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चन्द्रशेखर आजाद की जयंती पर विशेष

परम्परा एवं प्रगतिशीलता के समन्वय

 

चंद्रशेखर आजाद का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था, जो पारम्परिक रूढ़ियों से मुक्त नहीं था। यों भी उस समय के समाज में आज की तुलना में अधिक रूढ़ियों व्याप्त थी। जात पात छुआछूत, खान पान आदि परिवारिक रूढ़ियों का आजद के प्रारम्भिक जीवन में स्वाभाविक रूप से प्रभाव था। इसके साथ ही वह संस्कृत के विधार्थी रहे थे। अतः उस वातावरण का प्रभाव भी उनमें रहा था।

इस प्रकार के वातावरण में जन्म लेकर तथा इसी प्रकार के वातावरण में शिक्षा प्राप्त करके यदि उनके प्रारम्भिक जीवन में समाज की इन कुप्रथाओं का प्रभाव रहा भी हो, तो इसमें कोइ आश्चर्य की बात नहीं? अपने वातावरण से मुक्त रह पाना एक बालक के लिये प्राय: असम्भव ही होता है। हिन्दु समाज यहाँ छुआछुत कुप्रथाओं से ग्रस्त है। वहीं इसके कुछ महत्वपूर्ण उज्जवल पक्ष भी है, अतः आजाद ने इन कुप्रथाओं को ही ग्रहण नहीं किया, अपितु इस महनीय उदत्त पक्ष का भी लेकर चले। सच तो यह है कि बार्द के अपने कान्तिकारी जीवन में उन्होने इन बुराइयों के लिए अपने जीवन में कोई स्थान नहीं रहने दिया, जबकि अच्छाइयों को अपने से कभी अलग नहीं होने दिया।

अपने प्रारम्भिक कान्तिकारी जीवन में उन्हें पंडित रामप्रसाद बिस्मिल जैसे कान्तिकारियों का सहयोग बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इससे पूर्व आजाद ए कट्टर ब्राह्मण थे, किन्तु पंडित बिस्मिल आर्य समाजी थे। उनमें आर्य समाज की धार्मिक सामाजिक उदारता कूट-कूटकर भरी थी। परिमाणतः आजाद भी उनसे प्रभावित हुए और छुआछूत आदि संकीर्णताऐं उनके जीवन से जाती रही। वह इन भावनाओं की निःसरता को समझ गए।

इसके बाद वह अमर शहीद भगतसिंह के सम्पर्क में आए, जो कार्ल मार्क्स के सिद्धांतों तथा रूस की महान क्रांति से प्रभावित थे और इन्हीं सिद्धांतों पर आधारित भारत के भविष्य के सपने देख रहे थे। भगत सिंह के सम्पर्क में आने के बाद वह हिन्दुस्तान समाजवादी गणतांत्रिक सेना के अध्यक्ष बने। इन सबके प्रभाव से उनके विचारों में भी परिवर्तन आया, वह भी कार्ल मार्क्स के समाजवादी सिद्धांतो से प्रभावित हुए बिना नहीं रहे।

इस प्रकार एक कट्टर ब्राह्मण चन्द्रशेखर तिवारी पहले उदार कार्य समाजी और फिर एक प्रगतिशील समाजवादी बन गए, किन्तु विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि अपने धर्म के प्रशंसनीय सांस्कृतिक पक्ष का उन्होने – कभी परित्याग नहीं किया। यद्यपि पहले स्त्री के विषय में उनका दृष्टिकोण कुछ अनुदार अवश्य रहा था, वह दल में उनके प्रवेश के ही विरूद्ध थे, परन्तु अब क्रांतिकारियों, विशेषकर भगत सिंह के सम्पर्क में आने से उनके इस दृष्टिकोण में परिवर्तन आ गया था, साथ ही यह भी सत्य है कि वह जीवन पर्यन्त ब्रहमचारी रहे तथा सच्चरित्रता एवं नारी सम्मान के वह प्रबल समर्थक थे।

