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जनता की ताकत (कहानी)

गौरी तिवारी

 

कनकपुर राज्य का पूरे देश में बोलबाला था। अक्सर अन्य राज्यों में कनकपुर और वहाँ के राजा की चर्चा होती, कभी कनकपुर के अद्भुत महल की, कभी वहाँ के राजा की कूटनीति की, कभी महल में आयोजित उत्सवों की, कभी दूसरे राज्यों के साथ होने वाली संधियों की, तो कभी उसकी विशाल सेना और शक्तिशाली शासन-व्यवस्था की। खास बात यह थी कि राजा के होते हुए भी वहां जनता का शासन था, राजा का चुनाव आम जनता स्वयं करती थी। कनकपुर की समृद्धि के किस्से दूर-दूर तक फैले हुए थे। महल की दीवारों पर सोने की परत चढ़ी थी, उद्यानों में दुर्लभ प्रजातियों के पुष्प खिलते थे और राजसभा में देश-विदेश से आए विद्वानों, कलाकारों तथा राजदूतों का जमावड़ा लगा रहता था। राजा की बुद्धिमत्ता और राजनीतिक कुशलता के चर्चे इतने आम थे कि दूसरे राज्यों के शासक उससे मैत्री स्थापित करने को उत्सुक रहते थे। राजा की प्रशंसा में दरबारी कवि प्रतिदिन नई-नई रचनाएँ करते और मंत्री उसकी दूरदर्शिता के किस्से सुनाते। एक दिन महल में उत्सव के दौरान 5-6 किसानों का एक समूह जो पेवन लगे मालिन वस्त्रों में था दरबार में आता है, उनके पचके हुए गाल और आंखों के नीचे के काले गड्ढे कई दिनों से भोजन न मिलने की गवाही दे रहे थे। वे सभी राजा से गुहार लगाते हुए कहते हैं कि कृषकों, वृद्धों और महिलाओं के लिए जो आर्थिक सहयोग की योजना लागू की गयी थी अभी तक वह आर्थिक सहायता गांव के किसी व्यक्ति को नहीं मिली। इस वर्ष सूखा पड़ने के कारण फसल भी अच्छी नहीं हुई और घर में जो पैसे थे वो कर के लिए दे दिए, अब अनाज खरीदने के लिए भी पैसे नहीं हैं।

इसपर राजा कहते हैं-
“आप सभी चिंता मत कीजिए, हमारी तरफ से सभी आवेदकों को आर्थिक सहायता प्रदान कर दी गयी है। हो सकता है किसी प्रशासनिक प्रक्रिया के कारण धनराशि आप तक न पहुंची हो।”
“लेकिन महाराज योजना लागू किए लगभग 5 माह हो गए लेकिन अभी तक एक माह की भी धनराशि प्राप्त नहीं हुई।”

महल में आयोजित उत्सव की गरिमा बचाते हुए कनकपुर के राजा किसानों के कुछ और बोलने से पहले ही उन्हें सैनिकों द्वारा महल से बाहर निकलवा देते हैं। राजा तथा प्रशासन से हताश निराश किसानों को वापस अपने घर लौटना पड़ता है। उसी शाम उन्हीं में से एक किसान अपने परिवार का पालन पोषण करने में असमर्थ होने के कारण आत्महत्या का प्रयास करने पर मजबूर हो जाता है। आरंभ में जो परेशानी सिर्फ कुछ किसानों और मजदूरों की थी, कनकपुरवासियों के एकत्रित होकर अपनी परेशानियों पर चर्चा करने पर वह विद्यार्थियों, फिर व्यापारियों, शिक्षकों और उन कर्मचारियों जो वर्षों से भ्रष्ट व्यवस्था के कारण परेशान हैं की भी समस्याएं जैसे विद्यालय का बढ़ता शुल्क घटते रोजगार के अवसर, आदि, उभर कर आयी। लोगों ने महसूस किया कि उनकी समस्याएँ अलग-अलग दिखाई अवश्य देती हैं, किंतु उनकी जड़ एक ही है, ऐसी शासन-व्यवस्था, जिसमें सत्ता के सामने जनता का कोई महत्त्व नहीं था। और यह बन गया एक बहुत बड़ी क्रांति का कारण। धीरे-धीरे यह असंतोष एक व्यापक जनांदोलन में बदलने लगा। जनता ने एक अहिंसक और शांतिप्रिय आंदोलन का निर्णय लिया और फिर क्या…चौराहों से लेकर राजमहल तक आंदोलनकारी पदयात्रा कर भ्रष्ट प्रशासन और राजा के विरुद्ध नारे लगाने लगे, भ्रष्ट अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग, सरकारी धन के हिसाब की माँग, नागरिकों के न्याय की मांग करने लगे और आक्रोश प्रकट किया कि राजा अपनी सत्ता को निरंकुश ढंग से चलाना बंद करे।

