Breaking News :

nothing found

अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिलाने वाले खुदीराम

छोटा सा देश ब्रिटेन पूरी दुनिया को अपनी मुट्ठी में रखे हुए था। इसीलिए कहा जाता था कि ब्रिटिश हुकूमत में कभी सूरज नहीं डूबता। भारत में भी फूट डालो और राज करो (डिवाइड एण्ड रूल) की रणनीति से ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यापार करते-करते सत्ता ही हथिया ली थी। साम्राज्य फैलता गया लेकिन उसका विरोध भी होता रहा। मंगल पांडे ने 1857 में आजादी की अलख जगाई तो वहीं रानी लक्ष्मीबाई तलवार लेकर निकल पड़ी तो कभी खुदीराम बोस जैसे नौजवान सीना तानकर खड़े हो गये। इन वतनपरस्तों ने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी। अंततः अंग्रेजों को भारत से जाना पड़ा। खुदीराम बोस के माता-पिता तो उनकी जिंदगी को लेकर बहुत चिंतित थे क्योंकि उनके दो बेटों की कम उम्र में ही मौत हो गयी थी। इसीलिए उन्होंने अपने इस तीसरे बेटे को अपनी बेटी के हाथ दो मुट्ठी चावल में बेच दिया था। यह एक प्रकार का टोटका था। बंगाल में चावल की खंडी (टूटा हुआ चावल) को खुदी कहा जाता है। इसीलिए बालक का नाम खुदीराम बोस रखा गया था। यही बालक ब्रिटिश हुकूमत की नाक में दम करने लगा। वह जब 15 साल का था, तभी अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ पर्चा बांटते पकड़ा गया था। इसके बाद खुदीराम ने क्रूर जज इगलस किंग्स फोर्ड की बग्घी पर बम फेंका था। इत्तेफाक से किंग्स फोर्ट बग्घी में नहीं था लेकिन बम के प्रहार से एक वैरिस्टर की बेटी और पत्नी मारी गयी थीं। खुदीराम बच निकले थे लेकिन एक गद्दार ने उन्हें पकडवा दिया। उन्हें 11 अगस्त को फांसी दी गयी थी। आजादी का जश्न मनाते समय हम खुदीराम बोस जैसे बहादुर बच्चे को भी याद करें जिसके बलिदान से ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिल गयी थी।

3 दिसंबर 1889 को, बंगाल के मेदिनीपुर में त्रैलोक्यनाथ बोस और लक्ष्मीप्रिया देवी के घर एक बेटे की किलकारी गूंजी। घर में जश्न था, लेकिन एक अनजाना सा खौफ भी। खौफ इसलिए, क्योंकि इससे पहले उनके दो बेटों की कम उम्र में ही बीमारी से मौत हो चुकी थी। तब मां-बाप ने एक देसी टोटका आजमाया। उन्होंने अपनी बड़ी बेटी को तीन मुट्टी खुदी (बंगाल में टूटे हुए चावल को खुदी कहते हैं) देकर इस बच्चे को प्रतीकात्मक रूप से बेच दिया, ताकि मौत की नजर इस पर न पड़े। तीन मुट्टी खुदी के बदले बचे इस बच्चे का नाम पड़ गया- खुदीराम। जरा सोचिए, 18 साल की उम्र में हम और आप क्या कर रहे थे? कोई कॉलेज जाने की तैयारी कर रहा होगा, कोई करियर के सपने बुन रहा होगा, तो कोई दोस्तों के साथ मस्ती में मगन होगा लेकिन खुदीराम ने 18 साल की उम्र में पूरे अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिला कर रख दी थी। तारीख थी 11 अगस्त 1908। एक 18 साल का छरहरा सा लड़का, चेहरे पर कोई खौफ नहीं, बल्कि एक सुकून भरी मुस्कान लिए। हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लेता है।

खुदीराम ने 9वीं तक पढ़ाई की और 15 साल की उम्र में अनुशीलन समिति से जुड़ गए। एक ऐसा संगठन जो खून में इंकलाब घोलता था। 15 साल की ही उम्र में वो पहली बार अंग्रेजों के खिलाफ पर्चे बांटते पकड़े गए थे। उन दिनों एक अंग्रेज जज हुआ करता था। डगलस किंग्सफोर्ड। उसे भारतीयों से खास नफरत थी। छोटे-छोटे जुर्म पर वह कम से कम 15 कोड़े मारने की सजा देता था। क्रांतिकारियों ने तय किया कि इस किंग्सफोर्ड का काम तमाम करना होगा। खुदीराम बोस और उनके साथी प्रफुल्ल कुमार चाकी को यह जिम्मेदारी दी गई।

