कृषि की काया पलटी, ग्रामीण किसानों के भी दिन बहुरे
दुनिया भर के लोकतांत्रिक इतिहास में कुछ कालखंड ऐसे रहे हैं जो केवल शासन परिवर्तन के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र की संस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण के लिए याद किए जाते हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीते बारह वर्षों का दौर ऐसा ही एक कालखंड है। यह केवल एक प्रधानमंत्री के लंबे कार्यकाल की कहानी नहीं है, बल्कि उस भारत की कहानी है जिसने स्वयं को नए आत्मविश्वास, नई ऊर्जा और नई पहचान के साथ स्वयं को स्थापित किया है। नरेंद्र मोदी ने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेकर स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के लगातार सबसे लंबे समय तक निर्वाचित प्रधानमंत्री रहने के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया। यह उपलब्धि केवल राजनीतिक सफलता नहीं है, बल्कि जनता के उस विश्वास का प्रमाण है जो बार-बार लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से व्यक्त हुआ है। भारत जैसा विशाल, बहुभाषी, बहुधार्मिक और सांस्कृतिक विविधताओं से भरा देश किसी नेतृत्व को लगातार तीन बार राष्ट्रीय जनादेश दे, यह अपने आप में असाधारण एवं ऐतिहासिक घटना है।
इस कालखंड की सबसे बड़ी विशेषता केवल विकास नहीं, बल्कि विकास और विश्वास का समन्वय है। नेहरू युग को आधुनिक भारत के निर्माण का काल कहा गया, तो वर्तमान युग को उस भारत के आत्मविश्वास के पुनर्जागरण का काल कहा जा सकता है। इस कालखंड में केंद्र की राजग सरकार ने केवल सड़कों, पुलों, हवाई अड्डों और डिजिटल नेटवर्क का निर्माण नहीं किया, बल्कि करोड़ों भारतीयों के मन में यह विश्वास भी जगाया कि भारत किसी से कम नहीं है और वह विश्व मंच पर नेतृत्वकारी भूमिका निभा सकता है।
इस कालखंड का नेतृत्व कर रहे प्रधानमंत्री की सबसे विलक्षण विशेषता यह रही कि उन्होंने राजनीति को केवल सत्ता संचालन का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे जनभावनाओं और राष्ट्रीय आकांक्षाओं से जोड़ा। वे उन विरले नेताओं में हैं जिन्होंने सरकारी योजनाओं को केवल प्रशासनिक दस्तावेज नहीं रहने दिया, बल्कि उन्हें जनआंदोलन का स्वरूप दिया। स्वच्छ भारत अभियान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सफाई का विषय जो कभी सरकारी विभागों तक सीमित था, उसे राष्ट्रीय चरित्र और सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ दिया गया।
वर्तमान समय को भारत की गुम होती सांस्कृतिक अस्मिता की पुनर्स्थापना के लिए भी याद किया जाएगा। सदियों से उपेक्षित राष्ट्रीय प्रतीकों, तीर्थस्थलों और सांस्कृतिक विरासत को नई गरिमा मिली। अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण केवल एक धार्मिक घटना नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की सांस्कृतिक चेतना के सम्मान का प्रतीक बना। काशी विश्वनाथ धाम, महाकाल लोक, केदारनाथ पुनर्निर्माण और सोमनाथ जैसे तीर्थों का विकास यह संकेत देता है कि आधुनिकता और परंपरा एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकती हैं।
