Breaking News :

nothing found

स्वाभिमान (बाल कहानी)

गौरी तिवारी

 

चंदन एक अत्यंत निर्धन परिवार से था। उसके माता- पिता का पूरा जीवन एक समय का भोजन इकट्ठा करने में निकल गया, जिसके चलते चंदन की पढ़ाई पूर्ण न हो सकी। उसके माता-पिता की उम्र भी बहुत थी और वे दोनों कई रोगों से ग्रस्त थे। जिसके चलते चंदन उनकी आर्थिक सहायता के लिए शहर की एक सड़क के किनारे जूते पॉलिश किया करता था जिससे उसकी थोड़ी बहुत आमदनी हो जाती थी और उन कमाए हुए पैसों से उनके घर का खर्च चलता था।
चंदन बचपन से ही बहुत मेहनती और ईमानदार था, वह शहर की बड़ी-बड़ी इमारतों को देखता और सोचता की एक दिन वह भी अपनी मेहनत के पैसों से इतनी बड़ी इमारत खरीदेगा और अपने माता-पिता को उपहार स्वरूप देगा और उन्हें अनेकों खुशियां देगा। यही सब सोचकर चंदन अपने अपने जूते पॉलिश की दूकान पर खूब मेहनत करता था ( दुकान सिर्फ उसके लिए थी, बाकियों के लिए फटी हुई पन्नी का टेंट था।) लेकीन वह कभी भी अपने ग्राहकों से अपनी मेहनत के पैसो से ज्यादा एक भी पैसा कभी नही लेता था। जिसके चलते उसकी दूकान पर खूब भीड़ होती थी तथा सभी चंदन के व्यवहार से खुश रहते थे।
एक दिन की बात है प्रतिदिन की भांति आज भी वह अपने घर से अपने दुकान के लिए जल्दी से निकल गया और फिर अपनी दुकान खोलकर ग्राहकों की प्रतीक्षा करने लगा। इसी बीच उसकी दुकान के पास एक बड़ी सी गाडी आकर रुकी और उस गाडी में से एक कोट पहना एक व्यक्ति बाहर निकला जो शायद किसी कार्यालय का साहब था। अपने दफ्तर जा रहे थे इसलिए उन्होंने चंदन से बोला “मेरे जूते खूब अच्छे से चमका देना क्योंकि आज हमारे कम्पनी में बहुत बड़ी मीटिंग है।
चंदन भी फटाफट उन साहब के जूते पॉलिश कर दिया जिससे खुश होकर उस साहब ने 500 रूपये का नोट थमाया, लेकिन चंदन के पास तो इतने पैसे कभी एक साथ इक्कठे भी नही हुए थे और न ही उसके पास उस समय छुट्टे पैसे भी थे की वह अपने पैसे काटकर बाकि पैसे लौटा सके।
उसने साहब से बताया की उसके पास तो छुट्टे पैसे नही है। तो वह साहब थोड़ा जल्दी में थे इसलिए बोले “अभी तो मेरे पास भी छुट्टे पैसे नही है इसलिए तुम पूरे पैसे ले लो।”
तो चंदन तुरंत बोल पड़ा “साहब हम गरीब जरुर है लेकिन मेहनत करके पैसा कमाना चाहते है। यदि मैंने एक बार बिना मेहनत किए पैसों को ले लिया तो यह गलत होगा और मेरे मूल्यों के विरुद्ध होगा क्योंकि ऐसे पैसे कमाने का तरीका आसान प्रतीत हो सकता है लेकिन ठीक नहीं। इससे हर कोई मेहनत करना ही छोड़ देंगा लोग बस दुसरो के अहसान के बदले जीना सीख जायेगे और मै ऐसा नही चाहूँगा सो आप इन पैसो को वापस रख लीजिये और जब अगली बार आना तो मेरे जितने पैसे बनते है उतना दे देना।
यह बात सुनकर उन साहब की आखे खुल गयी और मन ही मन सोचने लगे की हमने इस लड़के की आत्मसम्मान की भावना को ठेश पंहुचा दिया है इसलिए वे साहब चंदन से बोले “बेटा तुम अपनी परिस्थिति से गरीब जरुर हो लेकिन अपने आत्मसम्मान की भावना से अमीर हो इसलिए हमे माफ़ करना” और इस प्रकार चंदन ने अपने कार्यों से एक व्यक्ति का ह्रदय परिवर्तित कर दिया और फिर वे साहब बार बार यही सोचते रहे की वे अमीर है या वो गरीब लड़का चंदन जो गरीब होते भी दिल से अमीर है।
गरीबी एक अभिशाप है परंतु यदि हम अपने जीवन में सदैव सही राह पर चलें, मेहनत करें और सच्चाई का साथ दें तो यही अभिशाप एक दिन वरदान बन जाएगा।
हो सकता था चंदन अपनी गरीबी की परवाह करते हुए साहब के पैसे ले लेता लेकिन यदि वह उन पैसों को एक बार ले लेता तो जिन्दगी भर उसे उस साहब के अहसानतले रहना पड़ता लेकिन उसने अपनी मेहनत और ईमानदारी को हमेशा आगे रखा जिसके चलते वह लोगो का दिल जीतने में सफल रहा। हमारे जीवन में चाहे कितनी ही कठिन दौर से क्यों न गुजर रहे हो लेकिन कभी भी अपने आत्मसम्मान की भावना को कभी नही खोना चाहिए।

Read Previous

सपनों की उड़ान (बाल कहानी)

Read Next

कलरव, अगस्त 2007

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Most Popular