किंग्सफोर्ड का ट्रांसफर बिहार के मुजफ्फरपुर हो गया था। ये दोनों लड़के अप्रैल 1908 में मुजफ्फरपुर पहुंचे। दोनों ने एक धर्मशाला में डेरा डाला। एक अनजाना शहर, अनजानी भाषा, लेकिन इरादे फौलादी। कई दिनों तक किंग्सफोर्ड की रेकी की गई। फिर 30 अप्रैल 1908 की भयानक रात आयी। शाम का वक्त था। खुदीराम और प्रफुल्ल किंग्सफोर्ड के घर के बाहर एक पेड़ के अंधेरे में घात लगाए बैठे थे, तभी एक बग्गी बाहर निकली। खुदीराम को लगा शिकार सामने है। उन्होंने दौड़कर उस बग्गी पर बम मार दिया। जोरदार धमाका हुआ। दोनों को लगा कि उन्होंने अपना मिशन पूरा कर लिया है। लेकिन यहां किस्मत ने एक क्रूर मजाक किया। उस बग्गी में किंग्सफोर्ड नहीं था। उसमें लोकल बैरिस्टर प्रिंगल कैनेडी की पत्नी और बेटी सवार थीं, जिनकी इस हमले में जान चली गई।

धमाके के बाद दोनों वहां से भागे। वो आसानी से बच निकलते, लेकिन हड़बड़ी में खुदीराम की चादर और जूते वहीं छूट गए। यही चादर पुलिस के लिए सबसे बड़ा सुराग बन गई। रातों-रात पूरे शहर में मुनादी करवा दी गई। दो बंगाली लड़कों की तलाश है, बताने वाले को 5000 रुपये का इनाम। उस दौर में 5000 रुपये किसी का भी ईमान डिगा सकते थे। पकड़े जाने के डर से दोनों ने अपने रास्ते अलग कर लिये। प्रफुल्ल कुमार समस्तीपुर स्टेशन पहुंचे। वहां नंदलाल बनर्जी नाम के एक बंगाली पुलिस वाले को उन पर शक हो गया। उसने गद्दारी की और पुलिस को बुला लिया। जब प्रफुल्ल को लगा कि अब बचना नामुमकिन है, तो इस वीर ने अंग्रेजों के हाथ लगने से बेहतर खुद को गोली मारना समझा। अंग्रेजों की क्रूरता देखिए, प्रफुल्ल की पहचान पक्की करने के लिए उन्होंने उस शहीद का सिर काटा और कलकत्ता भेज दिया।

उधर, खुदीराम लगातार 30 किलोमीटर पैदल चलकर वैनी रेलवे स्टेशन (अब पूसा) पहुंचे। भूख-प्यास से हलक सूख रहा था। जैसे ही वो पानी पीने एक हैंडपंप के पास गए, पुलिस ने उन्हें घेर लिया। खुदीराम इतने थक चुके थे कि अपनी पिस्तौल निकाल ही नहीं पाए। जब उन्हें मुजफ्फरपुर पुलिस स्टेशन लाया गया, तो वैन से उतरते ही 18 साल के उस लड़के ने आसमान फाड देने वाली आवाज में नारा लगाया वंदे मातरम।

जज ने 13 जून को उन्हें फांसी की सजा सुनाई। जज भी सन्न था कि 18 साल के लड़के को मौत की सजा मिल रही है और इसके चेहरे पर डर की एक लकीर तक नहीं है। जज ने पूछा, क्या तुम फैसला समझ गए? खुदीराम बोले, हां, लेकिन मैं आपको बताना चाहता हूं कि मैंने वो बम कैसे बनाया था। सोचिए। उस लड़के को मरने का डर नहीं था, उसे फिक्र थी कि बम बनाने का फॉर्मूला अखबारों के जरिए बाकी देशवासियों तक पहुंच जाए। उनकी बेखौफी का एक किस्सा और सुनिए। फांसी से पहले जेलर ने उनकी आखिरी इच्छा पूछी। खुदीराम ने कहा, कुछ आम खाने हैं। जेलर आम ले आया। कुछ देर बाद जब जेलर वापस लौटा, तो आम वैसे के वैसे रखे थे। उसने पूछा, खाए क्यों नहीं? खुदीराम हंसते हुए बोले, खा तो लिए! जेलर ने पास जाकर देखा, तो खुदीराम ने आम के छिलके को बिना काटे, उसकी गुठली और रस को इतनी सफाई से चूस लिया था कि आम एकदम साबुत लग रहा था। अपनी मौत से चंद घंटों पहले कोई ऐसा मजाक कैसे कर सकता है?

11 अगस्त की सुबह ठीक 6 बजे इस वीर सपूत को फांसी दे दी गई। उस वक्त के अखबारों ने लिखा कि उनकी चिता की भस्म पाने के लिए लोगों में होड़ मच गई। कोई सोने की डिब्बी में, तो कोई चांदी की डिब्बी में उनकी राख भरकर ले गया। बंगाल के जुलाहों ने ऐसी धोतियां बुननी शुरू कर दीं, जिनके किनारे पर खुदीराम लिखा होता था। आजादी की वर्षगांठ पर ऐसे वीरों को नमन करना शिवार्चन से कम नहीं है।

Read Previous

सुभाष ने कहा- देशवासियों ! लड़ते रहो, आज़ादी आप के हाथ में है

Read Next

क्यों मनाते हैं नागपंचमी और गुड़िया

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Most Popular