गौरी तिवारी
सामान्यतः एक प्रतिभाशाली विद्यार्थी विशिष्ट विद्यार्थी होता है, जिन्हें दूसरों के मुकाबले अधिमान्य माना जा सकता है। एक ऐसी ही विद्यार्थी थी प्रतिभा। वह ७वीं कक्षा की छात्रा थी। पढ़ने में तो होशियार थी ही, साथ में उसमें ज्ञान की भी कमी नहीं थी। कक्षा में उसकी बौद्धिक क्षमता सर्वोच्च श्रेणी की थी। जो ज्ञान ग्रहण करने में श्रेष्ठ होने के साथ-साथ उच्च योग्यता वाली थी तथा परीक्षा में अधिकतम अंक लाकर सभी को चकित कर देती थी। उसमें कल्पना-शक्ति, तर्कशक्ति, स्मरण शक्ति एवं सूझ-शक्ति अधिक थी। प्रतिभा बचपन से ही दृढ़ निश्चयवान थी, जो एक बार ठान लेती उसे अवश्य पूरा करती और जिस प्रकार अर्जुन ने मछली की आंख पर निशाना लगाया था ठीक उसी प्रकार वो भी एक जगह पर बहुत देर तक अपना ध्यान केंद्रित करती थी।
एक बार सड़क दुर्घटना के कारण उसके पैरों में चोट लग गई थी। चोट की वजह से प्रतिभा ठीक से चल नहीं पाती थी। खेल में उसकी बहुत रुचि थी। चोट लगने के बावजूद खेल से उसकी रुचि नहीं गई।
एक बार विद्यालय में खेल दिवस का आयोजन होने वाला था, जिसमे वह भी भाग लेना चाहती थी। उसने अपने अध्यापक से कहा की खेल दिवस में उसे भी भाग लेना है, यह सुनते ही कक्षा के सभी विद्यार्थी उसका उपहास उड़ाते हुए हंसने लगे। कक्षा के अध्यापक भी प्रतिभा पर व्यंग्य करते हुए बोले, “क्यों, खेल दिवस में भाग लेना चाहती हो? पहले अपने पैरों की ओर तो देखो। तुम तो ठीक तरह से चल भी नहीं सकती, खेल दिवस की दौड़ में कैसे भागोगी और अन्य खेल भी कैसे खेलोगी?”
इस बात से दुखी होकर प्रतिभा कुछ बोल न सकी और सारी कक्षा हंसी से गूंजती रही। इन सब के बाद भी प्रतिभा का हौंसला कम नही हुआ उल्टा वह अपने इरादे के प्रति और भी पक्की हो गई। अगले दिन से जब भी उसे मौका मिलता वह धीरे धीरे चलने का अभ्यास करने लगती, यह देखते ही कक्षा के अन्य बच्चों ने उस पर फिर से व्यंग्य किया। इस पर वह तिलमिला उठी। उसने बगल में पड़ी बैसाखी उठाई और उठते हुए दृढ़-संयमित स्वर में कहा, “ठीक है, आज मैं अपाहिज हूं, चल-फिर नहीं सकती, लेकिन आप सब, याद रखिए कि मन में यदि पक्का इरादा हो तो क्या नहीं हो सकता। यही प्रतिभा, यानी मैं एक दिन हवा में उड़कर दिखाऊंगी।”
उसकी बात सुनकर उसके साथियों ने फिर उसकी खिल्ली उड़ाई। उस दिन के बाद प्रतिभा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह प्रतिदिन चलने का अभ्यास करने लगी। कुछ ही दिनों में वह अच्छी तरह चलने और धीरे-धीरे दौड़ने भी लगी। इस कामयाबी ने उसके हौसले और भी बुलंद कर दिए।
अगले माह विद्यालय के खेल दिवस का आयोजन हुआ जिसमें प्रतिभा ने दौड़ में स्वर्ण पदक जीतकर सबको चौंका दिया। उसकी जीत से सभी को बहुत खुशी हुई और जिन बच्चों तथा अध्यापक ने उसका उपहास किया था उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने प्रतिभा से क्षमा मांगी ।
