कुमकुम शर्मा
प्रकृति से प्रेम की परम्परा नाग पंचमी सावन के महीने का एक प्रमुख त्यौहार है। यह प्रत्येक वर्ष श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है। हमारी हिन्दू संस्कृति में पशु-पक्षी, वृक्ष-वनस्पति सबके साथ आत्मीय सम्बन्ध जोड़ने की परम्परा रही है। हमारे यहां जो कुछ भी हमें प्रकृति से मिलता है उसके प्रति कृतज्ञ बने रहने और आभार प्रकट करने का यह तरीका रहा है सम्भवतः। गाय हमें दूध देती है तो उसे माँ मानते हुये उसकी पूजा की जाती है। कहीं-कहीं पर कोकिला व्रत भी रखा जाता है, कोयल के दर्शन और उसकी मधुर आवाज सुनने के बाद ही कुछ ग्रहण किया जाता है। हमारी संस्कृति में नाग पंचमी के दिन नाग की पूजा और उसको दूध भी पिलाया जाता है। सम्भवतः बरसात के दिनों में सर्प दंश की संभावना और डर को देखते हुये नाग पंचमी के रूप में नाग देवता की पूजा अर्चना की शुरूआत हुई होगी। पूरे भारतवर्ष में नाग देवताओं की पूजा करने, उनका आशीर्वाद पाने और सर्प दंश से सुरक्षा की कामना के इसे लिए मनाया जाता है।
इस पर्व से जुड़ी अनेक पौराणिक लोक कथाएं समाज में प्रचलित हैं जिन्हें पूजा करते समय एक-दूसरे को सुनाया भी जाता है। इससे सम्बन्धित आस्तिक मुनि और जनमेजय की कथा सभी जानते हैं।
आस्तिक मुनि और जनमेजय की कथा
यह पौराणिक कथा महाभारत के आदि पर्व में मिलती है। राजा जनमेजय के पिता और पांडव वंश के उत्तराधिकारी परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के काटने से हुई थी। राजा जनमेजय ने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए सम्पूर्ण नागकुल के विनाश हेतु एक विशाल ‘सर्प यज्ञ’ करवाया था। इस यज्ञ में मंत्रों के प्रभाव से सभी सर्प अपने आप खिंचकर स्वतः ही अग्नि में भस्म होने लगे। तक्षक नाग पर भी मृत्यु का संकट मंडराने लगा। वे भी भयभीत होकर देवराज इन्द्र की शरण में गए लेकिन यज्ञ का बल इतना प्रभावशाली था कि तक्षक भी खिंचने लगा। आस्तिक मुनि के पिता महर्षि जरत्कारू और माता नागराज वासुकि की बहन मनसा देवी थीं। नाग माता और अपने मामा वासुकि के आग्रह पर आस्तिक मुनि जनमेजय यज्ञ स्थल पर पहुंचे। आस्तिक मुनि ने अपनी मधुर वाणी से राजा जनमेजय और यज्ञ की स्तुति की। आस्तिक मुनि के विद्वतापूर्ण स्तुति गान से प्रसन्न होकर जनमेजय ने उन्हें इच्छित वर मांगने के लिए कहा। तब मुनि ने वरदान स्वरूप तक्षक समेत समस्त नागों का वध रोकने के लिए यज्ञ को तत्काल रोकने का आग्रह किया। राजा जनमेजय दुविधा में पड़ गये। क्योंकि वे अपना प्रण नहीं छोड़ना चाहते थे और ब्राह्मण को दिया गया वचन भी उन्हें निभाना था। सभा में उपस्थित सभी ऋषि मुनियों ने आस्तिक मुनि के आग्रह का समर्थन किया। अंततः राजा जनमेय को यज्ञ रोकना पड़ा जिससे तक्षक समेत सभी नागों के प्राण बच गये। इस सम्बन्ध में मान्यता है कि जिस दिन आस्तिक मुनि ने नागों की रक्षा की थी, वह सावन के महीने की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि थी। उसी समय से इस दिन को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है और आस्तिक मुनि का स्मरण किया जाता है।
नाग पंचमी से जुड़ी श्रीकृष्ण कालिया नाग की कथा