वैश्विक मंच पर भारत आज वैश्विक विमर्श को प्रभावित करने वाला राष्ट्र बनकर उभरा है। रूस-यूक्रेन युद्ध हो, पश्चिम एशिया का संकट हो, जी-20 का नेतृत्व हो अथवा वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) की आवाज उठाने का प्रश्न- भारत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह वही भारत है जिसे कभी सपेरों का देश तो कभी विकासशील देशों की कतार में खड़ा माना जाता था, लेकिन आज दुनिया इसकी आर्थिक प्रगति रफ्तार को आंकते हुए समाधान प्रदाता राष्ट्र के रूप में देख रही है।
इन बारह वर्षों की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह भी है कि शासन के केंद्र में पहली बार अंतिम व्यक्ति को रखने का गंभीर प्रयास दिखाई दिया। जनधन योजना, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत, पीएम आवास योजना, मुफ्त राशन योजना तथा प्रत्यक्ष लाभ अंतरण जैसी योजनाओं ने करोड़ों गरीबों के जीवन में बदलाव लाने का काम किया। शासन की पारदर्शिता बढ़ी और बिचौलियों की भूमिका सीमित हुई। डिजिटल इंडिया अभियान ने तकनीक को केवल महानगरों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि गांव-गांव तक पहुंचाया।
मूलतः भारत एक कृषि प्रधान देश है। बीते 12 वर्षों के दौरान भारतीय कृषि एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। पहले हमारी सबसे बड़ी चिंता यह थी कि देश में अनाज की कमी न हो और किसी तरह भूख से बचाव हो जाए। आज किसान हितैषी नीतियों के कारण कृषि सिर्फ ‘उत्पादन के क्षेत्र’ तक सीमित न होकर किसान की समृद्धि, जोखिम‑ सुरक्षा, पोषण सुरक्षा, हरित तकनीक और ग्रामीण विकास का समन्वित आधार बन गई है। हरित क्रांति के बाद पहली बार नीतियां फसल उत्पादन के बजाय किसान की वास्तविक आय, टिकाऊ कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती जैसे पहलुओं पर केंद्रित हैं। इसी सोच से दलहन-तिलहन मिशन, काटन मिशन, प्राकृतिक खेती मिशन, पीएम धन-धान्य कृषि योजना, खेत बचाओ अभियान, डिजिटल कृषि और शोध-नवाचार, सबको व्यापक दृष्टि से जोड़ा जा रहा है। समन्वित प्रयासों का ही परिणाम है कि आज भारत खाद्यान्न उत्पादन में 3765.63 लाख टन के रिकार्ड स्तर पर है।
सरकार ने किसान की जोखिम‑ सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी है। पीएम किसान सम्मान निधि के तहत अब तक 22 किस्तों के माध्यम से किसानों के खातों में सीधे 4.27 लाख करोड़ रुपये से अधिक की सहायता पहुंच चुकी है। सिंचाई, ग्रामीण सड़कों, कृषि‑ अवसंरचना, वेयरहाउस और कोल्ड स्टोरेज‑ चेन में निवेश ने उत्पादन, भंडारण और बाजार तक पहुंच को मजबूत किया है। दालें, खाद्य तेल और कपास जैसे क्षेत्रों को रणनीतिक प्राथमिकता देते हुए अलग-अलग मिशन के रूप में आगे बढ़ाया है। राष्ट्रीय दलहन, तिलहन और काटन मिशन इस दिशा में बहुत उपयोगी साबित हो रहे हैं। इन अभियानों का उद्देश्य है किसान को उत्पादन के साथ‑साथ वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा योग्य गुणवत्ता, बेहतर मूल्य और स्थिर आय भी मिल सके।
रासायनिक तत्वों पर बढ़ती निर्भरता, मिट्टी की दुर्बलता और भूजल पर दबाव जैसी समस्याओं से निपटने के लिए प्राकृतिक खेती को एक राष्ट्रीय मिशन के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है। सरकार का संकल्प है कि एक करोड़ किसानों को प्राकृतिक खेती के लिए सेंसिटाइज कर इनमें से लगभग 18 लाख किसानों को सक्रिय रूप से प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए तैयार किया जाए और चरणबद्ध रूप से करीब 75 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को प्राकृतिक खेती के दायरे में लाया जाए।