इतने वर्षों में पहली बार वह राजा जिसे सब राजनीति और कूटनीति में उत्कृष्ट मानते थे वह आम जनता की निर्भीकता से डर गया। जनता की एकजुटता देखकर उसके माथे पर चिंता की रेखाएँ उभरने लगीं। उसे अपने जीवन में पहली बार यह अनुभव हुआ कि जिस जनता को वह अपने शासन की सबसे कमजोर कड़ी समझता था, वही कुर्सी के लिए, उसकी सत्ता के लिए सबसे बड़ा प्रश्न बनकर खड़ी हो गई है। जैसे ही सूचना मिली कि भीड़ राजमहल की ओर आ रही है, वैसे ही राजा ने अपने सैनिकों को चौराहों पर जमा सभी लोगों को बंधी बनाकर कारागार में डालने का आदेश दिया।

धार्मिक और जातीय भिन्नता से ऊपर उठकर कनकपुरवासी एकजुट हो कई घंटों से बिना कुछ खाये भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ उठा रहे थे। कोई कविता के माध्यम से आक्रोश प्रकट करता तो कोई आमरण अनशन द्वारा। राज्य के अलग अलग कोने से हर उम्र के लोगों ने आंदोलन में भाग लिया। अचानक सैनिकों की एक टुकड़ी आंदोलन वाले स्थान पर आई और एक एक करके चौराहे पर उपस्थित सभी लोगों को बंधी बनाकर कारागार की ओर ले जाने लगी, कुछ लोगों ने विरोध जताते हुए अपना पक्ष रखा और कहा कि उनमें से कुछ अपने घर जा रहे थे, कुछ घर का सामान खरीदने जा रहे थे लेकिन सैनिकों ने उनकी बात अनसुनी कर दी। कई आंदोलनकारियों को कारागार में डाल दिया गया जिसके कारण बाकी जनता का मनोबल कमजोर हो गया और कई लोग अपने कदम वापस पीछे मोड़ने लगे।

राजा ने चौराहे बंद करवा दिए, कई दुकानें बंद करवा दी ताकि लोग एकत्रित न हो सकें जिसके कारण आन्दोलन थमता हुआ दिखाई पड़ा और उसे लगा कि जनता का आक्रोश खत्म हो गया, उनका मनोबल टूट गया। परंतु अगले दिन फिर लोगों का एक नया समूह उसी उत्साह के साथ अनशन पर बैठ गया, राजमहल में अपने कक्ष में बैठे राजा के कान में आम जनता की आवाज़, उनके नारे गूंजने लगे वह भयभीत हो गया और उसने चाहा कि जो भी उसके विरुद्ध है उसे कारागार में डलवा दे, राजद्रोह के लिए मृत्युदंड दे दे। एक रात उसके स्वप्न में कनकपुर का महल और वह उत्सव जो कुछ दिन पहले आयोजित किया गया था उसकी झलक दिखाई दी किन्तु तभी उसके सामने फटे पुराने कपड़ों में भूखे प्यासे बच्चे आ खड़े हुए, वह किसान आ खड़ा हुआ जिसने आत्महत्या का प्रयास किया था। राजा उस स्वप्न से स्वेद से लथपथ हो बेचैनी के कारण झकझोर कर उठा उठा और अपने मंत्रीमण्डल की बैठक बुलाई। उसने उसी समय जनता का कर माफ़ करने का, जरूरतमंदों को आर्थिक सहायता प्रदान करने आदेश दिया। साथ ही भ्रष्ट कर्मचारियों को निलम्बित कर, आम जनता की मूलभूत आवश्यकताओं को मुहैया करवाने का फैसला लिया।
उसी शाम कारागार से सभी आंदोलनकारियों को मुक्त कर उनसे माफी मांगते हुए अपना स्तीफा आम जनता को सौंप दिया।

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