कहते हैं यमुना नदी में कालिया नाग का बहुत आतंक था। भगवान श्रीकृष्ण और कालिया नाग की यह कथा भगवत पुराण में वर्णित है यह कृष्ण भगवान की प्रसिद्ध लीलाओं में से एक है। कहते हैं कालिया नाग का मूल निवास ‘रमणक द्वीप था, लेकिन भगवान विष्णु के वाहन गरूण से उसका वैर था। गरूण के डर से कालिया नाग वृंदावन की यमुना नदी के गहरे कुंड में आकर बस गया था। उसके विष से यमुना का पानी खौलने लगा और नदी के पेड़-पौधे और अन्य जीव मरने लगे। एक दिन अपने मित्रों के साथ खेलते हुये बाल कृष्ण की गेंद को निकालने के लिए कदम्ब के वृक्ष से यमुना में कूद गये। नाग को जब पता चला तो वह क्रोधित होकर विष छोड़ता हुआ बाहर आया।बालक कृष्ण और कालिया नाग के बीच युद्ध हुआ। बाल्ता नंद बाबा तक पहुंची तो सभी घबराकर तट पर आ गये। अंत में श्रीकृष्ण ने उसके फणों पर चढ़कर नृत्य करते हुये उसके अहंकार को कुचल दिया। जब कालिया के प्राण संकट में आ गये तो उसकी पत्नियों ने भगवान कृष्ण से उनके पति को जीवनदान देने की प्रार्थना की। कालिया ने भी भगवान से क्षमा याचना की और वचन दिया कि वह अपना परिवार छोड़कर चला जायेगा। भगवान श्रीकृष्ण ने उसे जीवनदान दिया जिससे यमुना नदी विषमुक्त होकर साफ हो गई। तभी से नाग पंचमी के दिन नागों की पूजा की जाती है।
नागपंचमी से जुड़ी एक लोककथा
एक समय में एक सेठ जी के सात पुत्र थे। सबसे छोटे पुत्र की पत्नी अत्यधिक विदूषी और विनम्र कन्या थी। एक दिन वे सभी घर लीपने के लिये मिट्टी लेने गईं। वे खुशी से मिट्टी खोद रही थीं तभी एक सांप निकला बड़ी बहू खुरपी से उसे मारने लगी तो छोटी बहू ने उसे रोक दिया। वह एक तरफ बैठ गया। वह घर के काम खत्म करने के बाद वापस लौटी तो सांप तब भी बैठा रहा। छोटी बहू ने उसे प्रेम से भाई मान लिया। नाग देवता ने उसकी रक्षा की तथा उसे उपहार स्वरूप एक कीमती हार भेंट किया। वहां रानी ने वह हार देखा तो वह उस पर मोहित हो गई। बहू ने वह हार रानी के लिए राजमहल में भेज दिया। लेकिन बहू के अतिरिक्त किसी के भी छूने से वह हार सांप में परिवर्तित हो जाता था। ऐसा ही हुआ जब रानी ने हार को पहना तो वह सर्प के रूप में बदल गया। वह कीमती हार ही सेठ की छोटी बहू का सर्प भाई है यह सच्चाई पता लगने पर राजा ने बहू और उसके भाई को आदर सहित विदा किया। उसी दिन से नागपंचमी के दिन नागों की पूजा अर्चना की जाती है और उन्हें दूध और जल अर्पित किया जाता है। प्रयागराज के दारागंज मोहल्ले में नागराज वासुकि का प्रचीन मन्दिर है जहां प्रतिवर्ष नागपंचमी के दिन बहुत बड़ा मेला लगता है।
नागपंचमी और गुड़िया ही पर्याय हैं एक दूसरे के
भारत के कुछ स्थानों में विशेषकर उत्तर प्रदेश के कानपुर, बांदा आदि जगहों पर नागपंचती के पर्व को ही गुड़िया पर्व के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन कपड़े की गुड़िया बनाकर उसे सड़क पर पीटने का रिवाज है इसके पीछे भी एक कहानी है। एक बार एक शिवभक्त की बहन अनजाने में एक नाग देवता को डंडे से पीटकर मार दिया था उस डर से कि कहीं वह सांप उसके भाई को न काट ले। तब मंदिर के पुजारी ने बहन को सर्पदंश का दोष लगने की बात कहकर एक उपाया बताया कि यदि कपड़े की गुड़िया बनाकर चैराहे या सड़क पर पीटा जाये तो इस दोष से मुक्ति पाई जा सकती है तभी से यह गुड़िया पीटने की परम्परा चली आ रही है। यह परम्परा भाई-बहन के प्रेम, सर्पदंश के दोष से मुक्ति पाने और प्राचीन,पारम्परिक मान्यताओं से जुड़ी हुई है। कपड़े की गुड़िया को सड़क पर प्रतीकात्मक रूप में पीटा जाता है। संभवतः यह कार्य डर और सर्पदंश के भय को दूर करने और आपसी प्रेम और उल्लास को बढ़ाने के लिये ही मनाया जाता है। इस दिन कहीं-कहीं पर पतंगबाजी का भी रिवाज है।