असमानता को दूर करने के लिए पीएम धन-धान्य कृषि योजना की संकल्पना की गई है। इस योजना के तहत लगभग 100 कम उत्पादन वाले जिले चिह्नित किए गए हैं, जहां प्रति हेक्टेयर पैदावार राष्ट्रीय औसत से काफी कम है और किसान अपेक्षित लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। इन जिलों में 11 विभागों की 36 योजनाओं जोड़कर उन्हें समग्र पैकेज में प्रस्तुत किया जा रहा है। इसके तहत सिंचाई, मृदा स्वास्थ्य, बीज, उर्वरक, फसल विविधीकरण, पशुपालन, बागवानी, कृषि-उपकरण, कौशल विकास, अवसंरचना और बाजार ‑जुड़ाव जैसी सुविधाएं सहजता से उपलब्ध हो पा रही हैं।
असंतुलित उर्वरक उपयोग, भूजल का अत्यधिक दोहन और सीमित फसल चक्र ने खेत की सेहत को प्रभावित किया है। इसे देखते हुए सरकार ने ‘खेत बचाओ अभियान’ शुरू किया है। यह अभियान केवल मिट्टी बचाने का नहीं, बल्कि किसानों की आय, भोजन की गुणवत्ता और भविष्य की खाद्य सुरक्षा की रक्षा का है। इसके पांच मुख्य संदेश हैं-किसान मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का उपयोग करे, डीएपी और यूरिया पर अत्यधिक निर्भरता कम करे, जैव एवं नैनो उर्वरकों को अपनाए, हरी खाद, जैविक खाद और एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा दे, नकली बीज, उर्वरक और कीटनाशकों के विरुद्ध सतर्क रहे। लक्ष्य यह नहीं कि उर्वरक खपत अचानक कम कर दी जाए, बल्कि यह है कि हर किसान सही मात्रा, सही समय और सही मिश्रण का उपयोग करे, ताकि मिट्टी की सेहत लंबे समय तक बनी रहे, लागत घटे और उत्पादन भी सुरक्षित रहे।
कृषि को लाभकारी बनाने की दृष्टि से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आइसीएआर) ने 2014–25 के बीच लगभग 3,000 ऐसी किस्में विकसित की हैं, जो जलवायु परिवर्तन से निपटने में कहीं अधिक सक्षम हैं। इस क्रम में डिजिटल कृषि मिशन और एग्रीस्टैक के तहत किसान पहचान, फसल प्लाटों का डिजिटलीकरण, ड्रोन‑ आधारित सेवाएं, कीट‑रोग निगरानी, मौसम और स्थान विशेष की आवश्यकता के अनुरूप सलाह जैसी व्यवस्था की जा रही है।
सरकार का इरादा स्पष्ट है कि किसान की आय बढ़े, उसकी मेहनत का उचित सम्मान और मूल्य मिले, दालों, तिलहनों और कपास में आत्मनिर्भरता से पोषण, तेल, वस्त्र सुरक्षा मजबूत हो। प्राकृतिक खेती, खेत बचाओ अभियान और जलवायु ‑अनुकूल तकनीक से खेत की मिट्टी, पानी और किसान की सुरक्षा सुनिश्चित हो और कम उत्पादन वाले जिलों में असमानता घटे। खेती कुशल, लचीली, टिकाऊ और प्रतिस्पर्धी बने। याद रहे कि जब खेत बचेगा, तब ही किसान बचेगा। जब किसान बचेगा, तब कृषि बचेगी और जब कृषि बचेगी, तब भारत सुरक्षित, समृद्ध और आत्मनिर्भर बनेगा।