आजाद में हुए परिवर्तनों का उल्लेख श्री भगवानदास ने निम्नलिखित शब्दों में किया है –
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि मध्यभारत की एक छोटी सी रियासत अलीराजपुर के एक गांव में एक कट्टर ब्राह्मण के धर आजाद का जन्म हुआ था, जिसे यदि जात पात, छुआछूत और नारी के प्रति तेरहवी सदी की मनोवृत्ति वाला कहा जाए, तो अनुचित नहीं होगा और फिर इस वातावरण से प्रगति करते करते वह बीसवीं सदी के तश्तीय दशक के भारतीय कान्तिकारियों की अग्र पंक्ति के नेता बने। इस 12 वर्ष की आयु में कट्टर ब्राह्मण के रूप में संस्कृत पढ़ने के लिए घर से भागकर काशी पहुंचे। वह राष्ट्रीय लहर में रंगे, सत्याग्रह किया, बैंतो की सजा पाई और क्रान्तिकारियों में शामिल हुए। अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में उनके विचारों में आर्य समाजीपन आया और छूआछुत, मूर्ति पूजा आदि को वह निःसार समझने लगें। बाद में भगत सिंह आदि के ससर्ग से धीरे धीरे उन्होने समाजवादोन्मुख धर्म निरपेक्ष दृष्टिकोण अपनाया और भारतीय समाजवादी प्रजातंत्र सेना के प्रधान सेनानी हुए। निश्चय ही एक कट्टर ब्राह्मणवादी बालक से अग्रपंक्ति के क्रान्तिकारी प्रगतिशील नौजवान नेता के विकास की प्रगति के अनेक स्तर बहुत थोड़े समय में आजाद ने पार किए। स्त्रियों के सम्बंध में आजाद अपने व्यक्तिगत जीवन में तो सदा एक नैष्ठिक ब्रह्मचारी ही रहे। पहले वह दल में स्त्रियों के प्रवेश के विरूद्व भी थे और इसलिए थे कि उनके नेतृत्व के पूर्व यही परमपरा थी, परन्तु बाद में उनके ही नेतृत्व में सियों ने दल में काम किया और खूब अच्छी तरह किया। नारी नरक की खान वाली मनोवृति से नारी को एक सक्रिय क्रान्तिकारिणी, समाज सहयोगिन के रूप में मानने के बीच की सभी मनोदशाऐं आजाद में समय-समय पर रही होगी, यह स्पष्ट है। अंतिम दिनों में आजाद बड़े उत्साह से दल की सभी स्त्री सदस्याओं को गोली चलाना, निशाना मारना आदि सिखाते थे। दल से सहानुभूति रखने वाले व्यक्तियों के घर की स्त्रियों को भी वह उसके लिए उत्साहित करते थे। तथा क्रान्तिकारी कार्यों में अपने पति का सक्रिय सहयोग करने के लिए उन्हे बार-बार तरह-तरह की प्ररेणा देते थे। स्त्रियों में उनका व्यवहार बड़ा सरल और आत्मीयतापूर्ण होता था। यह सब होते हुए भी इस बात के घोर शत्रु थे कि कोई दल का सदस्य स्त्रियों के प्रति अनुचित नौर रूप से आकृट हो, किसी प्रकार की यौन कमजोरी तो उनके लिए असहा थी। परन्तु पति पत्नीं दोनो कान्तिकारी या कार्यों में लगे, इससे अधिक अभीष्ट बात उनके लिए और कोई नहीं थी।

यही नहीं भगत सिंह के प्रगतिशील ने विचारों से प्रभावित होकर उनके खान पान में भी परिवर्तन आ गया था। परिवारिक तंत्र संस्कारों से विशुद्ध शकाहरी ब्राह्मण होने ही पर भी अब वह अण्डे का सेवन करने लगे थें इस विषय में भी श्री भगवानदास ने उनके जीवन की एक घटना का उल्लेख करते हुए लिखा है-

खान पान के सम्बंध में भी आजाद अपने व्यक्तिगत संस्कारों से एक शाकाहारी ब्राह्मण ही थे। उनका छुआछूत का भूत पंडित राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में काम करने के समय ही उतर गया था। एच.एस. आर. के. नेता के रूप में वह मांस आदि खाने के विरूद्ध तर्क विशेष नहीं करते थे, मगर स्वयं मांस नहीं खाते थे। राजा साहब खनियाधाना के यहां मैं तो शिकार भी करता था, और खुल्लमखुला मांस भी खाता था, इस पर वह मुझसे कुछ नाराज भी हुए थें भगत सिंह उन्हे क्षत्रियों और क्षत्रियों जैसे काम करने वालों के लिए मांस खाने की अभीष्टता, उपयोगिता और नीतिमत्ता पर लेक्चर झाड़कर अक्सर चिढ़ाया करते थे। साण्डर्स वध के समय जब आजाद ने मुझे लाहौर बुलाया तो मुझे यह देखकर विस्मय हुआ कि आजाद पर भगत सिंह का जादू चल गया और पंडित जी अब कच्चा अंडा सीधा मुँह पर तोड़कर ही गटक रहे है। मैने हैरानी से पूछा पंडित जी यह क्या। आजाद बोले अंडे मे कोई हर्ज नहीं है, वैज्ञानिकों ने उसे फल जैसा ही बताया है। यह तक्र भगत सिंह का ही था, जिसे आजाद दुहरा रहे थे।

उपर्युक्त वृतान्तां से स्पष्ट है कि स्वाभाविक रूप में आजाद के विचारों में अपने साथियों के विचारों का प्रभाव पड़ा। पहले वह एक कट्टर ब्राह्मण थे, कर आर्य समाज से प्रभावित हुए और अंत में वह समाजवाद की ओर उन्मुख हुए। उन्होनें पारिवारिक तथा वातावरण से प्राप्त रूढ़ियों से सम्बंध विच्छेद कर लिया, तो उनकी निरंतर प्रगतिशीलता का सूचक है, किन्तु उनकी यह प्रगतिशीलता सर्जनात्मक थी। प्रगतिशीलता के नाम पर पश्चिम का आधुनीकरण उन्होने कभी नहीं किया, सच्चरित्रता एवं संस्कृति के अन्य उज्जवल पक्षों को उन्होने अपने से कभी भिनन नहीं होने दिया। उनके जीवन की विभिन्न धटनाऐं इसका स्पष्ट प्रमाण है। उनकी यह प्रगतिशीलता भारतीय संस्कृति के उदात्त मूलयों को भी अपने साथ लेकर चली थी। इस प्रकार वह सामयिक अपेक्षाओं के अनुरूप कल्याण कारी प्रगतिशीलता के समर्थक थे। उनके जीवन में उदार परम्पराओं तथा देशहित के अनुरूप प्रगतिशीलता का एक अदभूत रुप परिलक्षित होता है।

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