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मजदूर दिवस के अवसर पर गोरख पांडेय की कविता

कहब तऽ लाग जाई धक् से, धक् से

कहब तऽ लाग जाई धक् से

बड़े-बड़े लोगन के बंगला दो बंगला
अउर भईया झूमर अलग से
कहब तऽ लाग जाई धक् से
हमरे गरीबन के झोपड़ी जुलुम्बा
बरसे तऽ पानी, छत से गिरे टप्प से
कहब तऽ लाग जाई धक् से
बड़े बड़े लोगन के पूरी अउर रबड़ी
अउर भईया हलुवा अलग से
कहब तऽ लाग जाई धक् से
हमरे गरीबन के चटनी और रोटी
पानी पीएं बालू वाला नल से
कहब तऽ लाग जाई धक् से
बड़े बड़े लोगन के जीन्स अउर पैंट
औरी भईया कोट अलग से
कहब तऽ लाग जाई धक् से
हमरे गरीबन के कुरता जुलुमवा
पहिने तऽ फाट जाए चर से
कहब तऽ लाग जाई धक् से
बड़े बड़े लोगन के स्कूल आ कॉलेज
अउर भईया ट्यूशन अलग से
कहब तऽ लाग जाई धक् से
बड़े बड़े लोगन के संघी अउर साथी
अउर भईया सरकार अलग से
कहब तऽ लाग जाई धक् से
हमरे गरीबन के यूनियन जुलुमवा
बोले तऽ लाठी पड़े ठक्क से
कहब तऽ लाग जाई धक् से

(प्रस्तुति: कलरव)

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