के संघर्ष को समझने और स्थापित करने की कोशिश की गई। यह कविता उसी की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है। कविता के कवि नागार्जुन समाज में स्थापित सफलता और नायकत्व के प्रतिमानों को तोड़ते हुए भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु और गणेश शंकर विद्यार्थी और ऐसे ही बहुत सारे अनाम स्वाधीनता सेनानियों को प्रणाम करते हैं जो भारत को स्वतंत्र होते नहीं देख पाए। वे उन स्वाधीनता सेनानियों को प्रणाम करते हैं जो स्वतंत्र भारत को देखकर स्वयं को धन्य महसूस नहीं कर पाये, उनको भी जिनका बंधी जीवन ने अंत कर दिया और उनको भी जिनके मनोरथ प्रतिकूल परिस्थितियों ने चूर-चूर कर दिए।
कविता में प्रयुक्त युद्ध, समुद्र-यात्रा और पर्वतारोहण के बिंब संघर्ष की विविध परिस्थितियों को मूर्त रूप प्रदान करते हैं। युद्धभूमि में जिन वीरों के तरकश लक्ष्य प्राप्त होने से पहले ही खाली हो जाते हैं, समुद्र पार करने के लिए निकले जिन यात्रियों की आकांक्षाएँ अधूरी रह जाती हैं और ऊँचे शिखरों की ओर बढ़ने वाले जिन पर्वतारोहियों को प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण लौटना पड़ता है, वे सभी जीवन-संघर्ष के अलग-अलग रूपों के प्रतिनिधि हैं। इन बिंबों के माध्यम से कवि स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य की पराजय के पीछे सदैव उसकी अक्षमता ही नहीं होती, कभी-कभी परिस्थितियाँ भी उसके मार्ग में ऐसी बाधाएँ उपस्थित कर देती हैं, जिन पर उसका नियंत्रण नहीं होता। इसलिए किसी व्यक्ति के संघर्ष का मूल्यांकन करते समय उसके परिणाम के साथ-साथ उसकी परिस्थितियों और प्रयत्नों को समझना भी आवश्यक है। नागार्जुन की इस कविता की संवेदना सिर्फ व्यक्तिगत असफलता तक सीमित नहीं रहती, अपितु वह उस सामाजिक व्यवस्था की ओर भी संकेत करती है, जिसमें सम्मान प्रायः उपलब्धियों, पदों और प्रतिष्ठा के आधार पर वितरित होता है। जिन लोगों के प्रयत्न सफल हो जाते हैं, उनके नाम इतिहास में दर्ज हो जाते हैं किंतु अनेक ऐसे व्यक्ति भी होते हैं, जिनका समर्पण किसी परिणाम में परिवर्तित नहीं हो पाता। उनके संघर्ष की स्मृति भी धीरे-धीरे धुँधली पड़ जाती है। नागार्जुन इसी विस्मृति के विरुद्ध अपनी कविता के माध्यम से एक नैतिक हस्तक्षेप करते हैं, वे उन लोगों को स्मरणीय बनाते हैं, जिन्हें समाज ने भुला दिया है।
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