गौरी तिवारी
छायी थी अंधियारी थी मिथ्या की,
जब आडंबर ने था अपना पैर पसारा,
तब पुस्तकालय ने किया
ज्ञानदीप से सारा जग रौशन।
नहीं मात्र यह पुस्तकों का संचय,
नहीं सिर्फ यह अक्षर का संसार,
यह तो मानव-चेतना का
है संचित अनुभव-भंडार।
यहाँ सुरक्षित हैं वे चिंतन
जिनसे युग का निर्माण हुआ,
जिनकी प्रज्ञा के आलोक से
मानवता का उत्थान हुआ।
किसी ग्रंथ में इतिहास बोलता,
बोलता किसी में विज्ञान का विस्तार,
किसी में दर्शन की गंभीरता,
किसी में संस्कृति का सार।
शैक्षिक संस्थानों की आत्मा है,
शोधों का यह आधार महान,
यहीं जिज्ञासा को मिलते हैं
नव निष्कर्षों के प्रतिमान।
जब-जब विद्यार्थी प्रश्न उठाता,
जब-जब संशय मन को घेरता है,
पुस्तकालय का यह शांत प्रांगण
तब-तब उत्तर लेकर आता है।
यहाँ न जाति, न धन का बंधन,
न पद का कोई अभिमान है,
जो ज्ञान-पिपासु बनकर आए,
उसका यहां होता सम्मान है।
वर्तमान और अतीत यहाँ
करते हैं परस्पर संवाद,
इन अलमारियों के अंतर में
जीवित रहता युगों का नाद।
पुस्तकालय वह पावन स्थल,
जिसका ज्ञान अविरल बहता है,
जो जितना इसमें डुबकी लगाए,
उतना ही समृद्ध रहता है।
सभ्यता की निरंतर प्रगति हेतु
इसका संरक्षण धर्म बने,
ज्ञान, विवेक और अनुसंधान का
यह अक्षय तीर्थ सदा अमर बने।
