जस की तस है, कामगारों की दशा
यह वक्त है आत्म समीक्षा का ---------- अनिल तिवारी ------- पिछले 140 वर्षों में दुनिया के साथ भारत में भी संगठित क्षेत्र के मजदूरों की सेवा शर्तों में काफी हद तक सुधार हुआ है। इससे
यह वक्त है आत्म समीक्षा का ---------- अनिल तिवारी ------- पिछले 140 वर्षों में दुनिया के साथ भारत में भी संगठित क्षेत्र के मजदूरों की सेवा शर्तों में काफी हद तक सुधार हुआ है। इससे
कहब तऽ लाग जाई धक् से, धक् से कहब तऽ लाग जाई धक् से बड़े-बड़े लोगन के बंगला दो बंगला अउर भईया झूमर अलग से कहब तऽ लाग जाई धक् से हमरे गरीबन के झोपड़ी जुलुम्बा
अनिल तिवारी ------- प्रचंड गर्मी का प्रकोप बढ़ रहा है। राजधानी दिल्ली सहित देश के कई हिस्सों में बढ़ते तापमान से लोग हलकान हैं। रोजमर्रा की जरूरतों से चिलचिलाती धूप में निकलने के कारण बीमारों
मासिक पत्रिका कलरव का वर्ष 2007 के अगस्त माह का अंक। https://drive.google.com/file/d/1lwZieboA7vZnxt2hOLdt2n_OZe9S3oic/view?usp=drivesdk
गौरी तिवारी चंदन एक अत्यंत निर्धन परिवार से था। उसके माता- पिता का पूरा जीवन एक समय का भोजन इकट्ठा करने में निकल गया, जिसके चलते चंदन की पढ़ाई पूर्ण न हो सकी। उसके
गौरी तिवारी सामान्यतः एक प्रतिभाशाली विद्यार्थी विशिष्ट विद्यार्थी होता है, जिन्हें दूसरों के मुकाबले अधिमान्य माना जा सकता है। एक ऐसी ही विद्यार्थी थी प्रतिभा। वह ७वीं कक्षा की छात्रा थी। पढ़ने में तो होशियार
अनिल तिवारी ----------- देश में जब भी कोई चुनाव आता है तो आधी आबादी को और अधिक सशक्त करने का दावा करते हुए तरह-तरह की रेवड़िया बांटने का दौर शुरू हो जाता है। इस रेस
गौरी तिवारी मानव सभ्यता का निरंतर विकास हुआ है, भले ही उसकी गति धीमी हो किंतु निरंतर विकासशील रही है। लेकिन इसी विकास की चकाचौंध में भागते लोग एक स्वार्थी और हिंसक शेर के समान
https://drive.google.com/file/d/1IbKCoe8onqD1tQmwjbr-2e3EcMm6rv3A/view?usp=drivesdk मासिक पत्रिका कलरव, वर्ष 2007 के फरवरी-मार्च माह का अंक।
https://drive.google.com/file/d/1oszB0WbJQyVAGvrW-SOl1ayPkF7oUkQu/view?usp=drivesdk मासिक पत्रिका कलरव का वर्ष 2006, नवंबर माह का अंक।