गौरी तिवारी
क्रांति एकटक अनंत क्षितिज को नापती पतंगों को देख रहा था मानो वह भी उन्हीं रंग-बिरंगी पतंगों की दुनिया में जा मिला हो और आसमान में सैर करते करते बादलों को छू रहा हो। गली के लगभग हर घर की छत पर एक कतार में तिरंगा लहरा रहा था, लाउडस्पीकरों में बजते गीत हवा में देशभक्ति घोल रहे थे। घरों की छत पर मुस्कुराते बच्चे नाना प्रकार की पतंगे उड़ाकर आज़ादी का जश्न मना रहे थे। किसी पतंग में स्वतंत्रता सैनानियों का चित्र बना था किसी में भारत का नक्शा तो कोई पतंग तिरंगे में रंगी थी। दस वर्षीय क्रांति अपने घर की छत पर खड़ा होकर सब उत्साह से देख रहा था, बीते कल ही विद्यालय में आयोजित स्वतंत्रता दिवस के समारोह का हिस्सा बन उसने काव्यपाठ किया और साथ ही एक अच्छे श्रोता की भांति स्वतंत्रता के संघर्ष की गाथा भी सुनी।
क्रांति आकाश के अपूर्व और अप्रतिम सौंदर्य में ऐसा गुम हो गया कि वह स्वयं पतंग उड़ाना भूल ही गया। उसकी रंग-बिरंगी पतंग पर एक ओर तिरंगे का चित्र था वहीं दूसरी ओर एक पंख फैलाया परिन्दा। उसने एक कोने में रखी अपनी पतंग उठाई और कुछ ही देर में आकाश में पतंगबाजी का एक द्वंद्व छिड़ गया, क्रांति एक एक करके दूसरों की पतंग काटता रहा, आकाश में उसकी पतंग के अलावा सिर्फ एक अंतिम पतंग बची और उसे भी क्रांति ने बड़ी ही कुशलता से काटने का प्रयास किया किंतु तभी उसकी नजर उसकी पतंग के मांझे से टकराए पक्षी पर गई जो क्षणभर में घायल होकर उसकी छत पर आ गिरा। घायल पक्षी को छत पर गिरता देख उसके हाथ से पतंग की डोर छूट गई और उसकी पतंग के क्षणभर में ही आकाश से अदृश्य हो गई।
हल्के भूरे रंग का पीली चोंच वाला वह बेजुबान पक्षी दर्द दर्द में छटपटा रहा था, पीड़ा में उसे पंख फड़फड़ाते देख क्रांति के मन में अपराधबोध होता है, अनायास ही भय, अपराधबोध और करुणा के कारण उसकी आंखों से अश्रुओं की धारा छलक उठती है। वह बिना देरी किए उस पक्षी को उठाता है लेकिन पीड़ा में पक्षी के छटपटाने के कारण सहसा उसके हाथों में कंपन हो उठता है और पक्षी उसके हाथों से गिर जाता है। जब तक वह उसे एक बार फिर उठाने की कोशिश करता है तब तक वह घायल पक्षी निष्प्राण हो जाता है। निष्प्राण पक्षी को देखकर उसका मन खिन्न हो उठा, कुछ ही क्षण पहले जिस आकाश में वह अपनी पतंग सबसे ऊँची उड़ाने का स्वप्न देख रहा था, वही आकाश अब उसे उदास और सूना प्रतीत हो रहा था। जो क्रांति घंटों तक अनंत क्षितिज में उड़ती रंग बिरंगी पतंगों को देख रहा था अब उसकी आँखें पतंगों पर नहीं, अपितु आकाश में उड़ते पक्षियों पर टिकी थीं। उसे आकाश अब किसी विशाल स्वतंत्र संसार की भांति दिखाई दे रहा था।
वह सब छोड़कर उदास मन से नीचे जाता है तभी उसकी दृष्टि दूरदर्शन पर प्रसारित स्वतंत्रता दिवस की एक डॉक्यूमेंट्री पर जाती है।
कमरे में उसके पिता टीवी के सामने बैठे थे। स्क्रीन पर स्वतंत्रता आंदोलन की झलकियां दिखाई जा रही थी । कहीं स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष की तस्वीरें थीं, कहीं तिरंगा लहराता दिखाई दे रहा था।
अचानक उसके पिता ने उसकी ओर देखा और पूछा “क्या हुआ, क्रांति? पतंग नहीं उड़ा रहे?”
क्रांति ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह चुपचाप पिता के पास जाकर बैठ गया। टीवी पर आवाज़ गूंजती है, “स्वतंत्रता अनेक बलिदानों का परिणाम है। असंख्य लोगों ने अपने वर्तमान का त्याग करके आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को स्वतंत्र बनाया।” क्रांति कुछ देर तक स्क्रीन को देखता रहा।
क्रांति अपने पिता को बताता है कि किस प्रकार उसकी पतंग के मांझे से घायल होकर एक पक्षी की मृत्यु हो गई।
उसके पिता उसके कंधे पर हाथ रख, समझाते हुए कहते हैं –
“कोई बात नहीं, लेकिन आज के बाद ध्यान रखना कि तुम्हारे कारण किसी जीव को नुकसान न पहुँचे क्योंकि उनके लिए खुला आकाश ही उनका संसार है। आकाश मुक्त है और वहां कोई सीमा या कोई बंधन नहीं है। जिस तरह हमें स्वतंत्र होकर जीने का अधिकार है, उसी तरह उन्हें भी अपने आकाश में स्वतंत्र उड़ने का अधिकार है।”
क्रांति बिना कोई उत्तर दिए सर झुका लेता है। उसके पिता फिर कहते हैं –
“स्वतंत्रता दिवस हमारी स्वतंत्रता का उत्सव मनाने का और खुशियां बांटने का दिन है है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हमारी खुशी किसी दूसरे के जीवन की कीमत बन जाए।”
तभी टी.वी पर चल रहा कार्यक्रम अपने अंत की ओर आता है और स्क्रीन पर राष्ट्रगान की धुन बजती है और अनंत आकाश में उड़ते पक्षियों का दृश्य आता है।
क्रांति के पिता कहते हैं –
“याद रखना, क्रांति, स्वतंत्रता सिर्फ तिरंगे तक सीमित नहीं होती। हर व्यक्ति का भयमुक्त वातावरण में श्वास लेना, हर पक्षी का बिना बाधा के अपने पंख फैलाकर आकाश की सीमा को नापना और हर मनुष्य एवं जीव का अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष न करना ही स्वतंत्रता है।”