इसी प्रकार ग्रामीण किसानों की समृद्धि के लिए भारत सरकार ने पीएम कुसुम योजना कुंभ मूर्त रूप दिया है। इसका लक्ष्य किसानों को सिंचाई के लिए सोलर पंप उपलब्ध कराना और उनकी बंजर जमीन से अतिरिक्त आय के अवसर निर्मित करना है। इस योजना के तहत किसान अपनी बंजारा या कृषि योग्य जमीन पर दो मेगावाट तक के छोटे सोलर पावर प्लांट स्थापित कर 25 वर्षों तक एक सुनिश्चित आय प्राप्त कर सकते हैं। सिंचाई के लिए डीजल से चलने वाले पंपों को सोलर पंप में बदलने के लिए सरकार 60% तक का अनुदान देती है। इस योजना के तहत 34422 करोड रुपए की वित्तीय सहायता से मार्च 2026 तक 34800 मेगावाट सौर क्षमता को जोड़ा जा चुका है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि संकल्पबोध के साथ सरकार ने कुछ बड़े लक्ष्य निर्धारित कर उन्हें राष्ट्रीय अभियान का स्वरूप दिया हैं। चाहे 370 का उन्मूलन हो, तीन तलाक पर रोक हो, जीएसटी लागू करना हो, महिला आरक्षण विधेयक हो अथवा नक्सलवाद और आतंकवाद के विरुद्ध कठोर नीति। इन सभी निर्णयों में राजनीतिक जोखिम था, लेकिन सरकार ने जोखिम उठाने का साहस दिखाया।
हालांकि, किसी भी लोकतांत्रिक शासन की तरह चुनौतियां भी कम नहीं हैं। बेरोजगारी, महंगाई, कृषि संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य की बढ़ती लागत, सामाजिक विषमताएं तथा आर्थिक अवसरों का असमान वितरण ऐसे प्रश्न हैं जिनका समाधान अभी अपेक्षित है। भारत यदि 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य प्राप्त करना चाहता है तो केवल आर्थिक वृद्धि पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ चिकित्सा, रोजगार सृजन और भ्रष्टाचारमुक्त प्रशासन को भी समान प्राथमिकता देनी होगी। मोदी सरकार के आगामी वर्षों से सबसे बड़ी अपेक्षा यही है कि वह भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपने अभियान को और अधिक प्रभावी बनाए। भारत को ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जहां ईमानदारी अपवाद नहीं, सामान्य व्यवहार बने। शिक्षा और स्वास्थ्य को व्यावसायिक माफियाओं के प्रभाव से मुक्त कर आम नागरिक की पहुंच में लाना भी समय की मांग है। साथ ही उद्यमिता को बड़े औद्योगिक घरानों तक सीमित रखने के बजाय गांवों, युवाओं और महिलाओं तक पहुंचाना होगा ताकि प्रत्येक नागरिक रोजगार खोजने वाला नहीं, बल्कि रोजगार देने वाला बन सके।
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा और ग्रामीण आबादी है। यदि इस ऊर्जा को कौशल, नवाचार और उद्यमिता से जोड़ा गया तो भारत केवल विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो सकता है। इसी प्रकार महिला शक्ति को विकास की मुख्यधारा में पूर्ण भागीदारी देकर राष्ट्र निर्माण की गति को कई गुना बढ़ाया जा सकता है। बीते 12 वर्षों की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद आंकड़ों, परियोजनाओं या चुनावी जीतों में नहीं, बल्कि उस मनोवैज्ञानिक परिवर्तन में है जो भारत के जनमानस में दिखाई देता है। केंद्र सरकार ने बारह वर्षों में विकास की संरचनाएं खड़ी की हैं, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि सरकार ने करोड़ों भारतीयों के भीतर भविष्य के भारत की एक आकांक्षा जगाई है। 2047 के विकसित भारत का संकल्प तभी साकार होगा जब विकास के साथ विश्वास, समृद्धि के साथ समान अवसर और शक्ति के साथ संवेदनशीलता भी जुड़ेगी। यदि यह संतुलन बना रहता है, तो इतिहास इस कालखंड को केवल एक लंबे राजनीतिक कार्यकाल के रूप में नहीं, बल्कि भारत के आत्मविश्वास, सांस्कृतिक पुनर्जागरण युग के रूप में याद करेगा।
अभिषेक जयहिंद
