अनिल तिवारी
इंडिया गठबंधन के सहयोगियों की जो “नई दिल्ली बैठक” हुई, उसके राजनीतिक मायने कांग्रेस के लिए बेहद फायदेमंद साबित हुए। क्योंकि इस बैठक में पहली बार नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की आवाज ध्यान से सुनी गई और उनके नेतृत्व को तथा उनकी पार्टी को गाहे-बगाहे चुनौती देने वाले क्षेत्रीय दलों के नेता बिना किसी ना नुकुर के हामी भरते नजर आए। अपने-अपने किले में बैठकर केवल सोशल मीडिया के सहारे सब कुछ हासिल कर लेने का ख्वाब देखने वाले खासकर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कांग्रेस की कार्यशैली पर आलोचनात्मक रुख दिखाया लेकिन उन्हें जल्दी ही इलहाम हो गया की बिहार और बंगाल की प्रचंड जीत के बाद भाजपा का अगला लक्ष्य उत्तर प्रदेश और निशाने पर समाजवादी पार्टी ही है।
कांग्रेस ने केंद्र सरकार की नीतियों, विदेश नीति और मतदाता सूची पुनरीक्षण से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। जबकि विपक्षी दलों ने संसद और सड़क दोनों स्तरों पर समन्वित आंदोलन चलाने तथा राष्ट्रीय मुद्दों पर साझा रुख अपनाने पर चर्चा की। साथ ही, 2029 लोकसभा चुनाव की तैयारी, विपक्षी एकता और गठबंधन के भविष्य की दिशा भी बैठक के एजेंडे में शामिल रही।
इस बैठक की कतिपय चुनौतियां भी सामने आईं, क्योंकि जहां तमिलनाडु में सत्ता से बेदखल हुई डीएमके ने कांग्रेस से नाराजगी होने के चलते इस बैठक से दूरी बनाई, जिससे गठबंधन के भीतर मतभेदों की चर्चा तेज रही। वहीं, आप के सुप्रीमो अरबिंद केजरीवाल की अनुपस्थिति भी चर्चा में रही। जबकि कुछ अन्य सहयोगी दलों की भूमिका और भागीदारी को लेकर भी सवाल बने रहे।
जहां तक इंडिया गठबंधन की इस बहुप्रतीक्षित बैठक के राजनीतिक मायने की बात है तो यह बैठक लोकसभा चुनाव 2024 के बाद विपक्ष की सबसे महत्वपूर्ण गैर-संसदीय बैठकों में से एक रही है। जिसके माध्यम से विपक्ष ने संदेश देने की कोशिश की कि मतभेदों के बावजूद भाजपा के खिलाफ साझा मंच अभी कायम है। वहीं, भाजपा ने डीएमके की अनुपस्थिति और अन्य अंतर्विरोधों को लेकर गठबंधन की एकता पर सवाल उठाए हैं। इस बैठक के सबसे बड़े राजनीतिक निष्कर्ष निम्नलिखित हैं:-
पहला, इंडिया गठबंधन अभी समाप्त नहीं हुआ है। तमाम मतभेदों, चुनावी झटकों और सहयोगी दलों की नाराज़गी के बावजूद विपक्षी दलों ने एक साझा मंच बनाए रखने का निर्णय लिया। 23 दलों की भागीदारी ने कांग्रेस को यह कहने का अवसर दिया कि गठबंधन अभी भी प्रासंगिक है।
दूसरा, बैठक का प्रमुख उद्देश्य केवल वर्तमान राजनीतिक मुद्दों पर प्रतिक्रिया देना नहीं था, बल्कि 2029 लोकसभा चुनाव के लिए दीर्घकालिक रणनीति तैयार करना भी था। विपक्ष भाजपा के विरुद्ध एक व्यापक राष्ट्रीय नैरेटिव गढ़ने की कोशिश में दिखा।
तीसरा, बैठक से यह संकेत मिला कि कांग्रेस गठबंधन की धुरी बनी रहना चाहती है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने विपक्षी एकता पर जोर दिया और केंद्र सरकार के विरुद्ध साझा संघर्ष का आह्वान किया।
चौथा, एमके स्टालिन की डीएमके और अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी का बैठक से दूर रहना बताता है कि विपक्षी एकता अभी भी कई अंतर्विरोधों से घिरी हुई है।
राजनीतिक लोगों का मानना है कि इस बैठक का बिहार की राजनीति पर प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि राजद नेता तेजस्वी यादव को राष्ट्रीय मंच मिला। बैठक में तेजस्वी की मौजूदगी ने यह संदेश दिया कि वे केवल बिहार तक सीमित नेता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विपक्ष के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं। वहीं, बिहार चुनाव में विपक्षी एकता का संदेश भी गया। ऐसे में यदि कांग्रेस, राजद और वाम दल तालमेल बनाए रखते हैं तो बिहार में एनडीए के खिलाफ विपक्षी चुनौती अपेक्षाकृत मजबूत बन सकती है।
बैठक से जाति और सामाजिक न्याय की राजनीति को भी बल मिला। क्योंकि राहुल गांधी और तेजस्वी यादव पिछले कुछ समय से सामाजिक न्याय, जातीय गणना और प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को साथ उठाते रहे हैं। बैठक से संकेत मिला कि यह विपक्ष का प्रमुख राजनीतिक एजेंडा बना रह सकता है। जहां तक 2029 के लोकसभा चुनाव पर संभावित प्रभाव की बात है तो इसका सकारात्मक पक्ष यह रहा कि भाजपा के विरुद्ध एक साझा राष्ट्रीय मंच बना रहता है। वहीं, संसदीय मुद्दों पर समन्वय बढ़ सकता है। साथ ही क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस के बीच संवाद कायम रहने की संभावना बनी रहती है। लेकिन सौ टके का सवाल अभी भी और आगे भी यही है की सीटों का बंटवारा कैसे होगा? क्योंकि कई राज्यों में गठबंधन के दल आमने-सामने हैं।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस बैठक का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश यह रहा कि इंडिया गठबंधन ने अपने अस्तित्व और प्रासंगिकता का प्रदर्शन करने की कोशिश की। लेकिन यह भी स्पष्ट हुआ कि विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि अपने भीतर की एकता बनाए रखना है। बिहार में इसका तात्कालिक लाभ महागठबंधन को मिल सकता है, जबकि 2029 के लिए यह बैठक विपक्षी पुनर्गठन की शुरुआत मानी जा सकती है।
हालांकि सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सहयोगी दल भविष्य में अपने मतभेद कितनी प्रभावी ढंग से सुलझा पाते हैं।
